+91 943 029 3163 info@biharkhojkhabar.com

एक गोरखा गुज़रा है सीटी बजाता हुआ~संदर्भ: विनय सौरभ की कविताएँ

संथाल परगना का यह छोटा-सा गाँव : नोनीहाट
जो असल में अब गाँव भी नहीं रहा
क़स्बा कह सकते हो
लेकिन इसकी पहचान पर
अब शहर के कपड़े हैं

छोटे-से बस स्टॉप पर जब उतरोगे
पूछोगे मेरे यहाँ आने का रास्ता
वहाँ जलपान की दो-चार दुकानें होंगी
तीन रिक्शे, पाँच ठेले और कुलियों की एक छोटी जमात

वही बताएँगे… हाँ, कौन…?
वही, वैद्यनाथ बाबू का लड़का, जो दोहा करता है।
– विनय सौरभ

कविता हरेक के बारे में हरेक बात की चश्मदीद होती है– एक कवि कितना बोलता है, कितना मौन रहता है। कितना इस जीवन को जीता है या कितना इस जीवन को मारता है। यह सच है, एक कवि अगर नादाँ कवि है, तो वह अपनी कविता में जीवन को मारता भी है, जीवन को बिना देखे जीवन के बारे में बेधड़क लिखते हुए। इसमें कुछ भी अचरज जैसा नहीं है कि कविता कवि-आत्मा की ध्वनि है, जिस ध्वनि को कवि सुनता है, उसे ही गुनता रहता है, कविता को अपने लिए मनुष्य जाति का आदिम संगीत बनाते। कविता को अपने लिए मनुष्य जाति का आदिम रंग बनाते। कविता को अपने लिए मनुष्य जाति का आदिम ढंग बनाते। अब जो बेढंग कवि होते हैं, वे ही तो रोज़ कविता का जीवन ख़राब करते हैं।

कोई बेढंग कवि कविता के बारे में यह नहीं मानता कि एक कविता चमचम बहती वह आदिम नदी है, जिसमें नहा-धोकर हर कवि अपने को ताज़ादम करता रहा है, पूरी पवित्रता से। जबकि ढेर सारे बेढंग कवि इस चमचम बहती हुई आदिम नदी में बस अपने हिस्से का कचरा फेंकते जाते हैं। जिस तरह हम-आप किसी नदी में जाकर अपने जीवन का कचरा बहा आते हैं और मान लेते हैं कि ऐसा करते हुए हमारा जीवन सफल, सार्थक, फलदाई हो गया। यह नहीं सोचते कि उस नदी का क्या हो गया। उस नदी का कितना कुछ हमने मैला कर दिया। ठीक वैसे ही कविता के नाम पर कचरा लिखने वाला कवि यह मान लेता है कि उसने जो लिखा, ऐसा तो कोई लिख नहीं रहा विश्व-कविता में। यह कूड़ा-करकट किसके काम आता है, ख़ुद उस कवि के भी नहीं, जिसने कविता के नाम पर कूड़ा लिखा और कविता के जीवन के साथ-साथ कविता का जादू, कविता का रहस्य, कविता का वायु तक ख़राब किया।

संभव है, आप मेरे विचार से सहमत ना हों। संभव है, आपको मेरा लिखा कूड़ा ही लगता आया हो। तब भी यह निवेदन तो मैं कर ही सकता हूँ कि आप कविता लिखते हो, तो विनय सौरभ जैसी कविता लिखो। तभी कविता की यह आदिम बहती हुई नदी अनवरत बहती रहेगी।

विनय सौरभ कविता-संसार के उन कवियों में हैं, जिनकी हर कविता में यह चमचम आदिम नदी बहती दिखाई देती है, अपनी चमक थोड़ी और अधिक बढ़ाती हुई। विनय सौरभ की हर कविता में जीवन की ध्वनि सुनाई देती है। विनय सौरभ की हर कविता में आपका अपना परिवार दिखाई देता है, पिता की शक्ल में, माँ की शक्ल में, भाई की शक्ल में, बहन की शक्ल में, पत्नी की शक्ल में, बेटे-बेटी की शक्ल में, दोस्त की शक्ल में। प्रेमिका के शक्ल में भी :

घड़ी की टिक-टिक सुनाई पड़ रही है
और एक नल जो ठीक से बंद नहीं हुआ है
माँ के लगातार खाँसने की आवाज़ें हैं
बहनें इस घर से विदा ले चुकी हैं
बड़ा भाई आज की रात किसी दूसरे शहर में है

