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आवारा दिन

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हमारे घर की गन्दी चीजें बाहर फेंकी और नवम्बर की धूप में लाई जा रही है। अजीब तरह से मैं उदास हूं। अपनी बस्ती के काले छप्परों के ऊपर झुके एक स्थिर बादल को सुस्ती से ताकता और तार-तार और पुआल भरी भूरी तोशक को बाहर ले जाने में मां की सहायता करता हुआ मैं दहलीज पर गिर गया।

‘नजर रखो’, उसने मुझसे कहा और फिर चिल्लाई, ‘आज तुम्हें क्या हो गया है?’

वह स्थायी रूप से एक परेशान और भूखी स्त्री है, एक भूरापन उससे निकलता है। आकाश, आंगन और उसके बीच में खोखली डालों वाला अखरोट का पेड़ और हमारी सारी चीजें एक के बाद एक, दिन की रोशनी दिख रही है। इस तरह के अस्थिर आकाश में ये चीजें अजीब लगती हैं, जैसे वह ढंका हुआ सन्दूक जो नहाने के टब के पास रखा है, वह बिल्कुल ही सन्दूक नहीं है। वह कुर्सी है। वह आधा पलंग है। वह एक मेज है जिस पर मैं कई बार रकाबियां साफ कर चुका हूं। उस पर बैठकर मैंने अपनी पहली कविता, खान-मजदूरों के बारे में एक उदास कविता लिखी है। अंत में वह छोटी और बड़ी मकड़ियों का घर भी है। मैं उनके जालों को देखता हूं। वे भी भूरे हैं। इन तमाम चीजों के ऊपर एक बादल है।

‘आज तुम्हें क्या हो गया है?’ भूख और परेशान स्त्री एक बार फिर चिल्लाई। उसकी आवाज में चिंता प्रकट होती, किन्तु वह कर्कश और कठोर है। ‘मुझे कुछ नहीं हुआ है।’ मैंने उत्तर दिया। मेरा जवाब खामोशी और दुख से भरा हुआ है, किन्तु उसमें झगड़े का तीखापन ध्वनित होता है।

हमने पुआल की तोशक को नीचे किया। हमने उसे बड़ी सावधानी से और धीरे से नीचे किया, क्योंकि कल की बरसात से आंगन पूरी तरह से कीचड़ से सन गया है। तब हमने उसे सीधा किया और पेड़ से टिका दिया। उसने एक पीला निशान छोड़ दिया। पेड़ से घर तक का रास्ता पुआल से ढक गया।

मेरी मां ने कहा, ‘क्या! मैं उसे साफ नहीं करनेवाली। उन्हें भाड़ में जाने दो। जब हमलोग इस घर में आये, मैंने यहां की सब चीजों को चमकीला और उज्जवल नहीं पाया।’ हम अपने अस्त-व्यस्त घर के अंधेरे और मलिन तहखानों से बोतलें ले आये। वे खाली हैं, किन्तु एक बार में ही कई बोतलें लाना मुश्किल हैं।

‘एक बार में दो ले जाओ, फिर और बोतलें लेने आना।’ मेरी मां ने मुझसे कहा।

‘चीजों से फिर न टकरा जाओ, इसलिए सावधानी से काम करो’, मेरी मां ने आगे कहा, ‘कल तुम्हें बाहर जाकर उनको बेचना है, शायद कल उनको कोई खरीद ले।’

मैंने उनको ले लिया। धूल की एक मोटी तह से ढकी इन बोतलों ने मुझे योकसिमोविच इमारत से चमकती बस्तियों की याद दिला दी। मैंने उनको छोटी और बड़ी मकड़ियों के घर के उपर रख दिया। भूरा जाल टूट गया। मैं खुद ही और बोतलें लेने लौटा। मेरे उपर एक बादल है, एक बादल और नवम्बर का पीतवर्णी सूर्य।

एक दुर्बोध और अवर्णीय दुखद अनुभूति।

हमारे घर की चीजें बाहर निकाल दी गयी हैं।

हमको चल पड़ना है!
हमें चलते रहना होगा, परन्तु यह एक लम्बी दोपहर है। जार्ज कहीं दिखाई नहीं देता।

