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उनके अब्दुस, हमारे मक़बूल !

वर्ष 1936, पंजाब प्रांत के एक छोटे-से क़स्बे झांग की एक पाठशाला में छात्रों को प्रकृति के मूलभूत बलों के बारे में बताया जा रहा था। शिक्षक ने पहले गुरुत्वाकर्षण बल के विषय में बताया। सभी छात्र इससे वाक़िफ़ थे। गुरुत्वाकर्षण बल की वजह से ब्रह्माण्ड में मौजूद हर वस्तु दूसरे वस्तुओं को अपनी ओर आकर्षित करती है। शिक्षक ने आगे बताया, ‘विद्युत् बल। हाँ, पर यह हमारे क़स्बे में नहीं होता, यह सिर्फ राजधानी लाहौर में होता है।’ ‘और नाभिकीय बल, यह सिर्फ यूरोप में।’

कक्षा में बैठे दस वर्षीय अब्दुस शायद बड़े ध्यान से इन बातों को सुन रहे थे। 1926 में झांग (वर्तमान पाकिस्तान) के अहमदी मुस्लिम परिवार में जन्में अब्दुस, मोहम्मद अब्दुस सलाम, जो आगे चलकर सैद्धांतिक भौतिकी के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण योगदान देने वाले थे।

ब्रह्माण्ड में चार मूलभूत बल हैं – गुरुत्वाकर्षण, विद्युत्-चुंबकीय और दो तरह के नाभकीय बल। ये चारों बल हर जगह हर वक़्त सभी प्रक्रियाओं में शामिल होते हैं। पिछली सदी में भौतिकशास्त्रियों ने इन बलों की आभ्यंतरिक संरचना को समझने की काफी कोशिशें की है। इन कोशिशों का एक प्रभावशाली परिणाम साठ के दशक में आया जब अमेरिकी वैज्ञानिकों शेल्डन ग्लैशो और स्टीवन वाइनबर्ग और पाकिस्तान के अब्दुस सलाम के शोध से यह साबित हुआ कि विद्युत्-चुंबकीय और कमज़ोर नाभकीय बल एक एकीकृत बल की ही दो अलग-अलग अभिव्यक्तियाँ हैं। इन तीनों वैज्ञानिकों को इस खोज के लिए 1979 के भौतिकी के नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। सलाम विज्ञान के क्षेत्र में नोबल पुरस्कार से सम्मानित किये जाने वाले पहले मुस्लिम और पहले (और इकलौते) पाकिस्तानी थे।

अब्दुस सलाम के योगदान केवल सैद्धांतिक भौतिकी में शोध तक ही सीमित नहीं थे। वे एक असाधारण शिक्षक भी थे। सत्तर के दशक में उन्होंने इटली में सैद्धांतिक भौतिकी के एक अंतरष्ट्रीय केंद्र की स्थापना की और साथ ही कई वर्षों तक दुनिया के कई विकासशील देशों के वैज्ञानिक प्रोन्नति में अपना सहयोग देते रहे।

1960 से 1974 तक सलाम पाकिस्तानी राष्ट्रपति के वैज्ञानिक सलाहकार थे और अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने पाकिस्तान के अंतरिक्ष और परमाणु कार्यक्रमों की नींव रखी। पाकिस्तान में विज्ञान और तकनीक को बढ़ावा देने के लिए पिछले सत्तर वर्षों में शायद ही किसी और वैज्ञानिक ने इतना योगदान दिया है जितना दो दशकों से भी कम वक़्त में सलाम ने।

चीज़ें तब बदल गयीं जब 1974 में पाकिस्तानी संसद ने अहमदी समुदाय को गैर-मुस्लिम घोषित कर दिया। अब्दुस सलाम इस फरमान के विरोध में पाकिस्तान छोड़कर लंदन चले गए। 1979 में नोबल पुरस्कार से सम्मानित किये जाने के बाद इस्लामाबाद के क़ायद-ए-आज़म यूनिवर्सिटी ने उन्हें एक समारोह में आमंत्रित किया। जब सलाम इस्लामाबाद पहुंचे तो धार्मिक समूहों ने काफी हंगामा किया और सलाम को विश्वविद्यालय परिसर में प्रवेश नहीं करने दिया।