महेंद्र, मेरे बचपन का दोस्त जो अपने पिता की अप्रत्याशित मृत्यु के बाद
बचपन से ही सब्ज़ियों के कारोबार में लगा था
अपने पिता की उम्र में ही दो महीने पहले मरा दर्दनाक तरीक़े से

एक गोरखा गुज़रा है सीटी बजाता हुआ गली से
पिता की तस्वीर पर जमी धूल सुबह पोंछूँगा
एक बंगाली मित्र की याद आ रही है
कब उसे उधार लेने की आदत पड़ गयी, पता नहीं
अब वह मुख्य रास्ते से कहीं नहीं आता जाता

जिन हरे भरे पहाड़ों के नीचे हमने साल का पहला दिन गुज़ारा
बदरंग और अजीब शक्लों का बना दिया उसे पहाड़चोरों ने

माँ की खाँसी थम नहीं रही है
रात एक पैंतालीस की हुई है।

विनय सौरभ की कविता उस आदमी का संत्रास बयाँ करती है, जो आदमी अपने जीवन में जीवन की यातना सह रहा होता है। जो आदमी अपना सर्वस्व दाँव पर लगाए रहता है। जो आदमी विवश है। जो आदमी अभिशप्त है। जो आदमी कभी किसी झील का राजहंस नहीं हो पाता है। और जिस आदमी के पास कठिनाइयों से भरा जीवन जीने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है। लेकिन यह वह आदमी भी है, जिसे आपकी सहानूभूति नहीं चाहिए होती है। विनय सौरभ सहानूभूति चाहने वाले कवि हैं भी नहीं। ना आपकी कृतज्ञता इन्हें चाहिए होती है। विनय सौरभ ऐसे कवि हैं, जो अपने आसपास जी रहे, संघर्ष कर रहे, मर रहे आदमियों का अकेलापन देखते हैं, तो अपना वायलिन संभालते हैं और जीवन का कभी ना ख़त्म होने वाला राग छेड़ देते हैं। यही वजह है कि विनय सौरभ की दुनिया में यातना है, त्रासदी है, अकेलापन है, तनाव है, प्रेत है। लेकिन विनय सौरभ अपने आसपास की दुनिया का सारा घटित-अघटित अपने बूते संभालते हैं। यानी जीवन का प्रेत ये अपनी कविता की शक्ति के बूते मार भगाते हैं।

सच यही है, विनय सौरभ की कविता प्रकाश की कविता है, जिस प्रकाश में इनका पूरा मनुष्य-संवाद यहाँ से वहाँ तक फैला हुआ दिखाई देता है। विनय सौरभ की अपनी धरती है। आकाश भी अपना है। सूरज भी, चाँद भी अपना है। पानी, पेड़, फूल, संगीत अपना है। विनय सौरभ की कविता खरगोश के बाल की तरह मुलायम है, तो खरगोश के दाँत की तरह तेज़ और पैनी भी है। यानी विनय सौरभ अपने समकालीन कवियों में ज़्यादा विलक्षण कवि हैं। यार और दोस्त कवि भी। विनय सौरभ एक यारबाज़ और दोस्तबाज़ कवि हैं, तभी इनकी कविता अपने आसपास के आदमियों से एक यार, एक दोस्त की तरह बतियाती हुई अपने घर तक पहुँचती है।

यही वजह है, आप अगर अपने घर लौटते हुए लेट हो जाते हैं, तो आप अपने घर पहुँचने की देरी से घबराए हुए दिखाई नहीं देते। आपको पता है कि आपके घर लौटने से पहले विनय सौरभ की कविता आपके घर किसी अपने की माफ़िक पहुँच चुकी होगी और आपकी ख़बर दे चुकी होगी कि आप जहाँ कहीं पर हैं, ख़ैरियत और आफ़ियत से हैं :

तबादले का मतलब
एक शहर के जीवन से सभी चीजों का छूटना नहीं है

एक शहर से विदा होने का मतलब
स्मृतियों और यादों का समाप्त हो जाना नहीं है

मैं कमान से निकला हुआ तीर नहीं हूँ जो नहीं लौटूंगा फिर

मैं लौटूँगा तुम्हारे पास
पर उस तरह से नहीं
जैसे लौटकर आते हैं
हर बरसात में इस देश के कुछ हिस्सों में प्रवासी पक्षियों के समूह

