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अब बिना मिट्टी के भी खेती कर सकेंगे किसान, हफ्ते भर में ही तैयार हो जाएंगी फसल

बिहार के किसानों के लिए अच्छी खबर है। भागलपुर का कृषि विश्वविद्यालय सबौर एक ऐसी तकनीक (हाइड्रोपोनिक्स) पर काम कर रहा है, जिससे किसान बिना मिट्टी के खेती कर सकेंगे। बिहार सरकार ने इस तकनीक पर काम करने के लिए विश्वविद्यालय को 1.80 करोड़ रुपये स्वीकृत किया है। फिलहाल सब्जियों एवं हरा चारा की खेती के लिए काम किया जाएगा।

जापान, चीन और अमेरिका में सफल रहे इस हाइड्रोपोनिक्स नामक विधि को वैज्ञानिकों ने जलकृषि की संज्ञा दी है। अब भारत में भी इसकी शुरुआत हो चुकी है। बिहार के साथ केरल, गोवा, महाराष्ट्र में इस तकनीक पर काम किया जा रहा है। इसके जरिए हरा चारा के अलावा धनिया, टमाटर, पालक एवं शिमला मिर्च जैसी सब्जियों की खेती की जा सकती है।

कृषि मंत्री डॉ. प्रेम कुमार ने बताया कि बाढ़-सुखाड़ से परेशान लघु एवं सीमांत किसानों के लिए यह तकनीक वरदान साबित होगी। किसानों को राज्य सरकार की ओर से इस तकनीक को अपनाने की ट्रेनिंग भी दी जाएगी। इस तकनीक में सामान्य खेती की तुलना में पानी की जरूरत सिर्फ 20 फीसदी होती है।

बड़े गमलों की तरह की 15 से 20 की संख्या में ट्रे होती है। अंकुरित बीज को ट्रे में रखा जाता है, जिसमें हरा चारा हफ्ते भर में तैयार हो जाता है। इसे चक्रानुक्रम में इस्तेमाल किया जा सकता है। प्रतिदिन 50 किलो हरा चारा उपजाने वाली मशीन की लागत करीब 50 से 60 हजार रुपये हैं। बड़ी मशीन की लागत ज्यादा आती है।

इस परियोजना के इंचार्ज डॉ. संजीव गुप्ता के मुताबिक इस विधि में मिट्टी की जरूरत नहीं पड़ती। पानी में बालू या कंकड़ डालकर बीज उगाया जाता है। सात दिनों में हरा चारा तैयार हो जाता है। पौधों को पोषक तत्व देने के लिए विशेष तरह का घोल डाला जाता है। वह भी महीने में एक-दो बूंद सिर्फ एक बार। घोल में नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश, मैग्नीशियम, कैल्शियम, सल्फर, जिंक, आयरन को एक खास अनुपात में मिलाया जाता है। ऑक्सीजन को पंपिंग मशीन के जरिए पौधे की जड़ों तक पहुंचाया जाता है।

इस तकनीक की मदद से बेहद कम खर्च में कहीं भी पौधे उगाए जा सकते हैं। आठ से 10 इंच ऊंचाई वाले पौधों के लिए प्रति वर्ष एक रुपये से कम लागत आएगी। फसलों का मिट्टी और जमीन से कोई संपर्क नहीं होने के कारण इनमें बीमारियां कम होती हैं। लिहाजा कीटनाशकों की जरूरत नहीं पड़ती है। घोल में पोषक तत्व डाले जाते हैं। ऐसे में उर्वरकों का इस्तेमाल नहीं होता। यह स्वास्थ्य के लिए बेहतर होता है। इस तकनीक से उगाई गई सब्जियां और पौधे अधिक पौष्टिक होते हैं।

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