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आईआईटी से निकले पेशेवर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के ‘सेल्समैन’ बनकर रह जाते हैं: प्रणब मुखर्जी

पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कहा कि आईआईटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थान बेहतरीन पेशेवरों को तैयार करते हैं लेकिन वे राष्ट्र निर्माण में योगदान करने के बजाय बहुराष्ट्रीय कंपनियों के ‘सेल्समैन’ बनकर रह जाते हैं.

बांग्लादेश, ढाका के एक कार्यक्रम में पूर्व राष्ट्रपति ने उच्च स्तर के अनुसंधान पर ज़ोर देते हुए कहा कि दक्षिण एशिया के विश्वविद्यालयों को अपने लक्ष्य की समीक्षा करनी चाहिए.

देश के प्रमुख विश्वविद्यालयों में शामिल चटगांव विश्वविद्यालय ने प्रणब को मानद डॉक्टर ऑफ लेटर्स (डी लिट) की उपाधि से मंगलवार को नवाज़ा.

बांग्लादेश के चार दिवसीय निजी दौरे के तीसरे दिन मंगलवार को दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, ‘अमर्त्य सेन, सीवी रमन और हर गोविंद खुराना जैसे कुछ भारतीयों को शानदार शैक्षणिक शोध के लिए नोबल पुरस्कार हासिल हुआ लेकिन उन्होंने हार्वर्ड जैसे विदेशी संस्थानों में शिक्षा हासिल की न कि भारतीय संस्थानों में.’

उन्होंने कहा कि आईआईटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थान बेहतरीन पेशेवर तैयार करते हैं जो ‘वस्तुत: बहुराष्ट्रीय कंपनियों के सेल्समैन’ बनकर रह जाते हैं. वे अपनी क्षमता एवं बुद्धिमता से अन्याय करते हैं क्योंकि ये कार्य कम प्रतिभा वाले लोग भी कर सकते हैं.

मुखर्जी ने कहा कि वित्त मंत्री रहते हुए उन्होंने शिक्षा के लिए कोष आवंटित किया था लेकिन उच्च शिक्षण संस्थानों के प्रदर्शन की समीक्षा करने का काफी कम अवसर था. राष्ट्रपति बनने के बाद वह इसे कर सके क्योंकि वह 100 से ज़्यादा विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति थे.

उन्होंने विश्वविद्यालयों से आग्रह किया कि सीमित लक्ष्यों को छोड़कर उन्हें ख़ुद को बुद्धिमत्ता के केंद्र के तौर पर विकसित करना चाहिए क्योंकि बुद्धिमत्ता और रचनात्मक विचारों में कोई अंतर नहीं होता.

पूर्व राष्ट्रपति ने कहा, ‘हज़ारों साल के इतिहास में नालंदा और तक्षशीला जैसे विश्वविद्यालय चुंबक की तरह काम करते थे जो विश्व के अक़्लमंद लोगों को अपनी ओर आकर्षित करते थे.’

चटगांव विश्वविद्यालय के उपकुलपति इफ़्तेख़ार उद्दीन चौधरी ने मुखर्जी को विश्वविद्यालय परिसर में उपाधि से नवाज़ा.

प्रणब मुखर्जी ने कहा, ‘बांग्लादेश में आज़ादी के सिर्फ़ साढ़े तीन साल बाद बंगबंधु शेख़ मुजीबुर रहमान की हत्या कर गई जबकि भारत में महात्मा गांधी को मार डाला गया. पाकिस्तान ने लियाक़त अली ख़ान और ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो की हत्या को देख, वहीं बर्मा में आंग सान और श्रीलंका में राणासिंघे प्रेमदासा की हत्या हुई.’

मुखर्जी ने कहा, इन हत्याओं में दक्षिण एशियाई क्षेत्र में व्याप्त लोकतंत्र को बुरी तरह प्रभावित किया जो कि ब्रिटिश राज में एक हुआ करते थे. उन्होंने कहा, ‘लोगों को इन हत्याओं के राजनीतिक या सामाजिक आर्थिक कारणों को समझना चाहिए, जिसकी वजह से लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को धक्का पहुंचा.’

 

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