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अप्रवासी भारतीयों और भारतवंशियों के प्रयास से हिन्दी विश्व में तेजी से व्याप्त हो रही है, भारत में ही स्थिति दुखदायी

anilपटना, 10 जनवरी। हिन्दी संपूर्ण राष्ट्र की राजभाषा संकल्प से बनेगी। दुर्भाग्य से हम में संकल्प-शक्ति का अभाव है। हिन्दी में विश्व-भाषा होने की अद्भुत क्षमता है। यह हिन्दी है, जिसमें एक ही काल में आचार्य पं रामचन्द्र शुक्ल जैसे समीक्षक, मुंशी प्रेमचन्द्र जैसे उपन्यासकार और जयशंकर प्रसाद जैसे कवि होते हैं। ऐसा दुनिया के किसी भाषा में कभी नहीं हुआ। यह विचार आज यहां हिन्दी साहित्य सम्मेलन द्वारा, विश्व हिन्दी दिवस पर, स्थानीय भारतीय प्रबंधन संस्थान में आयोजित संगोष्ठी व कवि सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए, त्रिपुरा के पूर्व राज्यपाल और साहित्यकार प्रो सिद्धेश्वर प्रसाद ने व्यक्त किये।

मुख्यवक्ता के रूप में उपस्थित विश्वविद्यालय सेवा आयोग, बिहार के पूर्व अध्यक्ष प्रो शशि शेखर तिवारी ने कहा कि भाषा शुन्य में नहीं पैदा होती। उसके तीन आधार हैं- ध्वनि, रूप और शब्दावली। इस रूप में हिन्दी संपूर्ण विश्व में अपनी महत्ता सिद्ध कर चुकी है।

समारोह की अध्यक्षता करते हुए सम्मेलन अध्यक्ष डॉ अनिल सुलभ ने कहा कि वर्ष 1975 में प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन नागपुर में आयोजित किया गया था। इसी सम्मेलन में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित मौरिशस के तत्कालीन राष्ट्रपति राम गुलाम ने मौरिशस में ‘विश्व हिन्दी सचिवालय’ की स्थापना का प्रस्ताव किया था। इस सम्मेलन में भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भी उपस्थित थी और उन्होंने श्री राम गुलाम के इस प्रस्ताव का मुक्त-कंठ से प्रशंसा की थी। दोनों देशों के बीच संपन्न समझौते के पश्चात विगत 2008से मौरिशस में ‘विश्व हिन्दी सचिवालय कार्य कर रहा है।

इसी प्रथम सम्मेलन की स्मृति में वर्ष 2006 में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री डा मनमोहन सिंह ने प्रत्येक 10 जनवरी को ‘विश्व हिन्दी दिवस’ के रूप मे मनाये जाने की घोषणा की थी। 10 जनवरी 2006 को भारत सरकार के विदेश मंत्रालय द्वारा प्रथम विश्व हिन्दी दिवस समारोह आयोजित किया गया था। तबसे यह परंपरा स्थापित हुई।

डॉ सुलभ ने कहा कि अप्रवासी भारतीयों तथा भारतवंशी नागरिकों के कारण निखिल विश्व में हिन्दी तेजी से व्याप्त हो रही है, किंतु भारत वर्ष में हीं हिन्दी आज तक अपनी सौत अंग्रेजी से पीड़ित हो रही है। भारत के लोग जबतक हिन्दी को ‘राष्ट्रीय-ध्वज’ का सम्मान नही देंगे तबतक हिन्दी संपूर्ण भारत-वर्ष की राज-काज की और राष्ट्र-भाषा के रूप मे प्रतिष्ठित नही हो पायेगी।

आरंभ में अतिथियों का स्वागत करते हुए सम्मेलन के प्रधानमंत्री आचार्य श्रीरंजन सूरिदेव ने कहा कि, हिन्दी अपनी शक्ति एवं प्राचीन संस्कृति के बल पर बढ रही है। उन्होंने हिन्दी की वर्तनी की एक-रुपता लाने पर बल दिया।

इस अवसर पर एक भव्य कवि-सम्मेलन का भी आयोजन किया गया, जिसमें हिन्दी और उर्दू के अनेक कवि शायरों ने अपनी रचनाओं से श्रोताओं को भाव-विभोर कर दिया। हिन्दी के ख्याति-लब्ध गज़लगो मृत्यंजय मिश्र ‘करुणेश’ ने अपनी गज़ल “ यह जो अपना दिल जला है, कम न अपने को छला है। हां मगर कुछ गैर ने ही ज़ख्म पर मरहम मला है”, पढ कर श्रोताओं को आह भरने के लिये विवश कर दिया तो शायर आर पी घायल ने अपनी इन पंक्तियों से कि “हर तर्फ़ किलकारियां हों कहकहे अबके बरस, प्यार की ऐसी हवा हर दिन बहे अबके बरस”, सबको “हाय-हाय” करने को मज़बूर कर दिया।

डॉ अर्चना त्रिपाठी, बच्चा ठाकुर तथा अप्सरा मिश्र ने भी अपनी रचनाओं से श्रोताओं के दिल मे टीस पैदा करने मे कामयाबी हासिल की। अन्य कवियों में सम्मेलन के उपाध्यक्ष पं शिवदत्त मिश्र, राज कुमार प्रेमी, बच्चा ठाकुर, अमित शेखर, पं गणेश झा, डा विनय कुमार विष्णुपुरी, आचार्य पांचु राम, रवीन्द्र नाथ चौधरी, शैलेन्द्र झा उन्मन, डा मनोज कुमार, यशस्वी पाण्डेय, जगदीश चंद्र ठाकुर, ओम प्रकाश पाण्डेय, रंजन कुमार, कमलेन्द्र झा ‘कमल’, ललन सिंह गोंडराज तथा कवयित्री सागरिका राय ने भी अच्छा प्रभाव डाला।

गोष्ठी में सम्मेलन के उपाध्यक्ष नृपेन्द्रनाथ गुप्त, साहित्यमंत्री डॉ शत्रुघ्न प्रसाद, बलभद्र कल्याण, प्रो बी एन विश्वकर्मा, अजय कुमार अंबरीष कान्त, आदि वक्ताओं ने भी अपने विचार व्यक्त किये। मंच का संचालन कवि योगेन्द्र प्रसाद मिश्र ने तथा धन्यवाद ज्ञापन ने किया।

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