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अपमानों को याद करूं तो मेरा जीना दूभर हो जाएगा: प्रो जाबिर हुसेन

jabir husainलालू प्रसाद की सरकार जब गई तब किस तरह से लालू प्रसाद के समय किए कामकाज को मिटाने की कोशिश हुई यह सामने आया है. यह हम नहीं कर रहे बल्कि यह उजागर हुआ है तत्कालीन बिहार विधान परिषद् के सभापति प्रो जाबिर हुसेन के फेसबुक पोस्ट से.

आम तौर से जाबिर हुसेन इस तरह की चीजें पोस्ट नहीं करते. उन्होंने विधान परिषद् में संवाद और साक्ष्य जैसी पत्रिका को देश भर में स्थापित किया और अब दोआबा पत्रिका निकाल रहे हैं. साहित्य अकादमी सहित कई पुरस्कार पाने वाले लेखक का दर्द ऐसे समय सामने आया है जब कई तरह की बहसें एक साथ सामने हैं. कई तरह के आरोप-प्रत्यारोप सामने हैं. सच कहें तो उनका ये पोस्ट शासन प्रशासन के धनुर्धरों को आईना दिखाने जैसा है. लोकलाज कितनी किसको आती है यह इससे जुदा विषय नहीं है.

हिन्दी भवन के उद्घाटन में मुझे नहीं बुलाया गया

एक पोस्ट प्रोफेसर जाबिर हुसेन ने हिन्दी भवन को लेकर किया है. हिन्दी भवन के साथ जैसा मजाक हुआ है वह सवाल आई नेक्स्ट ने कई बार उठाया है. जबिर हुसेन के पोस्ट में कैसी टीस है इसे भी महसूस किया जा सकता है- ‘मेरे राज्यसभा का सदस्य रहते, उपराष्ट्रपति माननीय हामिद अंसारी ने फणीश्वरनाथ रेणु हिन्दी भवन का उद्घाटन किया. परंपरा का निर्वाह करते हुए उन्होंने मुझे अपने पटना आने की सूचना ज़रूर दी, लेकिन समारोह के आयोजकों की ओर से मुझे कोई निमंत्रण नहीं मिला. ज़ाहिर है, अपने ही प्रतिनिधि-कोष से बने ‘हिन्दी भवन’ के उद्घाटन-समारोह में मेरी उपस्थिति नहीं हो सकी. अपनी अनुपस्थिति को लेकर मुझे किसी से कोई शिकायत नहीं. लंबे सार्वजनिक जीवन में मुझे ऐसे कई अपमान-भरे अवसरों से गुजऱना पड़ा है. उन अवसरों को याद करने लगूं तो जिंदा रहना दूभर हो जाए.’

आगे उन्होंने लिखा है कि – ‘इस परिसर में एक संस्थान खुला. अभी हाल-हाल तक, यह संस्थान वहीं कार्यरत रहा. अब शायद उसे अपना भवन मिल गया है. जिन लोगों ने भी आरंभ में पूरी तरह सुसज्जित हिन्दी भवन देखा हो, उनके दिल में अवश्य ही इसकी यादें ताज़ा होंगी. अब वही बता सकेंगे कि आज की तारीख़ में इसके हालात क्या हैं.’

राजगीर जन-पुस्तकालय का शिलान्यास पट हटा दिया गया

rajgir pustakalayदूसरा पोस्ट जाबिर हुसेन ने राजगीर के एक पुस्तकालय को लेकर किया है. उन्होंने लिखा है कि राजगीर गए, और यह खूबसूरत इमारत नहीं देखी, तो फिर क्या देखा! यह तस्वीर राजगीर ‘जन-पुस्तकालय’ की है, जिसका शिलान्यास 28 नवंबर, 1999 को माननीय लालू प्रसाद के हाथों संपन्न हुआ…. योजना मेरे विधायक कोष से बन रही थी. समय-सीमा के भीतर इसे तैयार होना था, इसीलिए मुझे स्वयं प्राय: हर हफ़्ता-दो-हफ़्ता पर इसकी निगरानी करनी होती थी. स्थल-चयन और योजना-स्वीकृति में कई तरह की परेशानी हुई. पुरातत्व विभाग की आपत्तियां अपनी जगह थीं. एक स्तर पर, मुझे नालंदा के सांसद और रक्षा मंत्री जार्ज फर्नाडीस से इस मामले में बात करनी पड़ी. उनकी मदद कारगर साबित हुई.

आगे उन्होंने लिखा है कि आखिऱकार 19 अप्रील, 2001 को महानिदेशक, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने पुस्तकालय को ‘नो ऑब्जेक्शन पत्र निर्गत किया. इस प्रकार निर्माण-कार्य में प्रगति आई. भवन बनने के बाद मेरे विधायक कोष से ही लगभग दस लाख के उपस्कर आदि पुस्तकालय को उपलब्ध कराए गए. इनके अलावा, पुस्तकों की आपूर्ति की गई.

उन्होंने आगे लिखा है कि इसी बीच, पुस्तकालय भवन के पड़ोस में नालंदा सैनिक स्कूल की स्थापना हो गई थी. उन्हें भी छात्रों के लिए पुस्तकालय की जरूरत थी. कई-कई वर्षों तक, यह भवन उनके इस्तेमाल में ही रहा. मुझे नहीं मालूम, अब भी शायद इस पर उनका या जि़ला प्रशासन का ही कब्ज़ा हो. आज की तारीख़ में, पुस्तकालय में आपको संगमरमर की वह प्लेट नहीं दिखेगी, जिसे माननीय लालू प्रसाद ने अनावृत्त किया था, और संयोग से जिस पर मेरा नाम भी अंकित था।

प्रणय प्रियम्बद की रिपोर्ट
साभार: I Next पटना

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