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औद्योगिक क्रांति के ‘महानगरीय’ विकास मॉडल हैं पूंजीवादी शोषण के गढ़ !

textile mills400 साल है औद्योगिक क्रांति का इतिहास। 1600 ई. में आई औद्योगिक क्रांति को मानवीय उत्क्रांति का सबसे बड़ा बदलाव माना गया और इस रूप में प्रस्तुत किया कि सामंतवादी गुलामी से दुनिया को मुक्त कराने के लिए औद्योगिक क्रांति एक मात्र उपाय और मसीहा है ।

असल में “औद्योगिक क्रांति ” पूंजीवाद का अतिमानवीय दिखने वाला एक खतरनाक, घोर, शोषणवादी उपक्रम है जिसने सामंती सोच को ना केवल मजबूती दी अपितु विज्ञान के आविष्कार को तकनीक देकर शोषण का गांव या विशेष भौगोलिक स्तर तक सीमित ना करके ग्लोबल बना दिया यानि एक झटके में विश्व को तबाह और बरबाद कर दिया जाये। दरअसल औद्योगिक क्रांति ने मानव कल्याण की नहीं उसके शोषण की रफ्तार को पहिया और पंख लगायें हैं ।

औद्योगिक क्रांति का टिकना मास प्रोडक्शन पर आश्रित है। यानि एक जगह ज्यादा उत्पाद हो और दूसरी जगह खपत। इस उत्पाद और खपत का उद्देश्य मुनाफा है – यानि लाभ- लाभ और किसी भी कीमत पर लाभ। इस लोभी प्रवृति ने दुनिया को एक उपनिवेश बना दिया है। नव धनाड्य लोगों ने कारखाने स्थापित कर मुनाफाखोरी शुरू की।

उस मुनाफाखोरी से पूंजी को खड़ा किया और पूरी दुनिया में “पूंजी” की सरकार खड़ा करने की पैरवी की। सभी राजे – राजवाड़ों को हटाया गया और पूंजीवाद के गर्भ में से नई शासन प्रणाली पैदा हुई जिसे हम “लोकतंत्र” कहते है । यानि लोभ का लोक के लिए तंत्र, ये उपर से बडा निर्मल , सरल और लोक कल्याणकारी है, पर भीतर से घोर व्यक्तिवादी व्यवस्था है। यानि एक तरह से राजशाही पर जनमत की मुहर भर है। यानि व्यक्तिवादी मानसिकता का पैराकार “पूंजीवाद” 5 साल में एक बार अपने मानवीय वैज्ञानिक विकास के एजेंडे पर मुहर लगवाता है और फिर जनता को आराम से वैज्ञानिक रूप से लूटता है ।

इसके आकडे विश्व के सबसे बडे लोकतंत्र के हर बार चुनावी खर्च में पता चलता है कि यह “लोकतंत्र” लोक का कितना है और पूंजी का कितना – भारत में लोक का कितना विकास हुआ और पूंजीवाद और पूंजीवादियों का कितना यह पूरे विश्व के सामने है ।

यानि पूंजीवाद का “लोकतंत्र” के नाम पर खुला खेल फरुखाबादी चल रहा है। अरे भारत आज एक “बाजार” है – जिस पर पूंजीवाद अपनी पसंद के शासक बिठाता है और दुनिया एवं भारत की जनता के आँखों में धूल झोकता है। जनता के पास शोषित होने के शिवाय कोई विकल्प नहीं रहता और विकल्प है तो सरकार बदलने का। यों तो इस लोकतंत्र का एक संविधान भी है जिसको अमल में लाना सरकार की जबाबदारी और जवाबदारी है पर संविधान लागू होने के 66 साल में सभी सरकारों ने संविधान के बजाये पूंजीवाद की सेवा की है और जनता का शोषण ।

सामंती व्यवस्था में राजा जिम्मेदार था जनता की दशा के लिए लेकिन इस पूंजीवादी लोकतंत्र में जनता ही अपनी दशा के लिए जिम्मेदार है। इसलिए मुनाफे को कोई सीधा खतरा नहीं है जैसे राजाओं को तख्ता पलटने का खतरा होता था। अब मुहर यानि सरकार पलटने का जोखिम होता है, जो पूंजीवादी चाहते भी है ताकि जनता का आक्रोश – नई सरकार हमारा कल्याण करेगी की लोकलुभावन उम्मीद में निकल जाये ।