या जैसे लौट आते हैं
बसंत के महीने में पेड़ों पर नए पत्ते
या शाम आती है जैसे
नहीं लौटूँगा उस तरह से

जीवन में उम्मीद और किनारों पर लहरों की तरह लौटूँगा
मैं तुम्हारी नींद में लौटूँगा
किसी सुंदर सपने की तरह
लौटूँगा तुम्हारी त्वचा और साँस में हवाओं के साथ

शायद लौटूँ पंछी बनकर और तुम्हारे कमरे के रोशनदान पर बसेरा करूँ
बहूँ तुम्हारे रक्त में तुम्हारे कुँए का जल बनकर

बिखरूँ…
गुनगुनी धूप का टुकड़ा बनकर
सर्दियों के दिनों में तुम्हारी छत पर

देखना, तुम्हारे घर की ख़ाली ज़मीन पर बनस्पति बनकर उगूँगा
और चौके में आऊँगा तुम्हारे पास

तुलसी की पत्तियाँ बन जाऊँगा तुम्हारे आंगन में
तुम खाँसी की तकलीफ़ में उबालकर मुझे पीना

देखना मैं लौटूँगा कुछ ऐसे ही
और वह लौटना दिखाई नहीं देगा।

अथवा,
कोठे के अमावस अंधेरे में एक बहुत पुरानी गठरी में रखे थे वे पुराने कपड़े
वे इतने पुराने थे कि स्मृतियाँ भी साथ नहीं दे रही थीं

हाँ, वे इतने पुराने थे कि रोमाँच, कौतूहल और जिज्ञासाओं का घर बना रहे थे
ज़रा पुराने कपड़ों की ताक़त तो देखिए

अब माँ है तो पिता के सूट की पहचान है
नौकरी के पहले पैसे से ख़रीदे गए कपड़ों की हल्की-सी उपस्थिति भर है
स्मृतियों में और आश्चर्य है कि कुछ भी नहीं

वे पुराने थे और उनमें एक अज्ञात आकर्षण था
इन कपड़ों के चलते हमें पिता का पुराना चेहरा याद करने की ज़रूरत पड़ रही थी

उनमें एक खिंचाव था और हम पुराने घर की बसावट को भी याद कर रहे थे
हम उन कपड़ों को पुरानी तस्वीरों में ढूँढ़ रहे थे

कुछ पुरानी साड़ियां थीं
उनमें एक ठेठ गृहस्थ स्त्री की महक थी
उनमें एक खोया हुआ अतीत था जिसे जानने कि हममें जल्दीबाज़ी मची हुई थी

रंग उतने ही धुँधले पड़ गए थे जितनी कि घर के सबसे पुराने आदमी की यादाश्त

हैसियत खो चुकने के बाद आदमी कि जैसे मिट जाती है पहचान
सोचिए पुराने कपड़ों की क्या बिसात

कपड़े
जिन्हें ख़रीदने को हम कितनी गर्मजोशी से पिता की उँगली पकड़कर जाते हैं बाज़ार

जिन्हें पहनकर उभरते हैं मन में कितने ही रंग

…एक दिन पुराने पड़ जाते हैं
और बिना किसी आहट के चुपचाप एक रोज़ आँगन की अलगनी से ग़ायब हो जाते हैं।

या कविता का यह रंग आप देखिए,
बेशक यह किराए का ही है
पर है अभी मेरा

मेरे कुछ पुराने दिन जो सख़्त थे
और मेरे उड़े हुए चेहरे पर हँसते थे
तब इस कमरे ने मुझसे बातें की थीं
मेरे जलते हुए तलवे सहलाए थे

शुरू के दिन थे –
इस पर बहुत प्यार आया था
छीजते हुए आत्मविश्वास और श्राप से भरे हुए दिनों में
पूरे विश्वास से इसमें लौटता था मैं

सर्दियों की एक कठिन रात में
एक बार बस अड्डे पर उतरा था
तो इस पराए शहर में मेरे पास एक कमरा था
इस विश्वास ने कितना बल दिया था

ख़राब दिनों में उम्मीद से भरे होने का साक्षी सिर्फ़ यह कमरा है

सपनों से भरे एक आदमी को धीरे-धीरे ख़ाली होते देखा है इसने
कुछ लिखते देर- देर रात तक और सुबह उसे चिंदियों में बदलते हुए
धीमी गति से ज़िंदगी में रखी चीज़ों को उदास और बेरंग होते देखा है

