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उत्तरप्रदेश विजय के निहितार्थ

उत्तरप्रदेश के विधानसभा चुनावों में नरेन्द्र मोदी की जीत और अखिलेश यादव की हार के यूँ तो कई मायने हैं, लेकिन मैं जिस मानी को देख रहा हूँ वो यह कि नरेन्द्र मोदी की यह जीत सिर्फ नरेन्द्र मोदी ही नहीं, बीजेपी की जीत की भी पराकाष्ठा है.
इस अप्रत्याशित जीत ने इस धारणा को तोड़ा है कि यादव मुस्लिम गठजोड़ या दलित मुस्लिम गठजोड़ से विजय का रास्ता निकलता है. अखिलेश यादव और मायावती जिस तरह से लहूलुहान होकर गिरे हैं, उससे यह पता चलता है कि मुस्लिम वोट बैंक के सहारे सत्ता पाने का फॉर्मूला फ्लॉप हो गया है.

मुस्लिम बहुल इलाकों में भी नरेन्द्र मोदी जी को जिस तरह से वोट मिले, उससे अनुमान मिलता है कि मुसलमानों में भी सिर्फ वोटबैंक बना दिए जाने से रोष है. सब विकास चाहते हैं. घर घर शौचालय चाहते हैं. गरीबी से निजात चाहते हैं. नरेन्द्र मोदी ने जिस तरह से रैलियाँ कर बढ़ चढ़कर लोगों से वादे किए हैं, उससे लोगों को लगा है कि एक बार इसको भी देकर देख लो. मुसलमानों को भी ऎसा लगा है. ज्यादा हुआ तो क्या होगा 2019 तक ही न. 60 साल औरों ने ठगा, कुछ साल इनको आजमा लेते हैं. हिन्दू हिन्दू करने वाले हिन्दुओं के लिए सड़क बनायेंगे, स्कूल बनायेंगे, अस्पताल बनायेंगे, शौचालय बनायेंगे, तो क्या मुसलमानों को इन सहूलियतों से वंचित रखेंगे ! नहीं न ! तो फिर बीजेपी से परहेज क्यों ? बीजेपी अछूत क्यों?

पिछले 60 सालों में मुसलमान होने के नाम पर सत्ता से क्या क्या मिला और किसने कैसा इस्तेमाल किया, ये सबने देखा है. गुजरात, मध्यप्रदेश, राजस्थान में पिछले कई सालों से सरकारें हैं, मगर मुसलमानों को कहीं अस्तित्व का खतरा नहीं है. यह उदाहरण भी सबके सामने है. अमित शाह का यह कहना कि मुसलमान हैं, इसलिए टिकट दो, इस रणनीति पर चलने के बजाय सबका विकास हो, यह जरूरी है, मुझे लगता है, मुसलमानों को भी आकर्षित किया है. और निश्चित तौर पर यह देश के राजनीतिक परिदृश्य में नया संदेश लेकर आया है. उम्मीद लेकर आया है. केवल सवर्णों के लिए ही नहीं, दलितों, पिछड़ों और मुसलमानों के मन में नई उम्मीद जगी है.

इस उम्मीद के पीछे सबसे बड़ी वजह है नोटबंदी. हालाँकि चुनाव प्रचार के दौरान किसी पार्टी या नेता ने इसे मुद्दे के तौर पर उछाला नहीं, लेकिन आम आदमी, खासकर गरीबों को नोटबंदी से खुशी हुई थी कि मोदी ने अमीरों के घरों से काला धन निकाल लाया. पड़ोस के डॉक्टर साहब, गुप्ता जी, शर्मा जी को परेशान देखकर गरीब खुश हुए कि जनाब फँसे ! नीतीश कुमार ने गरीब आदमी के मन में दौड़ रही खुशी को पहचाना था, इसलिए काँग्रेस और लालू प्रसाद के साथ सरकार चलाने के बावजूद विपक्ष की नोटबंदी मुहिम से वह दूर ही रहे और कह डाला कि नोटबंदी के सुपरिणाम आयेंगे.

और अब, जब सारे जातीय और धार्मिक गठजोड़ नरेन्द्र मोदी के सामने धराशायी हो गये, विपक्ष में सिर्फ एक नेता दिख रहा है नीतीश कुमार, जिसमें दूरदर्शिता है. केजरीवाल के बड़े बोलों ने उनकी मिट्टी पलीद कर दी है, जबकि नीतीश कुमार कुख्यात लालू प्रसाद और भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी काँग्रेस के सहारे सत्तासीन होने के बावजूद सुशासन बनाये रखने में सफल हैं.