सलाम ने अपने जीवन के आखिरी दो दशक अपने वतन से दूर बिताये। हालाँकि इस दौरान भी वे पाकिस्तानी छात्रों और युवा वैज्ञानिकों का लगातार मार्गदर्शन करते रहे। 1996 में उनकी मृत्यु के बाद उन्हें उनकी इच्छानुसार पाकिस्तान में ही दफ़नाया गया। उनके कब्र पर लिखा गया: ‘पहला मुस्लिम नोबल पुरस्कार विजेता’। हालाँकि कुछ समय बाद पाकिस्तानी सरकार ने उनकी कब्र पर से ‘मुस्लिम’ शब्द हटा दिया। पाकिस्तान जैसे धार्मिक अतिवाद से ग्रसित एक राष्ट्र से शायद और कुछ उम्मीद भी नहीं की जानी चाहिए।

पर ऐसा नहीं है कि हम अपने पड़ोसी मुल्क़ से इस मामले में काफी बेहतर या अधिक प्रगतिशील हैं। धार्मिक अतिवाद से हम भी उतने ही ग्रसित हैं जितना की पाकिस्तान। धर्म के नाम अपने धरोहरों को अगर पाकिस्तान ने खोया है, तो हमने भी।

और शायद इसी वजह से अब्दुस सलाम की चर्चा करने पर अनायास ही मक़बूल फ़िदा हुसैन याद आ जाते हैं। बीसवीं सदी के दूसरे दशक में भारत में जन्मे हुसैन अपनी कला में विविधता और गहनता के लिए मशहूर थे। पर अब्दुस की तरह मक़बूल ने अभी अपने जीवन के आखिरी वर्ष अपने वतन से दूर आत्मारोपित निर्वासन में बिताये। अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त यह कलाकार अपनी इच्छा के बावजूद भी अपने जीवन के अंतिम दिन अपने वतन में नहीं बिता पाया। शायद यह संभव था भी नहीं – उनका वतन उन्हें मौत की धमकियों के अलावा कुछ और दे भी नहीं पा रहा था।

हुसैन के विषय में कहा जाता है कि वे अपनी कलाकृतियों के माध्यम से मानवीय संवेदनाओं को आवाज़ दे जाते थे, पर जीवन के आखिरी वर्षों में उनकी बातों को सुनने वाला शायद ही कोई था। जिस कलाकार ने गाँधी और टेरेसा जैसे महामानवों को अपने कैनवस पर उकेरा, उसी कलाकार को हमने एक धरोहर की तरह सहेजने की बजाय बड़े आराम से दरकिनार कर दिया। कलात्मक अभिव्यक्तियों को समझने की क्षमता हर किसी में नहीं होती, पर इसका यह अर्थ तो नहीं कि आप अपनी जड़ता की वजह से किसी और को सूली चढ़ा दें।

पर संवेदनाओं को समझने की कोशिश करने से कहीं अधिक आसान अपनी आँखों को बंद कर किसी और को सूली चढ़ाना है – फिर चाहे सूली पर चढ़ाया जाने वाला कोई भी क्यों न हो। अपने धरोहरों की फ़िक्र करने से ज़्यादा आसान भीड़ के साथ चलते जाना है – फिर चाहे वह भीड़ कहीं भी क्यों न जा रही हो।

अनूप आनंद सिंह
पांचवें वर्ष बी एस एम एस के छात्र
भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान, पुणे
फिलवक्त इंटरनेशनल सेंटर फॉर थ्योरेटिकल साइंसेज, बेंगलुरु में दीर्घकालिक विज़िटिंग छात्र

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