उसने कहा था, ‘यदि मुझे पैसा मिल गया तो मैं ग्यारह बजे घर पर रहूंगा।’

ढाई बज चुके हैं, वह अब तक दिखाई नहीं पड़ा।

‘जार्ज कहां है? मुझे ताज्जुब है, उसे पैसा मिल गया होगा। क्या उसे कुछ हो गया है? शायद उसे पैसे न मिले हों और वह किसी से उधार मांगने चला गया हो।’
जैसे ही मेरी मां ने कुछ हो जाने के बारे में अनुमान लगाना शुरू किया, उसकी आवाज कर्कश होती गई। तीन बजे वह बिल्कुल ही बेचैन हो उठी और मुझसे कहा,

‘भागकर सदर दफ्तर जाओ और देखो, वह कहां है….!’

सारी इच्छा-शक्ति बटोरकर, मैं जबरदस्ती भागा (कल रात से हमारे पास खाने के लिए कुछ नहीं था)। पिस्तौल माला की चहारदीवारी के नजदीक मैंने अपनी गति धीमी कर ली। सदर दफ्तर बहुत करीब है। आधी ईंटों और आधी लकड़ी के बने हुए निचले छप्परों में नीचे जंग लगे छकड़े और उनके ध्वस्त हिस्से पड़े हुए हैं। उनके नीचे फटे और फीके नीले रंग के मोटे कपड़े पहने हुए काले रंग से पुते आदमी है। वे नीचे हथौड़े चला रहे हैं और उन्होंने मुझे सुना नहीं। अंत में मुझे एक चैकीदार मिला। मैने उसे बांह पकड़कर खींचा।

‘क्या जार्ज यहां है?’

‘कौन जार्ज?’ चैकीदार की काली दाढ़ी हंसी से बंट गयी। ‘वह क्या करता है?’

जहां तक मैं समझ सका मैंने काली दाढ़ी वाले को समझाया कि जार्ज क्या करता है।

‘वह अप्रैंटिस है। वह मेरा भाई है।’

अच्छी काली दाढ़ी वाला आदमी आगे बढ़ा और एक विशाल काला हाथ कोमलतापूर्वक मेरे घुंघराले बालों को सहलाने लगा।

‘छोटे बच्चे! वह जा चुका है। जब से लोगों को पैसे मिले हैं, वह यहां नहीं है। क्या वह घर नहीं पहुंचा?’

पांच बजे हैं।

बहुत पहले हमारी चीजें बाहर निकाल ली गयी है।

सूर्य डूब चुका है, नवम्बर की गोधूलि बेला के भूरेपन ने उनको आच्छादित कर लिया है।

और हमको भी।

नवम्बर की धूमिल शाम को एक पेड़ के नीचे, चिथड़ों के ढेर के ऊपर, एक परेशान और भूखी स्त्री बैठी है। उसने अपने हाथ इस तरह नीचे डाल रखे हैं कि उसके कन्धों के कोने फैल गये हैं। उसने अपना भूरा और बिना संवरा हुआ सिर अपने सूखे और खुरदरे हाथों में ले रखा है। मैं दरवाजे में खड़ा हूं। रोज शाम की तरह, दूर, रिवारा के नजदीक सड़कों पर लड़कों के अवारा झुण्डों की भयानक हंसी गूंज रही है। रास्ते पर एक चीखती पीली बिल्ली, कुचले और खून बहते पंजे को लिये, असहनीय धीमी गति से मुड़ी, बाड़ी की ओर रेंगती है।

अचानक मेरे विचार फिर भटक जाते हैं। मैं उनके बारे में सोचने लगा। किसी निर्जन बाग में, डूबते सूर्य की कुछ किरणों को पकड़ते हुए छायादार बेंच पर उसके साथ बैठा हूं, मैं इसकी कल्पना करता। हमारे चारो तरफ सुनहले पत्ते झर रहे हैं। उसका हाथ, उसका प्रेमरस, समस्त संसार में सबसे अधिक प्रिय हाथ मेरे हाथ में हैं।

