+91 943 029 3163 info@biharkhojkhabar.com

कविता में हमारे समय की पटकथा लिखता कवि शहंशाह आलम

हम ऐसे समय में जी रहे हैं जब धीरे-धीरे साहित्य भी बाज़ारवाद के ढाँचे में समाहित हो रहा है। ख़रीद और बिक्री के अलावा सब कुछ परदृश्य से बाहर होता जा रहा है। सरकारें विदूषक से अधिक की हैसियत नहीं रखतीं। प्रतिरोध के स्वर मायावी अधिक वास्तविक कम हैं और जो वास्तविक हैं वे नेपथ्य में फेंके जा रहे हैं। ऐसा किसने सोचा था कि इस सदी में सत्य कहना सूली पर चढ़ने का पर्याय हो जायेगा। वैसे में एक कविता ही है जो सबसे ज़्यादा बेचैन है, चूँकि उसका सपना संसार को सुन्दर, कलात्मक, भय-भूख और शोषण से मुक्त करना है। आज हिंदी कविता का वितान निरंतर विस्तृत और समृद्ध हो रहा है, वह सीना तान कर इस मनुष्य विरोधी समय के बरक्स खड़ा है। शहंशाह आलम की कविताएँ इसी कविता-विरोधी समय में दृढ़ता के साथ खड़ी होती हैं।

कहने की ज़रूरत नहीं कि शहंशाह आलम हिंदी-कविता में एक महत्वपूर्ण उपस्थिति के रूप में लंबे समय से रचनारत हैं। इनकी कविताएँ भले कोरे काग़ज़ पर आकार लेती हैं लेकिन उन्हें किताबों में जीना मंज़ूर नहीं। उनकी इच्छा मज़दूर, किसान और आमजन के साथ बीच जीने की है। ‘हत्या के इस समय में’ ( कविता-संग्रह ‘इस समय की पटकथा’ ) में कवि हमारे समय की भयावह सच्चाई से सिर्फ़ रू-ब-रू ही नहीं होता बल्कि उससे मुठभेड़ करता है और प्रकारांतर से कहता है कि इस बुरे दौर में प्रतिरोध सिर्फ़ काग़ज़ी नहीं होना चाहिए, अब वक़्त आ गया है कि हम अपनी चौखट से बाहर निकलें और हत्यारे समय के ख़िलाफ़ अपनी पूरी ताक़त से खड़े हों :

मालूम नहीं किधर से चाक़ू आया
और कैसे घुसा उसके पेट में

कोई अँधेरे झुरमुट में जा छिपा

सूँघ लेता है हत्या

रा मुझे भी शायद
चश्मदीद गवाह समझकर

हत्या और मृत्यु के इस समय में
मैं चाहता हूँ खींच निकालूँ
हत्यारे को झाड़ी के पीछे से।

यह झाड़ी जो पहले से ही ख़तरनाक थी, अब राजपथ पर भी फ़ैल गयी है, आज पता नहीं झाड़ियों का विस्तार दिन-रात कितनी तेज़ी से फ़ैल रहा है और एक दिन हम भी उन झाड़ियों में घिरा हुआ बेबस, लाचार आएँगे। ‘हमारे लोकतंत्र में’ ( ‘इस समय की पटकथा’ ) उस ख़तरे की आवाज़ बहुत तेज़-तेज़ सुनाई देती है, जब लोकतंत्र से लोक का उत्सव विदा ले चुका होता है और दसों दिशाओं से विलाप का समवेत स्वर फूटने लगा है :

हमारे लोकतंत्र में वे
दसों दिशाओं से वे आए
इस सभ्य सभ्यता में
मारे गए लोगों की
विधवाओं का विलाप सुनने

जबकि समाप्त हुआ
लोकतंत्र का उत्सव
इस लोक से कब का।

आज का अँधेरा, मुक्तिबोध के अँधेरे से और सघन और विस्तारित हो चुका है। साथ ही, घोर मनुष्य-विरोधी हो चुका है, मठ और गढ़ दिनों-दिन रक्तबीज की तरह फ़ैल रहे हैं। कवि सिर्फ़ विचार कर नहीं बैठ सकता, उसे मात्र चर्चा कर संतोष नहीं होता। जहाँ बाक़ी लोग यह सब कर अपने कर्तव्यों का इतिश्री कर लेते हैं, वहीं कवि उस दुःख और पीड़ा में जीता है।

सिर्फ़ कविता लिखना, कवि होना नहीं है, उसे कवि का जीवन भी जीना होता है। शहंशाह आलम का कवि एक कवि का जीवन भी जीता है। जन से और मिट्टी से जुड़े कवि की यही पहचान है। वह आलोचकों तथा अपने समकालीनों को खुराक देने वाली कविताएँ नहीं लिखता, अपितु अपने समय-समाज से संवाद करने के लिए कविताएँ लिखता है। आप ‘चावल’ नामक कविता से गुज़रिए, आप जान जाएँगे कि शहंशाह आलम अपने समय के ईमानदार और जन-पक्षधरता के प्रति प्रतिबद्ध कवि हैं। इनकी कविताओं की आँख बारीक-से-बारीक सत्य को पकड़ती हैं, भले वो अँधेरे में सात बाँस अंदर क्यों न हो :