…और कविता की नब्ज़ को
डूबते हुए

अब तो एक पराए शहर में
एक अनजान आदमी के लिए हौसला दिलाने वाले हाथ भी नहीं दिखते

शुक्र है –
इस कमरे में सुबह-सुबह अब हरि प्रसाद चौरसिया की बाँसुरी गूँजती है
और दीवार पर लगी तस्वीर में वह प्यारा बच्चा शाम को कमरे में लौटने पर मुस्कुराता है।

विनय सौरभ एक ऐसे कवि हैं, जो आपके सिर पर अगर तेज़ धूप या तेज़ बारिश हो रही है, तो अपना छाता आपको सौंपकर ख़ुद तेज़ धूप या तेज़ बारिश में चलना पसंद करते हैं। ऐसा करना इन्होंने अपने पिता से सीखा है। पिता भी कैसे, जो ताँगा चलाते हैं, रिक्शा चलाते हैं, ठेला चलाते हैं, कारख़ाने में काम करते हैं, पान बेचते हैं, चाय बेचते हैं और जलेबी भी बेचते हैं। जीवन का जो ताना-बाना विनय सौरभ अपनी कविता में बुनते हैं, सच है बहुत सारे कवि नहीं बुन पाते। ऐसा इसलिए कि जीवन को निकट से जो देखेगा, वही ना रचेगा सच्चे जीवन की कविता। और एक सच यह भी है कि सच्चा जीवन जलेबी की तरह मीठा तो क़तई नहीं है रे भाई, ना रसमलाई की तरह मज़ेदार मोरे भय्या! आपका जीवन सांगीतिक अनुष्ठान से भरा है, तो मेरी और विनय सौरभ की बला से। बकियों का जीना आप वाला जीना थोड़े ही ना है, जो आप मुँह बिचकाए फिर रहे हैं, हमारे हमेशा परेशानियों से भरा जीने का तरीक़ा देखकर। लेकिन जो जीना आप जी रहे मलाई से भरा, वह तो एक तरह का फ़र्ज़ी जीना है।

जो जीवन हमारे पिता जीते रहे, वही सच्चा जीना विनय सौरभ की कविता की असली ताक़त है। हमारे पिता ही तो जीवन का असल सुर साधते रहे और अब विनय सौरभ साध रहे हैं अपनी कविता में। यही वजह है कि एक पिता का संघर्ष विनय सौरभ की कविता में एक स्थाई भाव की तरह आता रहता है। जीवन का विराट राग एक पिता में ही तो बजता रहा है। यह विराट राग बजता ही रहेगा, जब तक दुनिया बची हुई है पिता के काँधे पर सुरक्षित बिलकुल। तभी कौतुक हैं पिता ‘तो तय था / पिता चले गए थे / माटी हो चुके थे / लेकिन दुनिया वैसी की वैसी रही / विस्मय से भर गए हम।’ विनय सौरभ सही ही तो कहते हैं, पिता मरकर भी ज़िंदा रहते हैं, ताँगा वाले की शक्ल में, रिक्शा वाले की शक्ल में, ठेला वाले की शक्ल में, मज़दूर की शक्ल में।

‘बूझो तो जानें’ की आवाज़ अब अकसर गूँजती है। यह आवाज़ आती कहाँ से है… ससंद के गलियारे से, विधान सभा के गलियारे से। ऐसे मुहावरे छोड़कर मुल्क के पालनहार अब भी नंगे पाँव चल रहे आदमी का मज़ाक़ उड़ाते हैं, जबकि आम आदमी का तो सिर्फ़ पाँव नंगा रहता है, मुल्क के पालनहार पूरे ही नंगे होकर घूम रहे हैं विधान सभा से लेकर संसद तक। नंगा होकर नाच वे ही रहे हैं, भौंक भी वे ही रहे हैं, हग-मूत भी वे ही रहे हैं हमारे मुल्क की छाती पर। वे ही तो कितने पिताओं को एक रोटी तक के लिए तरसाते रहे हैं। पिता की हत्या तक करते रहे हैं। लेकिन पिता सबकुछ बूझते हैं, तभी पिता किसी राजधानी की तरफ़ टकटकी लगाए बैठे नहीं रहते, अपने साहस से अपने घर को रंगते रहते हैं और सत्ता का सुख मार रहे लोगों को इस तरह चिढ़ाते रहते हैं। विनय सौरभ भी एक अच्छे पिता की हैसियत से यही करते हैं और सत्ता के झूठ के बाज़ार को ढाते हैं, ‘हमारी दुनिया में / कोई भी दृश्य साफ नहीं है / हत्यारे घूम रहे हैं खुलेआ / और अख़बारों में उनके भूमिगत होने के अनुमान हैं / तह करके रखा हुआ अख़बार / काम के बाद घर लौटते पिता की नज़रों से बचा लेना चाहता हूँ।’