यह लेख इसलिए लिखने की आवश्यकता पड़ी कि अभी तक ये खेल चोरी छुपे होता था लेकिन अब खुलेआम हो गया है । पूंजीवाद ने दुनिया की सभी समाजवादी सरकारों को ध्वस्त किया और भूमंडलीकरण का दौर चलाया जहाँ खरीद-फ़रोख्त यानि खरीदो और बेचो के राजनैतिक मुल्यों को स्थापित कर दिया। उसके साथ संस्कृति, श्रद्धा-अंधश्रद्धा, आस्था, धर्म, भगवान और विज्ञान का ऐसा तड़का लगाया कि, मनुष्य सामंतवादी व्यवस्था के भी पहले के रसातल में गर्क हो गया ।

जरा बानगी देखिये – अपने आप को आधुनिक कहनेवाला मनुष्य आज कितना हिंसक है । उसने आण्विक अविष्कार को अपनी कब्रगाह बना लिया है , खरीद-फरोख्त अपने आप में कितना हिंसक है-यानि जो बिक सकता है वही जी सकता है-आज विकास के नाम पर – बंधुआ मजदूरी है । बहुराष्ट्रीय कंपनियां दुनिया की संपत्ति पर कब्ज़ा करने वाले चोरों का गिरोह है । अपने मुलाज़िमों को सारी सुख सुविधा के लिए कर्ज़ देते हैं और जिंदगी भर उनसे गुलामी करवाते हैं-वो चाहे भी तो छोड़कर नहीं जा सकता क्योंकि कर्ज़ कैसे चुकायेगा ? और उपर से इन चोरों के गिरोह का शगुफा वी आर लिबरल …यू हव ए चॉइस…लेकिन मगरमच्छों के बीच एक आदमी की क्या चॉइस है ? बस आजीवन बाज़ार में बिकते रहो। दरअसल दुनिया को औद्योगिक क्रांति को तभी समझना चाहिये था जब इसने महानगरीय विकास के मॉडल को बढ़ावा देना शुरू किया था।

इनको महानगरों की आवश्यकता इसलिए थी ताकि यह अपना उत्पाद बेच सकें-इनको एक ऐसे विस्थापित मानवी समाज की जरूरत थी जो निराधार हो, जिसका कोई आधार ना हो, ना घर हो, ना खेती हो, ना रोजगार हो, ना ही कोई प्रशासनिक सहारा। बस यह अपना श्रम बिना किसी शर्त बेचने को राजी हो। यानि संसाधन-प्राकृतिक, श्रम हर कीमत पर बिकने को तैयार और मुनाफा-पूंजीवाद का। इसलिए कारखाना ऐसी जगह लगाया गया जहाँ से उत्पाद को समुद्री मार्ग से दुनिया में भेजा जा सके-इसका उदाहरण भारत में मुंबई और कलकत्ता रहा है ।

अब मुंबई की विकास गंगा देखें … औद्योगिक क्रांति के पैराकार यूरोपीय शक्तियों ने मुंबई का दोहन अपने अपने तरीके से किया और अंग्रेजों ने मुंबई में कारखाने लगाये। सबसे बड़ा उदाहरण कपडा मिल जिसमें काम करने के लिए महाराष्ट्र के कोंकण पट्टी से मजदूरों ने पलायन किया और मुंबई की मिलों के आसपास चालों में अपनी मुक्ति खोजी, यह वो गरीब, दलित तबका था जो गांव के सामंती ब्राह्मणवाद मे ग्रस्त था, इसने औद्योगिक क्रांति को अपना कल्याणकारी मसीहा समझा क्योंकि फौरी तौर से तुम्हारी जात क्या है ?– इससे निजात मिली। कारखाने में काम करने से शिक्षा शुरू हुई, छोटा सही पर अपना घर बना, एक नया मजदूर समूह निर्माण हुआ और कुछ तीस चालीस बरस इस समाज के अच्छे गुजरे । उन्हें समाज के केंद्र में अपनी सहभागिता मिली – इसके बरक्स मुंबई के मूल निवासी कोली समाज विस्थापित और विलुप्त होता गया। मुंबई व्यापार केंद्र बना और आज मुंबई में सबसे ज्यादा विस्थापित आबादी है ।

जिसका अपना कोई आधार नहीं है-यानि जो श्रम बेच सकता है, और जीने के लिए वस्तू खरीद सकता है वही मुंबई में रह सकता है। भूमंडलीकरण के बाद मुंबई में उत्पाद कम और सेवा श्रम ज्य़ादा विकसित हो गया है । प्रोडक्शन ओरिएंटेड टू सर्विस ओरिएंटेड -अधिकारिक रूप से 1.25 करोड की आबादी को सुबह टूथपेस्ट से लेकर पेपर नेपकीन तक खरीदने पडते हैं।