हवा चल रही है। सुनहले पत्ते चारो तरफ गिर रहे है। और कुछ नहीं।

पांच बज चुके हैं। जार्ज अब तक नहीं लौटा है। हमने चीजें गाड़ी में इकट्ठी कर ली है। जंगदार अंगीठी के पैर उपर की ओर उठ गये हैं। पुआल की तोशक आधी लटकी हुई है। मैंने झाड़ू और कुल्हाड़ी को अंगीठी से बांध दिया। सन्दूक के बीच में, बोतलों और अंगीठी के साथ, अंगीठी की नलियों को कस दिया। मां रकाबियों वाली टोकनी ले जायेंगी। एक बार फिर से हमने सारे कोने ढूंढे। हम, आंगन के पीछे, उन लकड़हारों के पास गये जो आग के ऊपर उबलती हुई हांडी के चारो तरफ इकट्ठे हो गये थे।

‘अलविदा’, मेरी मां ने कहा।

‘अलविदा’, मैं भी चिल्लाया।

‘अच्छा, अलविदा’, लकड़हारों ने जवाब दिया।

अंत में हम चलने को हुए…. किन्तु यह क्या है? यह सम्भव नहीं। तो भी…. यह हमेशा भूखी और परेशान रहनेवाली स्त्री कैसे और ज्यादा खिन्न और उदास हो गई। अचानक ही, वह कैसे और झुक गई जैसे कोई बड़े बोझ के नीचे दब रही हो…. वह क्यों इतनी बूढ़ी, झुर्रीदार, और भूरी, राख की तरह भूरी लगने लगी?
दरवाजे पर मैंने जार्ज की टोह ली। सब स्पष्ट हो गया।

‘वोल्गा, वोल्गा’, जार्ज ने गाया। उसने बच्चों की तरह कर्कश और लयहीन आवाज में गाया। उसका ‘वोल्गा, वोल्गा’ गन्दा, घृणास्पद और वीभत्स है। उसे सुनकर मुझे शराब की भट्ठी की याद आने लगी। उसके चेहरे पर एक असामान्य भाव है। वह प्रफुल्लित नहीं है। उसका गीत एक असहाय किन्तु अचेतन विरोध की तरह दिखाई दिया। संकरी गली में जीवन की क्रूरता के विरूद्ध जार्ज का पहला प्रतिवाद।

‘वोल्गा, वोल्गा’, जार्ज ने गाया और सीधे खड़े होने की कोशिश की। उसने डकारा और कै कर दी। बेलग्रेड, असंख्य ‘टू-लेट’ का नगर। उसके बीच में से जाड़े की धुंध भरी शाम को भी पसीने से नहाया, मैं चीजों से भरी गाड़ी को तेराजिया चैराहे से प्रोकोप जिले की तरफ खींच रहा हूं। मेरे पीछे मां और जार्ज पैर घसीटते चले आ रहे हैं। जार्ज का कुछ पैसा बच गया है।

काफी रात तक हम चलते रहे। तब कहीं तंग-गली जैसी ही एक कोठरी में पहुंचे।

अब मैं अकेला हूं। दो मिट्टी के टीलों ने मां और जार्ज की जगह ले ली हैं। एक पर सलीब के साथ फूल मालाएं भी हैं। दूसरे पर सिर्फ सलीब हैं, फूल मालाएं नहीं।
नहीं, मैं अकेला नहीं हूं। मैंने ऐसी हजारों खानाबदोशियां देखी हैं और ऐसे हजारों माओं और जार्जों को भी देखा है। मैंने हजारों मांओं और जार्जों को एक कोठरी से दूसरी कोठरी तक मुत्युपर्यंत चलते देखा है। मैं इससे कभी समझौता नहीं करूंगा।

अचानक ही मैं उससे मिला। नवम्बर की एक दुपहर हमलोग मिले और बाग में बैठे रहे। बचपन में लिखे हुए कुछ पद्यांश मुझे याद आ गए।

मां, कब तक वे धूल में पड़े रहेंगे?

ये टूटे सांचे, जो थे कभी हमारी संवेदनाएं।

मैं हंसा और उससे कुछ नहीं कहा। मैं खुद नहीं जानता था कि मुझे हंसी क्यों आई। इस माह जब मैं नई जगह आया तो मैं अपनी किताबों और टूथ ब्रश के साथ, ऊनी दस्ताने भी लेता आया जो उसने मेरे लिए चुने हैं।

चेदोमिर मिन्दारोविच

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