चावल ने रचा कितने शरीर
कितनी आत्माओं को दिया संबल
कितनों को संभावनाएँ
कितने बच्चों को किलकारियाँ
जीवन की लड़ाई में भात बन कर।

जैसे जीवन की लड़ाई में चावल का भात बन जाना उसका श्रेय और प्रेय है। उसी प्रकार इस कवि की कविताएँ भी हमारी लड़ाई में हमारी उम्मीद बन जाने की इच्छा से भरी हुई हैं। वे हमारे साथ-साथ चलना चाहती हैं।

किसी कवि के लिए अपनी शैली ढूँढ़ लेना एक लंबी साधना का प्रतिफलन है। शहंशाह आलम की कविताओं से गुज़रते हुए आप यक़ीन करेंगे कि इस कवि ने अपनी शैली ढूँढ़ने के लिए दूर तक यात्रा की है। उसके पास भाषा की पूँजी है और कहन का अलहदा तरीक़ा। आपको भाषा में गंगा-जमुनी तहज़ीब देखनी हो तो इनकी कविताओं से गुज़र सकते हैं। अपने समय-समाज के साथ शहंशाह आलम जब प्रेम कविताएँ लिखते हैं तो चकित कर देते हैं, एकदम अनूठा शिल्प और चमक के साथ वे हमें वे भिन्न आस्वाद के कवि लगते हैं :

देवियो, लौट चलो
मैं तुम सबको आज
परवीन शाकिर की नज़्में सुनाऊँगी
और चाय पीते हुए
फ़रवरी की इस सुबह को
हम एक यादगार सुबह बनाएँगी ( फ़रवरी की एक सुबह टहलने निकलीं सात अदद लड़कियाँ / ‘इस समय की पटकथा’)।

जिन्होंने परवीन शाकिर की नज़्मों को पढ़ा है, वे इस कविता के वितान को क़रीब से समझ सकते हैं। इस कवि की कविताओं के कई आयाम हैं। अपने समकाल का शायद ही कोई पक्ष हो जिन्हें ये कविताएँ नहीं देखती हैं। इशारे में कोई कैसे कहता है उसे भी आप इनकी कविताओं को पढ़ जान सकते हैं। सबसे बड़ी बात है कि अपनी गंभीर वैचारिक कविताओं के साथ प्रेम कविताओं में भी शहंशाह आलम की ताक़त देखी जा सकती है। वह सबसे अनूठा प्रेम कर सकता है, सबसे अनोखी इच्छा रख सकता है और अंततः चुम्बन के निशाँ छोड़ सकता है :

सबसे अनूठा प्रेम मैंने किया
सबसे अनोखी इच्छा मैंने की

भय को मैंने भगाया
शत्रुओं को चेतावनी मैंने दी
गहरे मौन को स्वर मैंने दिया
तोतों को मैंने पुकारा
अदृश्य घर को दृश्य मैंने किया

सबसे सुंदर कविता
सबसे सुंदर भाषा
सबसे सुंदर कोलाज
सबसे सुंदर जलकुंड
सबसे सुंदर शरीर
सबसे सुंदर चाक़ू
सबसे सुंदर जादू
मैंने ही तुम्हे दिया

इतिहास की सबसे बड़ी क्रांति मैंने की
दर्शकों के बीच सबसे बढ़िया अभिनय मैंने किया
चुंबन के निशाँ मैंने छोड़े
मृत्यु को जीवन में मैंने बदला
काठमांडू मैं गया
कलकत्ता मैं घूमा

तुम्हारे हठ में मैं रहा
तुम्हारी लय में मैं रहा
भोर के आकाश में मैं रहा
नीले उस शंख में मैं रहा
तुम्हारे जागने-सोने मैं रहा

तुम्हारे प्रेमरंभ में
तुम्हारे जल में
तुम्हारी स्मृतियों में
तुम्हारे शब्दों वाक्यों छंदों में
तुम्हारे देवताओं में मैं रहा

नदियों झीलों में
फुटपाथों चायख़ानों में
स्त्रियों के गीतों में
मैं ही मैं दिखा ( काठमांडू मैं गया कलकत्ता मैं गया / ‘इस समय की पटकथा’)।

यह किसी कवि के लिए सौभाग्य की बात होती है कि वह सुनसान राह का पथिक बनना स्वीकार करता है। सिर्फ़ इस उम्मीद में कि वह अपनी लड़ाई लड़े और उसकी पराजय भी जय का पथ प्रशस्त करे। शहंशाह आलम कविता के घर में रहते हुए यही सब तो कर रहे हैं :

सूखे पत्तों से भरा यह सुनसान रास्ता है
इस सुनसान रस्ते पर चलते हुए
पत्तों की आवाज़ को सुनता हूँ
और अपनी लड़ाई को याद करता हूँ
जो मुझे हर तानाशाह के विरुद्ध लड़नी है।

-राजकिशोर राजन

शहंशाह आलम की कविताएं ~
●छीमी
अब पचास से ऊपर का हुआ समय के फेरे में पड़कर 
अब भी लेकिन माँ से वही बीस-बाईस साल वाली ज़िद
कि माँ मटर की फली खिलाओ खचखच और मीठी

यह सच है, बाज़ार में छीमी देखता हूँ तो ललचा जाता हूँ

मगर बाज़ार से सब्ज़ियाँ ख़रीदनी मुझे अब भी नहीं आई
पत्नी टमाटर बोलती है तो हरे टमाटर चुनकर ले आता हूँ
जबकि पत्नी को लाल पका टमाटर चाहिए होता है
बैंगन बोलती है तो सब्ज़ीवाले से बासी बैंगन उठाकर ले आता हूँ

