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‘किसी भी समय का निर्धारण दो वादों के बीच में नहीं किया जा सकता’- प्रभात सरसिज

prabhat sarsij29 सितम्बर 1950 को वर्तमान जमुई जिले के गिद्धौर गांव में जन्में प्रभात सरसिज ने एम­ए­ हिन्दी विषय में भागलपुर विश्वविद्यालय से किया। 8वें दशक की लगभग सभी चर्चित पत्र/पत्रिकाओं में लगभग 150 कवितायें प्रकाशित/प्रसारित। 1975 में पटना प्रदेश के अध्यक्ष शांति निकेतन में 2002 से 2006 तक लेखन साधना। शोध:- जैन तीर्थंकर महावीर का जन्म कैवल्य और बिहार, एक काव्य संग्रह शीघ्र प्रकाश्य। संपर्क: 101, सत्यगंगा अपार्टमेंट, शिवपुरी,
पटना-8000023, मो0 9708036211

वरिष्ठ कवि प्रभात सरसिज से युवा लेखक अरुण नारायण की बातचीत

अरुण नारायणः साहित्य की वर्तमान रचनाशीलता का जो क्षितिज है वह कितना आश्वस्तकारी है?

प्रभात सरसिजः रचनाशीलता प्रगल्भ हुई है और पाठकीयता में ह्रास हुआ है जिसके कारण संप्रेषण का आभाव-सा दिखता है। बावजूद इसके साहित्य के क्षितिज का विस्तार हुआ है। आज हिंदी कविता अंतर्राष्ट्रीयता की हद तक पहुंच चुकी है। पाठकीयता के हास का मूल कारण है कि अकादमिक रूप से वह विपन्न हो गई है। विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम अपनी जर्जरता को ढो रहे हैं। समकालीन साहित्य के पठन-पाठन नहीं होने के कारण एक बड़ा पाठक वर्ग समकालीनता से दूर होते चला जा रहा है। लेकिन हिंदी रचनाशीलता के क्षितिज का विस्तार हो चुका है इसमें कोई दो राय नहीं।

अरुण नारायणः एक दौर में अपने यहां हिंदी में एक से एक नायाब लघु पत्रिकाएं निकलीं। आज की वर्तमान स्थितियों में लघु पत्रिकाओं का वह वैविध्य और गांभीर्य क्यों नहीं है?

प्रभात सरसिजः लघु पत्रिकाओं का वह दौर 1967 से बढ़ा। इसकी वजह थी। नए लोगों ने जो लिखना शुरू किया। उनके अंदर सृजनात्मक विविधता सामने आई। उसके मूल्यांकन के लिए कोई केंद्र नहीं था। बड़े समालोचक एक संकीर्ण दायरे में घुमते रहे इसलिए वे नए रचनाकारों के लिए अस्तित्व संकट का समय था। ज्यादातर लघु पत्रिकाएं रचनाकारों के द्वारा निकाली गईं। उसने अपने दायित्व का निर्वाह अच्छी तरह किया और इन लघु प्रयासों का जो हश्र होना था, वह हुआ।

छोटी पत्रिकाओं ने अपने क्षितिज को फैलाया और समानधर्मी रचनाकार बहुलता से सामने आये जिनमें से अधिकतर आज स्थापित हो चुके हैं। इसका कारण यह है कि बड़ी प्रकाशन संस्थाएं पत्रिकाओं के प्रकाशन में पहल नहीं कर रही हैं और डाक की महंगाई के फलस्वरूप पत्रिकांएं पाठकों, लेखकों के पास तक भेजा जाना असंभव-सा हो गया है फिर भी काफी पत्रिकाएं निकल रही हैं और उसे खरीद कर लोग पढ़ रहे हैं।

अरुण नारायणः हिंदी कविता की जो विकास यात्रा रही है उसमें छायावाद से लेकर प्रयोगवाद, प्रगतिवाद, नई कविता और आज की अतुकांत कविता आदि बहुत सारे पड़ाव रहे हैं। कविता के इन पड़ावों से विकसित हुई इस यात्रा को कैसे देखते हैं आप?

