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एक पत्रकार, जो साइलेंट एक्टिविस्ट भी है

झारखंड के किसी सुदूरवर्ती कोने में भी जायें। किसी बहाने यदि पत्रकारिता की बात छिड़ जाये या उस बहाने प्रभात खबर का नाम आ जाये तो कोई न कोई तुरंत पूछेगा-कहेगा भी कि हां, मैंने तो फलां दिन ही हरिवंशजी से बात की है, अथवा मैंने तो हरिवंशजी को फोन कर अपनी असहमति जता दी है।

20 सालों से एक अखबार से जुड़कर बतौर प्रधान संपादक काम कर रहे हरिवंश की शायद सबसे बड़ी ताकत या उपलब्धि यही है कि उन्होंने पत्रकारिता को उन लोगों से जोड़कर एक ऐसी राह तैयार की, जिसे अब हिंदी की अखबारी पत्रकारिता में अनिवार्य शर्त की तरह माना जाने लगा है।

करीब 20 साल पहले जब हरिवंश ‘धर्मयुग’ और ‘रविवार’ जैसी पत्रिका में काम कर लेने के बाद रांची पहुंचे थे तो उनके सामने भविष्य का सवाल था, कैरियर की चुनौतियां थी। प्रभात खबर अखबार लगभग अस्त हो चुके टिमटिमाते तारे की तरह सामने था, जो मुश्किल से 500 कॉपियां छापकर छपने के दायित्वों का निर्वहन भर कर रहा था।

अखबारी दुनिया के विशेषज्ञ इस अखबार का मर्सिया गान कर चुके थे और युवा हरिवंश के साथी-खैरख्वाह उन्हें बार-बार सलाह दे रहे थे कि अपने पांव पर कुल्हाड़ी मत मारो, कैरियर खत्म मत करो। तब रांची की हैसियत कमीश्नरी मुख्यालय भर की थी और यहां की पत्रकारिता को मेनस्ट्रीम हिंदी पत्रकारिता कभी गंभीरता से नहीं लेता था।

हरिवंश ने चुनौतियां स्वीकारीं और पत्रकारिता बने-बनाये मानकों से हटकर काम करना शुरू किया। गांव के नौजवान अभिव्यक्ति की आकांक्षा के साथ अखबार से जुड़ने लगे। आदिवासी लेखकों-पत्रकारों को मंच मिला और झारखंड अलग राज्य के लिए आंदोलन कर रहे आंदोलनकारियों को अपनी बात रखने का एक जरिया। अब की तरह सिटिजन जर्नलिस्ट की शुरूआत नहीं हुई थी, तब हरिवंश ने लोगों के लिखे पत्रों को लीड और बैनर न्यूज बनाना शुरू किया और देश भर में फैले हिंदी विद्वानों, लेखकों, बुद्धिजीवियों को रांची के इस छोटे से अखबार से जोड़ दिया।

लिखने के साथ ही व्याख्यान के आयोजनों का सिलसिला भी हरिवंश ने शुरू करवाया। रांची और झारखंड के लोगों के लिए पत्रकारिता का यह बिल्कुल नया रूप था। इस दौरान हरिवंश हमेशा अपने को पीछे रखे और पाठकों को आगे रखा। नतीजा यह हुआ कि इस अखबार को झारखंडी भाषा में घरैया यानि घर का अखबार कहा जाने लगा और अब वही मृतप्राय अखबार, जो 20 साल पहले ‘डेड एसेट’ घोषित किया जा चुका था, झारखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल के आठ केंद्रों से प्रकाशित हो रहा है।

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