पत्नी की डाँट में रोज़ एक ही कथा होती मुहब्बत से भरी
मैं अगर सब्ज़ी बेचनेवाला रहता तो हाट से ऐसी ही सब्ज़ियाँ उठा लाता
और अपने ग्राहकों से रोज़ गालियाँ से सुनता सड़ी-भद्दी

लेकिन मैं तो उस सब्ज़ीवाले पर भरोसा करके ठगा जाता हूँ अकसर
फिर क्या मालूम सब्ज़ी बेचनेवाले भी हाट में ख़ुद ठगे जाते रहे हों
और फिर मुझ जैसे बौरा-नासमझ को ठगने में लग जाते हों इस बाज़ार में

एक बार कचहरी जाने वाले रास्ते में मजमा लगा देखा तो मजमे में जा घुसा
देखा, अजीब-सी शक्ल वाला आदमी एक द्रव्य बेच रहा है
और बेचते हुए कह रहा है कि भय्यन लोग, यह सांडे का तेल है
इसका इस्तेमाल करोगे तो बीवी तुमसे कभी नाख़ुश नहीं रहेगी
तभी मजमे की भीड़ में से एक मरियल-सा दिख रहा आदमी चिल्लाया
बात बहुत झूठ बोलता है… यह आदमी नक़ली सांडे का तेल बेचता है
इसका तेल लगाओगे तो आपकी बीवी आपसे कभी ख़ुश नहीं होगी

हम ठगे जाने के एक ख़तरनाक वक़्त से जो गुज़र रहे हैं बड़े एहतमाम से
और इस तरह ठगे जाने के बारे में कोई न्यूज़ चैनल नहीं बताता बस कवि बताता है

तभी छीमी के लिए मैंने माँ से कहा था जो इतनी मीठी होती
कि घर आई आधी छीमी मैं कच्चा ही खा जाता माँ के मना करने के बाद भी

माँ ने कहा, मुझे मालूम है, तुम्हें सब्ज़ियाँ ख़रीदनी नहीं आती
तुम्हारे बाक़ी भाइयों को भी नहीं आती है
अब्बा तुम्हारे अब सब्ज़ी लाने बाज़ार जा नहीं पाते
आने दो तुम्हारी छोटकी ख़ाला को
वही लाएगी छीमी जैसी छीमी तुम खोजते हो
पटना में भी तुमको कहाँ मिलती होगी ऐसी मीठी छीमी

माँ सही थीं पटना क्या हैदराबाद में भी मीठीवाली छीमी कहाँ मिलती थी
हैदराबाद वाले भाई ने फोन पर बात करते हुए बताया था
दिल्ली में भी कहाँ मिली वैसी छीमी कि खाओ तो जी ख़ुश हो जाए

माँ ने बताया कि बाज़ार में अब हर चीज़ मिलावटी मिला करती है
लेकिन मुश्किल यह है कि मिलावटी सामान बेचने वाले जानते हैं
कि आदमी भूखा रह नहीं सकता इसलिए खाने-पीने के सामान में
ज़हर भी मिलाकर बेचो तो क्या फ़र्क़ पड़ता है
मरेगा खाने वाला आदमी ही, वह थोड़े ही ना मरेगा

मित्रो, जो सबसे बड़ा सच है, वह यही है कि माँ जानती हैं
कि यह मिलावटी सामानों का ही नहीं मिलावटी सरकारों का भी दौर है।

●जड़ें
यह पृथ्वी कितनी बड़ी और दूर तक फैली हुई है
किसी गवैये के गले से निकल रहे तान की तरह

मैं इस अंडाकार पृथ्वी पर चलता हूँ और उलझता हूँ
जिस चीज़ से उलझता हूँ वह चीज़ पृथ्वी के अंदर-अंदर
मेरे साथ पूरे एहतमाम से चल रहीं जड़ें होती हैं
मैं रुककर इन जड़ों से निकलना चाहता हूँ निकल नहीं पाता
जिस तरह गवैये के तान से बाहर नहीं आ पाता कई-कई दिनों

ये जड़ें कहाँ-कहाँ नहीं हैं : सारंगी में हारमोनियम में तबला में संगत में
प्रेमिका के सीधेपन में मेरी बदमाशियों में किसी के हलके दुखों में

ये जड़ें ही हमें पकड़कर रखती हैं जो नसों की मानिंद फैली होती हैं
देह के अंदर भी देह के बाहर भी जैसे ये नसें ना हों घुमावदार रास्ते हों
जिस तरह इस अंडाकार पृथ्वी को जड़ों ने पकड़ रखा है मज़बूती से

मैं स्वर निकालता हूँ निकलती हैं मेरे स्वर के बदले जड़ें
मैं तान निकालता हूँ निकलती हैं मेरे तान के बदले जड़ें
मैं साज़ निकालता हूँ निकलती हैं मेरे साज़ के बदले जड़ें

मैं जो एक रंगसाज़ हूँ बेहद माहिर
मैं रंग बनाता हूँ बनती हैं जड़ें
मैं रंग चढ़ाता हूँ चढ़ती हैं जड़ें