प्रभात सरसिजः अतुकांत कविता पर बात करने की प्रासंगिकता नहीं रही। इसे निराला ने स्वयं ध्वस्त कर दिया। लेकिन कोई भी वाद किसी विषेष तारीख को समाप्त नहीं होती और आनेवाले दौर में उसकी छाया पड़ ही जाती है जैसे रीतिकाल के कोई न कोई गुण छायावाद में सम्मिश्रित था और छायावाद का अस्तित्व प्रयोगवाद में परिलक्षित होता था। इसलिस किसी भी समय का निर्धारण दो वादों के बीच में नहीं किया जा सकता। लेकिन हिंदी के सवा सौ वर्ष की रचनाशीलता की गति को अगर हम निरखें तो पाते हैं कि हिंदी कविता का विकास अपरिमेय एवं समकालीन विचारों से सुदृढ़ होता चला गया। आज की कविता का मूल्यांकन हम पारंपरिक तरीके से नहीं कर सकते। कविता में संवेदनशीलता पराकाष्ठा पर है और वर्तमान सामाजिकता एवं राजनीतिक परिदृष्य में भी हिंदी कविता हस्तक्षेप कर रही है। आज की हिंदी कविताओं में कवियों की अपनी प्रतिष्ठापना की कोई भूख नजर नहीं आती। आज अभिव्यक्ति का कोई संकट नहीं है और जो भी संकट है वह सहज तथा अनुगम्य है। अभिव्यक्तियां खतरों से जूझती नजर आती हैं, किंतु उनका भौतिक स्वरूप निरंतर सबल बनता जा रहा है।

यह बातचीत जब चल रही थी तब बीच में वरिष्ठ लेखक शेखर का आगमन हुआ। आगे की बातचीत में शेखर भी शामिल रहे।

अरुण नारायण: हिंदी के समकालीन कवियों में आपके प्रिय कवि कौन हैं और वह किन वजहों से आपको प्रिय हैं?

प्रभात सरसिजः यह एक मुश्किल प्रश्न है इसे रेखांकित करना मुश्किल है और कवि होने के नाते अपने समय के किसी भी कवि के द्वारा जो प्रभावकारी पंक्तियां लिखी जाती हैं उन पंक्तियों की मैं सराहना करता हूं। प्रभावशाली कवियों की अंतर-ऊर्जा के प्रति मैं निर्भयभाव से ईर्ष्या रखता हूं।

वैसी रचनाओं को पढ़ने के बाद मुझे लगता है कि मेरी भावोद्रेगता और संवेदना से ये प्रभावशाली अभिव्यक्तियां कैसे छूट गईं इसलिए समग्र रूप ये कहा नहीं जा सकता। हिंदी साहित्य में 20 से 25 अच्छे कवि हैं जो भारतीय हिंदी काव्य संसार को प्रकाशमान कर रहे हैं।

अरुण नारायण: हिंदी के समकालीन कविता के बारे में कहा जाता है कि वह बहुत अच्छी लिखी जा रही है लेकिन यह आरोप भी चस्पां किए गए हैं कि उसमें से अधिसंख्य बहुत ही सपाट फाॅर्म में हैं इसपर आप क्या कहेंगे?

प्रभात सरसिजः आप सपाट नहीं उसे दुरूह कहें। सपाट कवितायेँ जो लिखी गईं वे अपनी संप्रेषणीयता में आगे निकल गईं। बोझिल शब्दावलियों की रचनाएं बहुपठित इसलिए नहीं हो पाईं कि हिंदी साहित्य में पाठकीयता के गुणों को उभार नहीं मिल पाया। धूमिल की सारी कविताएं सपाट हैं। वे पाठकों से सीधा संपर्क करती हैं और सहज अर्थोपार्जन में वे कविताएं आगे निकल गईं। यह सही है कि जो कविताएं अपनी दुरूहता में सामने आयी हैं उनमें मुक्तिबोध के शब्दों में आभ्यांतरण अधिक है। निराला की सबसे अच्छी कविता ‘राम की शक्ति पूजा’ है। इस कविता में अभ्यांतरण अपनी पराकाष्ठा पर है। मेरे कहने का आशय यह है कि पाठकीयता को उसके अंतर में प्रवेश करना होगा और ऐसी जिद हिंदी साहित्य में अब तक दुर्लभ है। ‘राम की शक्ति पूजा’ की अर्थवता को ग्रहण करने वाले पाठकों की संख्या हिंदी प्रदेशों में बहुत ही न्यून हैं इसलिए हर तरह की कविताओं से हिंदी साहित्य का विकास हुआ है। जिस तरह बर्नाकूलर हिंदी को जानने के बाद ही रामचंद्र शुक्ल के हिंदी साहित्य के इतिहास को हम जान सकते हैं।

शेखर: प्रगतिशील लेखक संघ से आपके जुड़ने की प्रेरणा क्या रही? उस दौर की अपनी जीवनचर्या और परिवेश की बाबत कुछ कहें?