विनय सौरभ को पढ़ते हुए यह आपको कभी नहीं लगेगा कि इस कवि के भीतर कहीं कोई संशय दुबककर छिपा बैठा है। यह विनय सौरभ का आत्मसंघर्ष है, जो इन्हें हर संशय से दूर रखता आया है। यह सही भी है, कवि अगर संशय में रहेगा, तो उस कवि का आत्मसंघर्ष बिंदास पर्दे से बाहर कैसे आएगा। यही ख़ास वजह है कि हम विनय सौरभ की कविता पढ़ते हुए यह कभी महसूस नहीं करते कि यह किसी डरे, सकुचाए, सहमे हुए की कविता है। बल्कि यह कविता उस नेपाली बहादुर की तरह है, जो ख़ुद रात भर जागते हुए आपको अच्छी नींद देता आया है। यही ख़ास वजह है कि विनय सौरभ हमेशा कविता को एक नया और असाधारण इलाका देते हैं। विनय सौरभ कविता की जो दुनिया बना रहे हैं, इस दुनिया में इनकी अपनी जीवन-दृष्टि है, जो दृष्टि इतना सारा कुछ हमारे घर के अंदर का घर की दीवारों को चीरते देख लेती है कि हमारे घर की गिरी सूई तक यह कवि देख लेता है। विनय सौरभ की इस पैनी दृष्टि का कमाल यही है कि ये जब कवितारत होते हैं, पूरी सांस्कृतिक बहुलता के साथ कवितारत होते रहते हैं। विनय सौरभ की यह सांस्कृतिक बहुलता जीवन की, मनुष्य की, एक घर की भी बहुलता जो है :

वह जो एक दिन दरवाज़े पर आ खड़ा हुआ
बांग्ला में बोला :
किताबों पर जिल्द चढ़ाता हूं
किसी ने बताया कि आपके यहां किताबें बहुत हैं
कुछ किताबें देंगे हमें दादा
बंगाल से आए हैं

वह सुबंधु था
समय की मार खाया हुआ चेहरा लिए अपना घर-बार छोड़ आया था
उसने हमारे यहां पचासों ज़र्ज़र किताबों को जीवन दिया
पत्नी और एक छोटे बच्चे को साथ लिए बंगाल के किसी गाँव से निकल आया था सुबंधु
कौन पूछता है अब जिल्दसाज़ को? किसके लिए ज़रूरी रह गई हैं पुरानी किताबें? 

सुबंधु तुम जिल्दसाज़ कैसे बने?
क्या तुम्हारे पिता जिल्दसाज़ थे?
तुम इतने अच्छे जिल्दसाज़ कैसे बने सुबंधु?
मैं बार-बार पूछता था

कितनी ख़ुशी होती थी उसका काम देखकर
कितनी सफ़ाई थी उसके काम में कि पुरानी किताबों से प्यार बढ़ता ही जाता था

दिन बीतते जाते थे और जिल्दसाज़ के चेहरे पर निराशा बढ़ती जाती थी
जिल्दसाज़ी के लिए और किताबें नहीं मिल रही थीं गाँव में
वह पूरे इलाके में पुरानी किताबों की तलाश में भटक रहा था

एक सर्द शाम को जब सबके घरों के दरवाज़े बंद हो रहे थे
और कोहरा घना हो रहा था, सुबंधु आया
बोला : दादा काम नहीं मिल रहा
कोई दूसरा काम भी तो नहीं आता
अपने देश लौट जाना होगा दादा

यह सब कहते हुए दुख का कोहरा
मैंने देखा जिल्दसाज़ के चेहरे पर और घना हो रहा था

वह किताबों की आलमारी की तरफ़ देख रहा था
और असहज कर देने वाली चुप्पी के साथ

मेरा और मेरे बड़े भाई का चेहरा फ़क्क था

इन दिनों हम रोज़ ही सुबंधु की
और उसके हाथ की कारीगरी की चर्चा करते हुए अघाते न थे

लेकिन एक जिल्दसाज़ के जीवन में क्या चल रहा था, पता न था!