जड़ें दुनिया की हर चीज़ में पाई जाती हैं
गली में सुनसान में पत्थर में लोहा में गाछ में घर में सड़क में

जो भाप निकल रही है खौलते हुए पानी से
वह भाप भी भाप कहाँ है इस आकार में
वह तो जड़ें ही हैं जो आसमान तक जा रही हैं

बारिशें क्या होती हैं एक तरह की जड़ें ही तो होती हैं
जो उतरती हैं बादलों से घिरे हुए आकाश में से
घर की छतों पर रास्तों पर धुंध पर और देह पर भी

मालूम नहीं आप कितना सुन पाते हैं जड़ों की सरगोशियाँ पदचापें
मैं तो रोज़ सुनता हूँ अपनी पाँचों इंद्रियों को जगाते हुए इन्हें इन्हीं की आवाज़ में।

●दाँव
मैं अकेला ऐसा आदमी बचा हूँ इस जुएख़ाने का
जहाँ अपनी चाल चलते हुए सभी जीतते हैं
बस मेरा ही चला हुआ दाँव ख़ाली जाता है

मैं अपना मछली पकड़ने का जाल हारता हूँ
फिर अपनी नाव फिर अपना दरिया हारता हूँ
फिर अपना पेड़ फिर अपना बादल हारता हूँ

मेरा जाल मेरी नाव मेरा दरिया मेरा पेड़ मेरा बादल
सब मुझसे कितना प्यार करते थे जिस तरह मैं तुमसे

तुमने बारहा समझाया था कि हारने की क्रिया
जीवन की सबसे ख़तरनाक क्रिया होती है
जीतने की क्रिया सबसे महत्वपूर्ण सबसे ज़रूरी

सच जो था यही था कि मैं सबकुछ जीतने निकलता था
अपने घर से पानी की बोतल थोड़ा अँकुरा चना लेकर
मगर यह दुनिया थी कि मुझे जीतने नहीं देती थी

यहाँ का दस्तूर यह था कि छल जाननेवालों के लिए
जीत के सारे दरवाज़े खुले थे दिन-रात के तमाम वक़्त में
जो बेचारा ज़रा-सा सीधा था कपट नहीं जानता था
बस हार ही हार थी उसके रोज़ो-शब में उसके लिए

बारिश से बचने के लिए तुम्हारे लिए एक छतरी रखी थी
वह भी हार आता हूँ वहां पर जहाँ मुसाफ़िर कम आते थे

तुमने सच ही बतलाया था यह दुनिया एक जुआख़ाना है
यहाँ वही बचा रहता है जो जीत के सारे दाँव-पेच जानता है

मैं था कि बस हारने का दाँव जानता था कुछ भी जानने के नाम पर।

●भागना
वह लड़की थी इसीलिए उसके भागने की कथा
उसके नगर में किसी बड़ी महामारी की तरह फैली
उसी के नगर का एक लड़का भागा एक रोज़
तब वह भागा नहीं था बल्कि दुनिया घूमने निकला था
किसी यायावर किसी सिंदबाद जहाज़ी के माफ़िक

भागतीं तो बस लड़कियाँ थीं हर बार
किसी-न-किसी के साथ सबको दुःख पहुँचाकर

कौन था जो भागा नहीं था अपने जीवन के
किसी डरावने बेहद डरावने हिस्से से डरकर

एक कवि था जो जनता के संग्राम से भागा था
लेकिन उसका भागना किसी को नहीं दिखा

एक कॉमरेड था जो अपने विचारों से डरा
जा छुपा था अपनी अनिद्रा की बीमारी में

एक अधिकारी था जो मातहत को समस्याओं में डाल
निकल भागा था किसी नए दफ़्तर को गंदा करने

देश का महामात्य था जो देश में
बस मुश्किलें पैदा कर रहा था
और अपने पक्ष के नारे लगवा रहा था
भाड़े के टट्टुओं की भीड़ लगवाकर

समय गवाह है भागने वाले रोज़ भाग रहे थे
चुपचाप भी बोलकर भी पानी की बोतल लेकर ख़ाली हाथ भी
किसी को मारकर किसी को लूटकर किसी का बलात्कार करके भी

सबके भागने के पीछे अपनी-अपनी वजहें थीं
जो ज़रूरी थीं माकूल थीं कारण लिए हुए थीं
बस एक लड़की का भागना ग़ैरज़रूरी था
उसके भागने के हर समय में
उसके भागने की हर दंतकथा में
उसके भागने की हर हार में

●पूँछ
नहीं, आप ज़रा भी घबराएँ नहीं
आपकी नहीं अपनी पूँछ के बारे में
बताना चाहता हूँ शुद्धता से

मेरी पूँछ के बारे में मेरी माँ ने बताया था
कहा था : शहंशाह, तुम सिर उठाना चाहोगे
वे तुम्हारी पूँछ दाबकर तुम्हें बैठा देना चाहेंगे

माँ को मालूम था ज़माने के हिसाब-किताब में
उसका यह बेटा कुछ ज़्यादा ही अज्ञानी था
माँ ने फिर समझाना चाहा : तुम्हारे मन में यह ख़्याल आ रहा होगा
कि तुम इंसान हो और इंसान को भी पूँछ होती है कहीं
मेरे बच्चे, हम पंक्तियों में खड़े अंतिम आदमियों में से हैं
और हमको पूँछ भी होती है
जिसे हम नहीं देख पाते मगर मुल्क के बादशाह देख लेते हैं
और हमारी इसी पूँछ को दबा-दबाकर हमें दर्द दिया करते हैं