प्रभात सरसिजः 1967 से लेकर 1980 के बीच कई तरह के काव्यांदोलनों ने सर उठाया। मेरे साथ दो तरह के संकट थे। पारिवारिक रूप से आभिजात्यपन मेरे अंदर था। दूसरा यह कि सामंती परिवेश का अवशेष बचा हुआ था जिसका दबाव मैं सीधा महसूस कर रहा था। मेरी कविता यहीं से उपजती है। राजकमल चौधरी हों, मलय राज चौधरी हों, सौमित्र मोहन हों, मोना गुलाटी हों, जगदीश चतुर्वेदी हों,श्याम परमार हों या निर्भय मल्लिक हों-इन सबों की पत्रिकाएं आती थीं लेकिन
इनका प्रभाव आप मेरी कविता में नहीं पाएंगे। दैहिक फुहड़पन को हमने इनकार किया।

यह सही है कि मैं अपनी रचनाओं के कारण प्रलेस से जुड़ा। 1974 में मैं पटना प्रलेस का अध्यक्ष था उस समय खगेंद्र ठाकुर सचिव थे। उसके पश्चात एफ्रो एशियाई लेखक संगठन की राष्ट्रीय कार्यकारिणी का सदस्य बना। प्रगतिशील रचनाओं के दौर में मेरे जैसा गांव में रहने वाला कम पढ़ा-लिखा युवक शामिल हो गया। मेरी एक लंबी कविता में एक शब्द ऐसे आए जिसका तेलगू के प्रतिष्ठित महाकवि श्री श्री ने सुधार लेने की सलाह दी। आंदोलन का दौर था वह। ऐसे में मेरी रचनाएं सृजन संकल्प के रूप में सामने आईं। प्रलेस से मेरे जुड़ाव का श्रेय कविवर कन्हैया को जाता है। उस दौर में मैंने कई अंतरराष्ट्रीय कवियों यथा एलेक्स-लागुमा, महमूद दरवीष, जापानी कवयित्री रूमिको कोरा तथा निग्रो कवि कोस्मो पीटर्स मेरे नजदीक आये। मैं सज्जाद जहीर और मुल्कराज आनंद के पारिवारिक सदस्य-सा जुड़ा रहा।

कई रचनाएं भी विदेषी भाषाओं में अनूदित होकर बीते दौर में आयी थीं। कविता में आये आंदोलन एक विक्षोभ के रूप में प्रदर्शित हुए। उसने समूची परंपरा में तोड़-फोड़ का प्रयास किया, लेकिन रचनात्मकता अपने सकारात्मक पहलुओं को लेकर समुद्र के अंतप्र्रवाह की तरह गंभीर बनी रही और आंदोलनों का दौर उसी समुद्र में बड़वानल बनकर आये और विनष्ट हो गये।

शेखर: नेहरू से मोहभंग के बाद जो जनज्वार पैदा हुआ था उसने अपने समय की रचनाओं को प्रभावित किया। उसका स्वरूप देशज बोल्शेविक भावनाओं के उभार के रूप में प्रकट हुआ। आपकी कविताओं की बात करें तो उसमें एक किस्म की भाषाई आभिजात्यता नजर आती है हालांकि अंदर से वे कविताएं शालीन नहीं अपितु विध्वंसक ही हैं आखिर इसकी क्या वजह मानते है आप?

