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कभी तेलियों का भूत-प्रेत पर दृढ़ विश्वास था

1907 में जब ओ’ मैली गजेटियर के लिए विभिन्न जातियों का सर्वेक्षण कर रहा था तो उस वक्त पटना जिला में यादवों, कुर्मियों, बाभनों के बाद दुसाध, कहार, कोइरी, राजपूत, चमार(अब जिन्हें रविदास कहा जाता है) और तेली इत्यादि महत्वपूर्ण जातियां थीं। इसके अतिरिक्त 25000 से ज्यादा आबादी वाली अन्य आठ जातियों में बढ़ई, ब्राह्मण, धानुक, हज्जाम (नाई), कंदुस, मुशहर, पासी और कायस्थ थे।

पटना जिले में तेलियों की संख्या 42,377 थी। तेल का उत्पादन और उनको बेचने के पुश्तैनी कारोबार पर उनका एकाधिकार था। इसके अतिरिक्त इनकी एक बड़ी आबादी अनाज और पैसों के लेनदेन के कारोबार में भी लगी हुई थी। तत्कालीन समाज में व्याप्त अंधविश्वास से ये अछूते नहीं थे। तेलियों का भूत, प्रेत और बुरी आत्माओं पर दृढ़ विश्वास था।

ओ’ मैली ने लिखा है, ‘तेलियों का यह दृढ़ विश्वास है कि मृत्यु के बाद चाहे वह स्वाभाविक मौत हो या अस्वाभाविक, प्रत्येक तेली बहुत ही शक्तिशाली दुष्ट आत्मा बन जाती है। उसे ‘तेलिया मसान’ कहा जाता है। प्रचलित मान्यता के मुताबिक बहुत शक्तिशाली ओझा ही ‘तेलिया मसान’ को नियंत्रित कर सकता है। जादूगर अकसर मृत तेली की खोपड़ी को अपने पास रखते हैं। इस खोपड़ी के मार्फ़त वे बुरी और दुष्ट आत्माओं (तेलिया मसान) का आह्वान करते हैं।’

अतीत में पटना जिला में तेली बहुत ही शक्तिशाली रहे हैं। इतिहासकारों के मुताबिक बिहार शरीफ के निकट तेल्हारा उनकी शक्ति का केंद्र था। तेल्हारा विश्वविद्यालय नालंदा और विक्रमशिला विश्वविद्यालय से भी पुराना है। यहां बौद्ध विहार भी था। बौद्ध भिक्षु ह्यूएन त्सांग अपनी यात्रा के क्रम में यहां आया था। उसने इसे तेलधका नाम से याद किया है। नालंदा महाविहार के विशाल प्रवेश द्वार का निर्माण तेली वंश के प्रमुख बालादित्य ने करवाया था। तेली जाति के ही एक व्यक्ति ने भगवान् बुद्ध की विशाल प्रतिमा की स्थापना की थी। अब यह स्थान तेलिया भण्डार कहलाता है। निकट ही तेतरवन में भी इन्होने बुद्ध की विशाल प्रतिमा की स्थापना की।

ओ’ मैली ने आगे लिखा है, ‘करीब करीब जिले के सभी प्रकार के कारोबार इन तेलियों के हाथों में है। इन पर उनका पूरा नियंत्रण है। यहां एक लोकप्रिय कहावत प्रचलित है। ‘तुर्क, तेली, ताड़ इन तीनों से बिहार।’ बिहार मुसलमानों, तेलियों और ताड़ से बना है।’

कुछ वर्ष पहले तक यह कहावत प्रचलित थी। इस बीच तेलियों की आबादी बढ़ी और मुसलमानो की भी। लेकिन सड़क के किनारे खड़े ताड़ के पेड़ों की संख्या अब काफी कम हो गई है।

साभार: प्रभात खबर

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