यानि हररोज 1.25 करोड लोगों का बाज़ार ! यही बाज़ार औद्योगिक क्रांति और पूंजीवाद को चलाता है–चूँकि आज सूचना और तकनीक का युग है इसलिये आज “सर्विस ओरिएंटेड इकॉनमी” है। एक छल और है इसमें वो नॉलेज इकॉनमी कर रहे हैं यानि सूचना को वो ज्ञान कहकर प्रसारित और प्रचारित कर रहे हैं। जैसे तकनीक को विज्ञान समझ और समझा रहे हैं।

तकनीक और विज्ञान का फ़र्क समझना जरुरी है। यह सबसे बड़ा घपला है जो ‘पूंजीवाद’ के शोषण वादी कुचक्र का इल्जाम ईश्वरीय शक्ति पर थोपना चाहते हैं -इसकी बानगी देखिये इस पृथ्वी के सभी प्राकृतिक संसाधनो का विगत 400 वर्षों मे जो दोहन पूंजीवाद ने किया है वो अभी तक कि मानवीय उत्क्रांति के इतिहास में कभी नहीं हुआ । इस दोहन से प्रकृति का संतुलन बिगड़ गया है-जो ग्लोबल वार्मिंग के रूप में हमारे सामने मौजूद है ।

अचानक अधिक वर्षा या लगातार सुखा , एक तरफ बाढ़ और दूसरी तरफ बूंद बूंद पानी को तरसता जीवन , इसका सबूत है। और इसकी जवाबदेही अपने उपर न आये इसलिए तकनीक का उपयोग कर नये ईश्वर को, भगवान को मानने वाला तथाकथित शिक्षित वर्ग खडा किया जा रहा है जो दिखने मे आधुनिक,कंप्यूटर जैसे। पर कंप्यूटर का संचालन गणपति की फोटो की पूजा करके करता है । इस आधुनिक विकास ने हमारे जीवन के मौलिक , आधारभू्त तत्वों को बर्बाद किया है-यानि सांस लेने के लिए शुद्ध हवा, पीने के लिए शुद्ध जल और पैदा करने के लिए उर्वरक भूमि।

हवा, जल और भूमि का अपने मुनाफे के लिए बेलगाम दोहन पर अपने अंत की और तेजी से बढ़ रहा है । मनुष्य जीवन को लील रहा है । और इस विकास का मॉडल है महानगर । वो महानगर जिसका अपना कोई आधार नहीं है जो प्रकृति पर अभिशाप है और मानवीय विकास की सबसे बड़ी बाधा ।

इन महानगरों की अवस्था नारकीय हो गई है । एक व्यक्ति को रहने के लिए आवश्यक प्रति व्यक्ति स्पेस नदारद है । सिरमुंडों से भरा बाजार हर पल प्रदूषित कर रहा है भूमि, जल और प्रकृति को। पूंजीवाद इसी विकास की रट लगा रहा है। नये नये आयाम, आधुनिक-यातायात। जबकि एक इंच जगह शेष नहीं है महानगरों में। क्योंकि कहीं और विकास करने में इनको मुनाफा नहीं होगा। यानि यह अब भी महानगरों के विकास के आगे अपने आप को नहीं देखते हैं। जनता भी नहीं देखती है । इसलिए अपने आधार यानि अपने गांव को छोड़ कर भाग रही है। महानगर के गंदे नालों पर अपना जीवन गुजारने के लिए अपनी छत, अपना पानी, अपनी भूमि को छोड़ कर महानगर का गंदा नाला…वाह क्या विकास है ?

पूंजीवाद का यह भी षडयंत्र है क्योंकि जमीन से इतना बेतहाशा उत्पादन किया है कि अब कृत्रिम उर्वरक डालने के बाद जमीन जहर उगल रही है। इसका उदाहरण हमारे देश के विकसित प्रदेश से हर रोज निकलती कैंसर ट्रेन है। वाह क्या विकास है ?