सच कहें, तो नीतीश कुमार घोषणाओं और वादों को अमली जामा पहनाने में लगे हैं, और इस क्रम में वह नरेन्द्र मोदी से भी आगे निकलते दिख रहे हैं. वह जानते हैं, जाति और धर्म की राजनीति उन्हें सत्ता में बनाये नहीं रख सकती, क्योंकि जिस जाति से वह आये हैं, उनका संख्याबल काफी कम है. बमुश्किल 4 से 5 प्रतिशत. बीजेपी के साथ लंबे समय तक साथ रहने की वजह से मुसलमानों के लिए लालू ज्यादा बड़े और विश्वसनीय नेता हैं. लिहाजा नीतीश कुमार ने विकास का रास्ता पकड़कर चलना ही उचित समझा है.

तूफान की गति से सड़कें बन रही हैं, कहीं से भी लोगों का राजधानी पटना पहुँचना आसान हुआ है. लालू जी के साथ आने की वजह से अपराधियों का हौसला थोड़ा बढ़ा जरूर था, लेकिन नीतीश जी का मंत्र कि कानून अपना काम करेगा, उनपर नकेल कसने में कारगर हुआ है. आइएसएस लॉबी के भारी दबाव के बावजूद वरिष्ठ आइएएस ऑफिसर और बीपीएससी के चेयरमैन को जेल भेजा जाना और एसएससी प्रकरण में बिहार विद्यालय परीक्षा समिति के हमजाति चेयरमैन को जेल भेजना नीतीश कुमार के पक्ष में जाता है कि वह भ्रष्टाचारियों को बचाने वाले नहीं हैं.

शहाबुद्दीन को वापस जेल भेज देने में समय नहीं लगाने की घटना ने भी नीतीश कुमार की छवि को मजबूत बनाया है. वहीं शराबबंदी ने उन्हें बिहार में समाज सुधारक के तौर पर पेश किया है. शराबबंदी के कड़े कानून ने बिहार के जनजीवन पर गहरा प्रभाव डाला है. शराबी भी कह रहे हैं कि अच्छा हुआ. महिलाओं के जीवन में खुशहाली आई है. पैसे की तंगी और पति और बेटों की पिटाई से भी निजात मिली है. सड़कों पर होनेवाले ऎक्सीडेंट में भारी कमी आई है. इसके अलावा नीतीश कुमार ने जो बड़ा काम किया है वह यह कि महिलाओं को बराबरी का अधिकार दिया है. राजनीति हो या सरकारी नौकरी, दोनों क्षेत्रों में महिलाओं को 50 प्रतिशत का आरक्षण दिया है.

यह पूरे देश के राजनीति और समाज के लिए उदाहरण है. देश की संसद दशकों से महिलाओं को 33 प्रतिशत का हिस्सा देने से कतरा रही है, लेकिन नीतीश कुमार ने बिना किसी आंदोलन के बिहार में महिलाओं को मजबूती दी है. यह बड़ा काम है और इसके बडे संदेश भी हैं. नरेन्द्र मोदी के सामने यह चुनौती की तरह है. क्या नरेन्द्र मोदी भी ऎसा कानून संसद में पास करवाएंगे ? अगर करवा पाते हैं, तो देश बड़े बदलाव की ओर बढ़ चलेगा और इसके सूत्रधार निर्विवाद रूप से नीतीश कुमार ही माने जायेंगे.

इसके अलावा, स्वच्छता अभियान हो या घर घर बिजली पहुँचाने और शौचालय की बात हो, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की महत्वाकांक्षी घोषणाओं को पूरे कमिटमेंट के साथ लागू करने में जुटे हैं नीतीश कुमार. अखिलेश की हार के बाद जहाँ नरेन्द्र मोदी अजेय बनकर उभरे हैं, वहीं नीतीश का चेहरा भी धूमकेतु की तरह चमका है. यकीनन मैं यह समय से पहले कह रहा हूँ, लेकिन यह सत्य है कि आनेवाला लोकसभा चुनाव नरेन्द्र मोदी बनाम नीतीश कुमार ही होने जा रहा है.

नालंदा, बिहार के रहने वाले धनंजय कुमार पेशे से फिल्मकार हैं। वे मुंबई में रहते हैं। 

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  1. anubhava sinha

    ख्याल अच्छा है लेकिन राजनितिक वास्तविकताओं से उतना ही दूर भी। फिर भी कयास लगाने में हर्ज़ क्या है ? सम्भव है कोई नयी रह निकल ही आये !!!!!!!!!!

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