माँ का कहा उम्र के पचासवें साल में आकर समझ में आ रहा था
तभी मेरी देह का दर्द इलाज के बाद भी ठीक नहीं होता था
दर्द तो मेरी पूँछ का था जो ज़ख़्मों से भरी थी
और मैं था कि डॉक्टर के पास अपनी देह के इलाज के लिए जाता रहा था

इस दर्द की असल वजह यही थी कि अपने ही मुल्क में
मुझे अपनी आज़ादी चुनने की सहूलियत हासिल नहीं थी

मेरी माँ मुझे अपने बुड़बक बच्चों में शुमार करती रही थीं
मुल्क के बादशाह थे कि मुझे एक होशमंद शहरी जानकर
मेरी पूँछ अपने बूटों से अकसर कुचल दिया करते थे

बादशाह का आयातित मशरूम खाया कद्दावर शरीर था
जिसका भार मेरी पूँछ कहाँ सह पाती थी
या फिर अपने ही मुल्क की आज़ादी की माँग कभी कर बैठता
तो सिपाहियों के दनादन बरसते डंडे खाकर अपनी पूँछ समेटकर
बैठ जाता अपने आज़ाद मुल्क के किसी क़ैदी हिस्से में

आप भी तो मेरी इस क़ैदी की हैसियत पर खी-खी मुस्कुराते रहे हैं
आप भी तो मेरी आज़ादी के गीत को आलतू-फालतू कहते रहे हैं
आप भी तो आयातित मशरूम खाए हुक्मराँ के जैसे
मेरी पूँछ कुचलते रहे हैं
ख़ुद को हुक्मराँ का वंशज स्वीकारते पूरी बेशर्मी से

सच्चाई यही है मैं अपने मुल्क की आज़ादी के
नारे लगा सकता हूँ
आप ऐसा कुछ नहीं कर सकते

सच्चाई यही है मेरी शिनाख़्त विद्रोहियों में है
आपकी भडुओं तक में नहीं है

सच्चाई यही है हम भूखे-नंगे ही रहे सदियों से
आपको भी खाना कहाँ मिल रहा मनपसंद इन दिनों

ना-ना, आप ज़र्रा बराबर भी ना घबराएँ
आपके पास पूँछ कहाँ है
आपकी साँसें हैं आपके आक़ा की साँसों में मिली हुईं
आपके आक़ा के हर क़ातिल मौक़े का साथ देती हुईं

ना-ना आप भी ज़र्रा बराबर घबराएँ नहीं
आपको अपनी आज़ादी नहीं चाहिए किसी भी हाल
बस आपसे यही कहना चाहता कि आपके भी पाँव मेरी पूँछ पर आ पड़े हैं
आपके आगे फैले हुए गहन अँधेरे में किसी अँधे की तरह चलते हुए।

●संक्रांति
धूप है नदी की अथाह जलराशि के ऊपरी तल पर
चलती हुई जैसे मेरे प्रेम को वहाँ-यहाँ चिकोटी काटती हुई

धूप के इस संकेत-स्वर में चाहता हूँ करना प्रेम उसी से
चाहता हूँ उसी का संकीर्तन करना
चाहता हूँ उसी का जादू उसी की परिकथा उसी का संगीत

इस धूप में इस समय का था सबकुछ व्याप्त सबकुछ भरा
अपने सुख अपने दुःख में फैलता सुंदर ग्रह-उपग्रह-सा
मेरी ही ख़ातिर जनम-जनम से पृथ्वी के

इस संक्रांति में जो कुछ चू रहा था
इस संक्रांति में जो कुछ झर रहा था
एकदम नई लिपियों-सा
एकदम नई तिथियों-सा
एकदम नई विधियों-सा

प्रेम था उसी का सिर्फ़ उसी का
जिसे चाहता चला आ रहा था
जिज्ञासु बिलकुल उसी के जलकुण्ड में
अधीर बिलकुल उसी के अंतरीक्ष-सरोवर में
दसों दिशाओं को लाँघता
सातों आसमानों पर तैरता।

●धुनकी
जाड़ा जाने को है तब भी गली में गूँज रही है
रुई धुनने वाले की धुनकी की रहस्य से भरी धुन

रुई धुननेवाला कोई संगीतक नहीं होता ना गवैया
उसकी धुनकी मगर किसी वायलिन किसी सारंगी से कम नहीं होती
जो रुई भी धुनती है और अचरज से भरा तान भी निकालती है

एक जिल्दसाज़ जिनसे आप अपनी किताब की जिल्दसाज़ी कराते हैं
एक रुई धुनने वाला जिनसे आप अपनी रज़ाई की ख़राब रुई ठीक करवाते हैं
दोनों किसी अच्छे डॉक्टर की तरह ठीक कर देते हैं समय की ख़राबी को भी

और कवि, वह भी तो ठोंक-पीटकर सही करता है समय का असहनीय घाव

एक जिल्दसाज़ एक रुई धुननेवाला और एक कवि कभी झूठ नहीं बोलता
जिस तरह पिता कभी झूठ नहीं बोलते अपने हाकिम से या अपने गाहक से