भूमंडलीकरण का अनोखा षडयंत्र। सस्ता बेचो। इससे भारत के किसानों की दुर्दशा इस कदर बढ़ गई की जमीन बोझ बन गई। जीवन आत्महत्या में बदल गयी और पूंजीवादी ‘कौडियों’ में जमीन खरीद कर उन पर अपना कब्ज़ा जमा रहे हैं। यानि हमारे देश की आत्मा यानि गांव बिक रहे हैं, बिक गये हैं। दुनिया को अन्न देने वाला किसान आत्महत्या कर रहा है। केमिकल बेचने वाले बनिया, बाबा और मल्टीनेशनल आबाद हो रहे हैं । सूचना बिकाऊ हो गई है ।

लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मीडिया पूंजीवाद और अंधश्रद्धा को बेचने की मंडी है। देश का राजनैतिक नेतृत्व पूंजीवाद के पंख लगाकर विदेश भ्रमण में मशगूल है। देश के बुजुर्ग टीवी में बड़े धार्मिक गुरुओं के चंगुल में फंसकर भगवान के नाम पर अंधश्रद्धा के गुलाम बन कर अपने संतान से लड़ रहे हैं। तकनीक के नाम पर ‘विज्ञान’ को बेच रहा युवा वर्ग। भोगवाद के चक्रव्यूह में “पूंजीवाद” को अपना सेवाहार मान कर बुलेट ट्रेन का सपना देख रहा है जहां से सीधे स्वर्ग की सीढी पर पैर रखा जा सकता है । यानि जिस समय सामंतवादी व्यवस्था में मुट्ठी भर लोगों के हाथ में दुनिया की संपत्ति थी- 400 साल बाद-‘लोकतांत्रिक’ दुनिया में शेयर मार्केट के ज़रिये वो संपत्ति फिर मुट्ठी भर लोगों के हाथ में है ।

तो क्या मिला इस औद्योगिक क्रांति में नील बटे सन्नाटा। एक पूंजीवाद अजगर जो अपने आप को ही लीलता है और महानगर का आकार लिए विकास का मॉडल बन कर खरीद फरोख्त की माला जप रहा है। विनाश की ओर बढ़ रहा है। इस महा मानवीय विनाश से बचने का तरीका है- खरीदने और बेचने के सूत्र को सिरे से नकारना। जितनी जरुरत उतना उत्पाद। बेलगाम मुनाफा खत्म करना और मेहनत का हिस्सा देना । प्राकृतिक संसाधनों पर जनता का कब्ज़ा, जल, वायू, भूमि और प्रकृति का संवर्धन, पुनसंवर्धन ।

विकास के मॉडल महानगर का तिरस्कार और आत्म स्वावलंबी गांवों का प्राकृतिक प्रकृति प्रिय विकास , पूंजीवाद के बजाय सही मायनों का लोकतंत्र, तकनीक के बजाय विज्ञान, जीवन का आधार हो। यही सर्वोत्तम कारगर कदम हैं, जो विनाश के मुहाने पर खड़ी मानवता और आणविक आविष्कार के अभिशाप से मानव और सृष्टि को बचा सकता है !

Manjul-Bhardwaj1

थिएटर ऑफ रेलेवेंस” नाट्य सिद्धांत के सर्जक व प्रयोगकर्त्ता मंजुल भारद्वाज न केवल निर्देशक, अभिनेता और लेखक हैं बल्कि फेसिलिटेटर और पहलकर्ता भी हैं।

एक अभिनेता के रूप में उन्होंने 1600 से ज्यादा बार मंच से पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है।लेखक-निर्देशक के तौर पर 28 से अधिक नाटकों का लेखन और निर्देशन किया है। इन्होंने राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर थियेटर ऑफ रेलेवेंस सिद्धांत के तहत 1000 से अधिक नाट्य कार्यशालाओं का संचालन किया है। वे रंगकर्म को जीवन की चुनौतियों के खिलाफ लड़ने वाला हथियार मानते हैं। मंजुल मुंबई में रहते हैं। उन्हें 09820391859 पर संपर्क किया जा सकता है।

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  1. Pushkar

    दैनिक जीवन जीने वाली जिंदगियां, जीवन बिताने के लिए संसाधनों में व्यस्त रहती हैं . जो कि औधोगिक ठेकेदारों के साजिश का हिस्सा है . साजिशकर्ता से अनजान, हर रोज जिंदगी के भार को ढोते हुये लोग, जीवन के अंतिम पड़ाव तक व्यस्त रहते हैं . इस साजिश को समझने वाले भी, कुछ कमजोर और कुछ मजबूर हैं, जब कमजोरी मजबूती में और मजबूरी ताकत में बदलेगी, तो साजिश के स्तम्भ पर खड़ा यह ढांचा भरभरा कर जरूर गिर पड़ेगा . सर आपका यह लेख अंधकार में प्रकाशपुंज बनकर जरूर उभरेगा .

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