बंगाल से किताबों को बचाने आया था
वह पुरानी किताबों को जीवन देने आया था

पुरानी किताबों की महक में जीता था वह जिल्दसाज़

सुबंधु चला जाएगा!! यह बात फाँस की तरह थी हमारी संवेदना में

जैसे मन के दीपक में तेल कम हो रहा था
और एक रात में हरा जंगल जैसे ख़ाली ठूँठ रह गया था उसके जाने की बात सुनकर

इलाके में पुरानी किताबें न थीं इसलिए सुबंधु वापस जा रहा था

गांव में जिल्दसाज़ का क्या काम

आज हाट में मिला सुखदेव मरांडी

बोला : आपकी किताब बाँधने वाला चला गया अपना सामान लेकर

बीवी बच्चा और टीन के बक्से-झोले के साथ बस पर चढ़ते देखा था उसने

जाने से पहले सुबंधु हमसे मिलने नहीं आया था
वह क्या करता हमारे यहां आकर
हमारे यहां और पुरानी किताबें कहाँ थीं

तीन महीने वह रहा इस इलाके में
और कोई उसे जान नहीं सका

एक मज़दूर को तो सब पहचानते हैं
मगर एक जिल्दसाज़ में किसी की दिलचस्पी नहीं थी

आज तुम कहां होगे सुबंधु
क्या पुरानी किताबों से भरी कोई दुनिया हासिल हुई तुम्हें
तुम्हारी याद अब एक यंत्रणा है जिल्दसाज़

तुम अब जान ही गए होगे
किताबों की जगह बहुत कम हो गई है हमारी दुनिया में
और पुरानी किताबों की तो और भी कम

पुरानी किताबों की गँध के बीच जीना भूल चुकी है यह दुनिया

"अपने बच्चे को जिल्दसाज़ी नहीं सिखाऊंगा दादा!
वह कोई भी काम कर लेगा, जिल्दसाज़ी नहीं करेगा!!"

सुबंधु ने यही तो कहा था हमारी आख़िरीमुलाक़ात में
बरामदे से नीचे उतरते हुए और कोहरे में गुम होते हुए उस सर्द रात में।

अथवा,
मैं तो पतंगों को उड़ता
देखकर ही खुश होता था

जिस दिन पिताजी ने कहा था

तुम बहुत अच्छी पतंग उड़ाते हो
चौथी में पढ़ने वाला बच्चा इतनी अच्छी पतंग नहीं उड़ा सकता

उस रोज़ मैं भी आकाश में उड़ रहा था और मैंने पिताजी से कहा
कि आज रात को मैं आपके ख़ूब पैर दबाऊँगा फिर पीठ पर भी चढूँगा

दूसरे रोज़ भी आसमान खुला था
मैं और पतंग दोनों आसमान में थे
दूसरी छतों पर बच्चे कूद रहे थे
उनके पास भी पतंगें थीं
उनका भी आसमान था

हमारे घर के दरवाज़े पर एक ट्रक लगा था
और उस समय घर का सारा सामान उस पर लादा जा रहा था
माँ ने बहुत बाद में बताया कि उस समय तक पता नहीं था
इसके बाद हमें जाना कहाँ पर है

वह घर बिक चुका था
जो पिताजी ने पसीने से बनवाया था
इसका मतलब था कि मैं बिके हुए घर की छत पर पतंग उड़ा रहा था

माँ ऊपर आई और कहा,
चलो, पतंग को उड़ता छोड़ दो

अब जिसकी छत है
पतंग भी उसी की है।

अथवा,
हाट जाना मुझे मेरे पिता ने सिखाया

एकदम बचपन की बात बताता हूँ
वे रविवार की सुबह मुझे अपने साथ कर लेते थे
मैं झोला अपनी नन्हीं मुट्ठियों में भींचे
उनकी उँगली थामे होता था

मैंने उनके साथ कई शहर बदले
पर हाट जाने का सिलसिला बदस्तूर जारी रहा

अच्छे क़िस्म के आलू और दूसरी सब्ज़ियों की पहचान
मैंने एकदम छोटी उम्र में कर ली थी
क्या आपको पता है, बैगन हल्के अच्छे होते हैं
मछलियों के फेफड़े से उनके ताज़ेपन की पहचान होती है