सांडे का तेल बेच रहा वह आदमी ज़रूर झूठ बोलता आ रहा है बरसों से
जैसे सरकारें झूठ बोलती आ रही हैं कि बस हमारी ज़िंदगी ठीक होने ही वाली है

यही वजह है तुम दौड़ना चाहते हो मगर गिर जाते हो ठोकर खाकर अकसर

और धुनकी में मुझे जनता की मुख़ालिफ़ सरकार के मुख़ालफ़त की धुन साफ़ सुनाई देती है
जो तुम नहीं सुन पाते लेकिन एक पिता एक जिल्दसाज़ बख़ूबी सुन लेते हैं उस धुन को

मैं जो कवि ठहरा, मेरी कविता में भी धुनकी की वही मुखालिफ़ धुन है भरी हुई
तुम भी सुनो मेरी आवाज़ जैसे एक पिता एक जिल्दसाज़ सुनते हैं धुनकी की आवाज़।

●भटकन
एक गवैया अपने गले की आवाज़ में भटकता है
एक सारंगीवाला सारंगी की मुश्किल तान में
मौसम इतना ख़राब कर दिया गया है मेरे आसपास
कि एक गवैया अपनी आवाज़ सही नहीं निकाल पाता
न सारंगी वाला अपनी मुश्किल तान सही कर पाता है

मैं भी कहाँ पकड़ पाता हूँ कोई महीन प्यारी पदचाप
जिसके पीछे भटकने के लिए निकल पडूँ अपने घर से
और मेरे पीछे मेरा कोई दुश्मन नहीं लगा हो रोज़ की तरह

मैं जो आवारागर्दी करता आया हूँ भटकता आया हूँ
अपने प्यारे गवैये से अच्छा कुछ सुनने के लिए
अपने प्यारे सारंगीवाले की मुश्किल तान पकड़ने के लिए
उन तक पहुँचने के सारे रास्ते भूल जाता हूँ बदख़्याली में

यह एक सुनसान जगह है और यह एक सुनसान लंबी गली
यहाँ कोई नहीं आता भटकने के लिए मैं ही आता हूँ हर दिन
अपनी भटकन में मुड़कर देखता हूँ मेरे दुश्मन मेरे पीछे रहते हैं

यह अच्छी बात है इस सुनसान में मेरे दुश्मन मुझे अकेला नहीं छोड़ते।

मैं पूरा देश नहीं भात माँगता हूँ
मैं देश की संसद से भात माँगता हूँ
मैं देश की संसद से रोटी माँगता हूँ
मैं देश की संसद से पानी माँगता हूँ

संसद मेरी हर माँग ख़ारिज करती है
जैसे मैंने पूरा देश माँग लिया हो

मैं पूरा देश नहीं बस भात माँगता हूँ
इस बजट आनेवाले सत्र में राष्ट्राध्यक्ष से।

●रक्तचाप
दिन भर बहुत सारे लोग मिलते हैं
धरती भी मिलती है घर भी वृक्ष भी
सबका चेहरा तमतमाया हुआ लगता है

ख़ुद मेरे साथ ऐसा ही कुछ हो रहा है
लेकिन मैं आसानी से स्वीकार नहीं करता
कि तमतमाया टहलता हूँ अपने छोटे-से कमरे में

आप प्यार से आगे वाले को कितना समझाते हैं
वह अपनी झींक में खीजता-कुढ़ता जाता है बेवजह
आप ही अपना महँगा कैमरा बचाते निकल लेते हैं
फिर थोड़ा आगे जाकर किसी अनजान आदमी पर
ग़ुस्सा निकालते हैं बजाय नायाब तस्वीरें खींचने के

थकना अच्छी बात कभी नहीं रही
लेकिन थकान ही भारी पड़ती है
उस सुंदर दिखनेवाली लड़की की पीठ पर

वह लड़का अपने बड़े होने का इंतज़ार कहाँ करता है
अभी से डाँटता है अपनी बहन को और माँ को भी

इस जीवन में कब किसका रक्तचाप बढ़ जाएगा
मैं आपको यह सब बताकर गिराना नहीं चाहता
जिस तरह गिरती है पेड़ की कोई टहनी अकस्मात्।

●ठगाना
मैंने एक सौ पाँच रुपए का पेट्रोल माँगा
सुना था कि पचपन का एक सौ पाँच का
या दो सौ पाँच का पेट्रोल लेने से
वे पेट्रोल कम नहीं दे पाते थे गाड़ियों में
लेकिन हुआ उलट मेरे साथ जैसे सौ का लेने पर हुआ था
पेट्रोल इतना कम दिया उस पेट्रोल डाल रहे कर्मचारी ने
कि मैं भौंचक उसका मुँह ताकता बढ़ गया अपनी मंज़िल

आपके साथ भी ऐसा हुआ होगा ठगी से भरे इस समय में
या आप होशियार होंगे और नहीं ठगे गए होंगे जीवन में
या ऐसा भी हो सकता है आप भी ठगनेवालों में रहते हों

इसी तरह मैंने दवा दुकानदार से दवाइयाँ लीं
जो टैबलेट तीन में लिया था उसने उसके छह लिए
आप कहेंगे मेरे जैसा बुड़बक अब कहाँ कोई बचा है
बताता चलूँ मैं ठगा रहा था लगातार अपना विलाप अलापते