सोलह बरस पहले
जिस दिन आख़िरी साँस ली पिता ने
वह रविवार का दिन था और मैं अपने गाँव की हाट गया था

तीस-बत्तीस का हो गया हूँ

हफ़्ते की हाट जाना मुझे आज भी अच्छा लगता है
हरी सब्ज़ियों से भरे खोमचे
मुझे जीवन में देखे गए सुन्दर दृश्यों में से लगते हैं

पिंजरों में प्यारे कबूतर सिर निकालकर देखते हैं हाट आए लोगों को
बिक जाने के बाद उनका क्या होगा, थोड़े ही जानते हैं

अजीबो-ग़रीब शक्ल के पगड़ी वाले जो अपने को परदेशी बताते हैं
बेचते हैं कई क़िस्मों के तेल और जड़ी बूटियाँ
मौक़ा ताड़कर लोगों को रातों की हताशा और बेचारगी का निदान सुझाते हैं

कहते हैं –
सांडे का तेल लगाओ, सब ठीक हो जावेगा
बीवी खुश हो जावेगी

बच्चों की आमद देख कर कहते हैं –
बाबू साब, तुम्हारी उमर नहीं हुई ये सब सुनने की, चल खिसक ले।

शहंशाह आलम
जन्म : 15 जुलाई, 1966, मुंगेर, बिहार।
शिक्षा : एम. ए. (हिन्दी) 
प्रकाशन : ‘गर दादी की कोई ख़बर आए’, ‘अभी शेष है पृथ्वी-राग’, ‘अच्छे दिनों 
में ऊंटनियों का कोरस’, ‘वितान’, ‘इस समय की पटकथा’ पांच कविता-संग्रह 
प्रकाशित। सभी संग्रह चर्चित। ‘गर दादी की कोई ख़बर आए’ कविता-संग्रह बिहार 
सरकार के राजभाषा विभाग द्वारा पुरस्कृत। ‘मैंने साधा बाघ को’ कविता-संग्रह 
शीघ्र प्रकाश्य। ‘बारिश मेरी खिड़की है’ बारिश विषयक कविताअों का चयन-संपादन। 
‘स्वर-एकादश’ कविता-संकलन में कविताएं संकलित। ‘वितान’ (कविता-संग्रह) पर 
पंजाब विश्वविद्यालय की छात्रा जसलीन कौर द्वारा शोध-कार्य।
हिन्दी की सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाअों में कविताएं प्रकाशित। बातचीत, 
अालेख, अनुवाद, लघुकथा, चित्रांकन, समीक्षा भी प्रकाशित।
पुरस्कार/सम्मान : बिहार सरकार के अलावे दर्जन भर से अधिक महत्वपूर्ण 
पुरस्कार/सम्मान मिले हैं।
संप्रति, बिहार विधान परिषद् के प्रकाशन विभाग में सहायक हिन्दी प्रकाशन।
संपर्क : हुसैन कॉलोनी, नोहसा बाग़ीचा, नोहसा रोड, पेट्रोल पाइप लेन के 
नज़दीक, फुलवारीशरीफ़, पटना-801505, बिहार।
मोबाइल : 09835417537
ई-मेल : shahanshahalam01@gmail.com

 

  1. शहंशाह आलम

    आभार।
    विनय सौरभ की कविताएँ सबके जीवन की अपनी कविताएँ हैं।

  2. ROHIT THAKUR

    बहुत ही सुंदर कविता और समालोचना भी ।

  3. अरविन्द श्रीवास्तव

    कवि विनय सौरभ की कविताओं को पढ़ना समय के तह में छिपी मानवीय व्यथाओं को पढ़ना है। जितनी बारीकी से वे नब्ज़ पर हाथ रखकर मर्ज़ पकड़ते हैं उतना अन्य समकालीन कवि नहीं.. सटीक समीक्षा के लिए शहंशाह आलम को साधुवाद !

  4. ROHIT THAKUR

    बहुत ही सुंदर कविता और समालोचना भी।

  5. विनोद विट्ठल

    शानदार लिखा भाई। मज़ा आ गया। जितनी अच्छी कविताएँ , उतनी ही अच्छी टीप । – विनोद विट्ठल

Leave a Reply

*