एक लंगड़े भिखारी पर तरस खाकर कुछ रुपए दे दिए थे साँझ को
दूसरे दिन देखा वही भिखारी भला-चंगा होटल में बैठा समोसे खा रहा था

बीवी ने कहा था किसी अच्छी कंपनी का सरसों तेल लेकर आने
घर आया तो मालूम पड़ा वह भी नक़ली निकला मेरे नक़ली विलाप की तरह
बीवी ने कहा भी आप ही हमेशा ठगाकर क्यों घर चले आते हैं जी

मैं स्वीकारता हूँ अपने मुल्क के संविधान की क़सम खाते
ठगाई-ठगवाई का काम जो लोग करते हैं पूरी तरह कुशल
या जो सरकारें ऐसा करती आई हैं मेरे-आपके साथ
इसमें कोई दोष न ठगों का है न ठगिनी सरकारों का
दोष शत-प्रतिशत मेरा है मैं अपनी बीवी से और आप से भी कहता हूँ

मेरा दोष इस तरह है दुनिया भर के होशियार बंधुओ
मैंने उस कम पेट्रोल देने वाले पेट्रोलपंप के शीशे कहाँ तोड़े
उस ज़्यादा पैसे लेनेवाले दवा दुकानदार के चेहरे पर कहाँ थूका
उस भिखारी का पाँव मैंने सचमुच कहाँ तोड़ डाला उसे पकड़कर
मैं तो हर दफ़ा ठगाने के बाद अपना थूका चाटता रहाफिर से ठगाए जानेवालों की भीड़ का हिस्सा बनते।

 

●सुबह का नाश्ता
वाइफ़ आज मेरे लिए नहीं बच्चों के लिए
चिकन चिल्ली बना रही हैं सुबह के नाश्ते में
पूरी के साथ तीनों बच्चे आज यही खाएँगे
सरकार ने एक प्रतिशत महँगाई भत्ता देने का
ऐलान किया है मुनादी की है
मेरे लिए अँकुरा चुके चने हैं घर में
प्याज़ तीखी हरी मिर्च नमक मिलाकर
दिए जाएँगे यही चने सजाकर
मुझे टीवी पर सुबह का समाचार सुनवाते

मेरी जान, बच्चों को नाश्ते में मज़ेदार चिकन चिल्ली
और मुझे अँकुरा चुके चने पर टरका रही हैं घड़ी देखते हुए
चिकन चिल्ली पर मेरा भी उतना ही हक़ है जितना बच्चों का

जानेमन, आपको चिकन चिल्ली इसलिए नहीं दे रही
अगर सरकार के छोड़े जासूस ने आपका मुँह सूँघ लिया
और सरकार को उस जासूस के ज़रिए यह मालूम पड़ गया
कि आज आपने चिकन चिल्ली खाई है
तो सरकार महँगाई भत्ता देना ही बंद कर देगी
अभी एक प्रतिशत दिया है रोते-धोते
यही सरकार कल महँगाई भत्ता आधा प्रतिशत कर देगी
एक दिन पूरी तरह ख़त्म यह बयान जारी करते हुए
यह ढिंढोरा पीटते हुए कि देश में महँगाई अब कहीं नहीं है

मेरी जान, हुकूमतें ऐसा काहे कहती हैं
इसलिए कि अब विपक्ष हमारे पक्ष का कुछ नहीं कहता

मेरी जान, हुकूमतें ऐसा काहे करती हैं
इसलिए कि सारे संगठन मुँह छिपाकर घर बैठ गए हैं

मेरी जान, हुकूमतें इतनी ढीठ काहे हो गई हैं
इसलिए कि अवाम भूखे नंगे मर जाते हैं
लेकिन अपनी मौत का बदला लेने
सड़कों पर नहीं निकलते पहले की तरह

जानेमन, मैं भी तो यही सब करता
दुबका रहता हूँ छिपा रहता हूँ
जो विपक्ष करता है
जो संगठन के लोग करते हैं
जो अवाम करते हैं, वही सब करता

नहीं, आप ऐसा नहीं करते
आपको आपका शायर ऐसा करने नहीं देता

मैं भी तो महँगा चना महँगा प्याज़ खा रहा हूँ
सुबह के नाश्ते में सबकुछ को भुलाता

नहीं जानेमन, आप प्याज़-चना खा रहे हैं
हुकूमत में बैठे हुए लोगों की तरह दोप्याज़ा नहीं खा रहे हैं
जो आत्मग्लानि से पसीना-पसीना हुए जा रहे हैं
इस ठंड लेकर लौट रही सुबह में।

मैं पूरा देश नहीं भात माँगता हूँ
मैं देश की संसद से भात माँगता हूँ
मैं देश की संसद से रोटी माँगता हूँ
मैं देश की संसद से पानी माँगता हूँ

संसद मेरी हर माँग ख़ारिज करती है
जैसे मैंने पूरा देश माँग लिया हो

मैं पूरा देश नहीं बस भात माँगता हूँ
इस बजट आनेवाले सत्र में राष्ट्राध्यक्ष से।

● शहंशाह आलम
● जन्म : 15 जुलाई, 1966, मुंगेर, बिहार
● शिक्षा : एम. ए. (हिन्दी)
● प्रकाशन : ‘गर दादी की कोई ख़बर आए’, ‘अभी शेष है पृथ्वी-राग’, ‘अच्छे दिनों में ऊंटनियों का कोरस’, ‘वितान’, ‘इस समय की पटकथा’, ‘थिरक रहा देह का पानी’ छह कविता-संग्रह तथा आलोचना की पहली किताब ‘कवि का आलोचक’ प्रकाशित। ‘गर दादी की कोई ख़बर आए’ कविता-संग्रह बिहार सरकार के राजभाषा विभाग द्वारा पुरस्कृत। ‘आग मुझमें कहाँ नहीं पाई जाती है’ कविता-संग्रह शीघ्र प्रकाश्य। ‘बारिश मेरी खिड़की है’ बारिश विषयक कविताओं का चयन-संपादन। ‘स्वर-एकादश’ कविता-संकलन में कविताएं संकलित। ‘वितान’ (कविता-संग्रह) पर पंजाबी विश्वविद्यालय की छात्रा जसलीन कौर द्वारा शोध-कार्य। दूरदर्शन और आकाशवाणी से कविताओं का नियमित प्रसारण। हिन्दी की सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं प्रकाशित। बातचीत, आलेख, अनुवाद, लघुकथा, चित्रांकन, समीक्षा भी प्रकाशित। वेब पत्रिकाओं में भी रचनाएं प्रमुखता से आती रही हैं।
● पुरस्कार/सम्मान : बिहार सरकार का राजभाषा विभाग, राष्ट्रभाषा परिषद पुरस्कार तथा बिहार प्रगतिशील लेखक संघ का प्रतिष्ठित पुरस्कार ‘कवि कन्हैया स्मृति सम्मान’ के अलावा दर्जन भर से अधिक महत्वपूर्ण पुरस्कार/सम्मान मिले हैं।
● संप्रति, बिहार विधान परिषद् के प्रकाशन विभाग में सहायक हिन्दी प्रकाशन।
● संपर्क : हुसैन कॉलोनी, नोहसा बाग़ीचा, नोहसा रोड, पेट्रोल पाइप लेन के नज़दीक, फुलवारीशरीफ़, पटना-801505, बिहार।
मोबाइल : 09835417537
ई-मेल : shahanshahalam01@gmail.com

  1. शहंशाह आलम

    ‘बिहार खोज ख़बर’ का आभार।

  2. Rawel Pushp

    राजकिशोर राजन द्वारा लिखा आलेख – कविता में हमारे समय की पटकथा लिखता कवि शहंशाह आलम ,स्थापित करता है कि आज के दौर की कविता का वो शहंशाह है .शहंशाह आलम पर इतने बेबाकी से लिखे आलेख के लिए राजन जी तथा नेट पत्रिका बिहार खोज खबर बधाई के पात्र हैं.
    मेरी आन्तरिक शुभकामनाएं .
    # रावेल पुष्प ,कोलकाता
    चलंतभाष: 94341 98898.

  3. ROHIT THAKUR

    बहुत ही सुंदर कविता बिलकुल नईं अंतः दृष्टि है कवि की ।

  4. सुषमा सिन्हा

    बेहतरीन कविताओं पर बहुत बढ़िया टिप्पणी !!
    खूब बधाई एवं शुभकामनाएँ !!

  5. राजकिशोर राजन

    समकालीन कविता की महत्वपूर्ण उपस्थिति हैं कवि शहंशाह आलम।उनकी कविताएँ संघर्ष और सौंदर्य को एक साथ साध हमारे साथ दूर तक यात्रा करती हैं।

  6. योगेंद्र कृष्णा

    शहंशाह आलम की कविताओं पर प्रखर दृष्टि और समग्रता से आम पाठकों से बात करती-सी यह प्रस्तुति बेहद पठनीय है। कवि-व्यक्तित्व भी यहां कविता के बरक्स खुल कर सामने आता है। कवि और समीक्षक को इसके लिए मेरी बधाई।

  7. शहंशाह आलम

    अग्रज रावेल पुष्प,सुषमा सिन्हा,राजकिशोर राजन और रोहित ठाकुर की प्रतिक्रियाओं के लिए आभार।

  8. नीलोत्पल रमेश

    शहंशाह आलम की कविताएं आज की विकट परिस्थिति को अभिव्यक्त करती हैं । हमारे आसपास की चीजों को बारीकी से कविताओं में ढालने का कार्य कवि ने किया है ।बहुत ही मार्मिक अभिव्यक्ति । बधाई – कवि और बिहार खोज खबर को!

  9. Bhawana Sinha

    मन में रच बस जाने वाली इन अद्भुत कविताएओं के लिए हमारे प्रिय कवि शहंशाह आलम जी को बहुत बहुत बधाई व शुभकामनाएं ।

  10. = अरविन्द श्रीवास्तव

    समकालीन कविता और नई पीढ़ी को शहंशाह आलम ने जो दिशा दी है उसे कभी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कविता में उनकी बादशाहत अस्सी के दशक से आज तक बनी है। वक्त हत्यारा हो तो कवि प्रतिरोध से खुद को रोक नहीं पाता है। उनकी बेचैनी में प्रेम के लिए पर्याप्त स्पेस होता है.. उनकी कविताओं पर राजकिशोर राजन की बेहतरीन समीक्षा से मन आह्लादित है। कवि व समीक्षक को बहुत-बहुत शुभकामनाएं!बिहार खोज ख़बर का आभार ।

Leave a Reply

*