प्रभात सरसिजः इसकी वजह मेरी पारिवारिक परिस्थितियों को भी मान सकते हैं। जिसके संदर्भ में हमने अभी बतलाया ही आपको। मैं इस तोहमत का बचाव माओत्से तुंग की 21 कविताओं में जिसमें प्रमुख है करना चाहूंगा। हालांकि उन कविताओं की बोझिलता से मैं खुद का बचाव नहीं करना चाहता। मैं स्वीकार करता हूं कि मेरी कविताओं पर यह आरोप शुरू से लगते आये। निराला की ‘राम की शक्ति पूजा’ हो अथवा मुक्तिबोध की अंधेरे’, ‘ब्रहराक्षस में’ इत्यादि कविताएं अपनी दुरूहता के कारण मेरी कविता की प्रांजलता का बचाव नहीं कर सकती। इसे मैं अपनी कमजोरी के रूप में स्वीकार करता हूं। मैंने स्वयं कई सिद्धहस्त कवियों गीतकारों से आग्रह किया था कि मेरी एक भी कविता का स्वरूप किसी के प्रभाव के साथ पुनःरचित कर दें, ऐसा नहीं हो पाएगा। यह संभव भी नहीं है और भारतीय काव्य संसार में ऐसा उदाहरण अब तक नहीं मिला। भाषा का गांभीर्य, शब्दों की कंजूसी के रूप में उभरता है और यह मुझ पर हावी है।

शेखर: समकालीनों में आलोकधन्वा और ज्ञानेंद्रपति की बात करें तो आपकी कविताएं ज्ञानेंद्रपति के निकट हैं। आलोकधन्वा की कविता स्नैप्स की तरह जोड़कर विस्तारित की गई लगती हैं। ऐसा लगता है कि दो स्नैप्स के बीच की जो खाई है आलोक मोजायक बनाने वाले कारीगर की तरह उसे मुकम्मल बनाते हैं। उनकी कविता कई बैठकों में छिल-छालकर अपना गंतव्य हासिल करती हैं। जाहिर है उनकी कविताओं में स्वाभाविक धारावाहिकता आप नहीं पाएंगे। कम से कम यह दोष आपकी कवितााओं में नहीं है। भावभूमि के स्तर पर आप ज्ञानेंद्रपति के करीब हैं आलोकधन्वा की तरह ओढ़ी हुई बहुअर्थी शब्दों की बाजीगरी आपमें नहीं है।

प्रभात सरसिजः आलोकधन्वा कविता की दुनिया के सिद्धहस्त संगतराश हैं। आधुनिक हिंदी साहित्य में उनका कोई जोड़ नहीं है। रहीम के दोहों को एक-दूसरे से जोड़ना भले ही असंगत हो लेकिन समान नीति एवं भाव विचार वाले दोहों को एक-दूसरे के बाद पढ़ने से उसमें तारतम्यता नजर आती है। आलोकधन्वा हिंदी कविता के टेक्नोक्रेट हैं। उनकी यह तकनीक एक-एक कविता को पढ़ने के बाद प्रभावित करती चली जाती है। उनकी प्रमुख कविताओं की रचना प्रक्रिया एक दिन अथवा एक रात में समाप्त नहीं हुई है बल्कि उनके सृजन की काल अवधि भी विस्तारित है। रचना प्रक्रिया की तारतम्यता में अवधि विस्तार को काव्य-दोष के रूप में मैं नहीं देखता । सबसे बड़ी खूबी यह है उन्होंने अपनी कविताओं की संरचना में गत्यात्मकता एवं संप्रेषणीयता का संतृप्त घोल तैयार किया है। आलोकधन्वा जब से कवि हुए तब से लगभग 50 वर्ष के अपने रचनात्मक दौर में वेश और परिवेश-दोनों से कवि ही बने रहे यह सौभाग्य मुझे नहीं मिला।

ज्ञानेंद्रपति की रचनाशीलता की किस्म अलग है। एक मनीषी की तरह जीवन व्यतीत करने वाले ज्ञानेंद्र की रचनाओं में इतनी विविधता है कि उनकी किन्हीं दो कविताओं को कोई सम्मिश्रित नहीं कर सकता। मैं भी इसी सृजनषैली से आक्रांत रहा हूं। बिहार को उन कुछेक कवियों ने हिंदी कविता संसार में चिन्हित किया गया है जिनमें इन दोनों कवियों का भी नाम लिया जा सकता है।

शेखर: इतने लंबे अंतराल में आपने लगभग 300 कविताएं रचीं। वे एक पेज की भी हैं और आठ पेज की भी। लेकिन किसी भी छोर पर उनमें आंचलिकता नहीं है। अपनी तइ अगर आपको 7 कविताएं चुननी हों तो उसमें आपकी खुद की कौन-कौन-सी कविता होगी?

प्रभात सरसिजः अपनी एक मात्र कविता जिसका मैं स्वयं पाठक हूं उसका षीर्षक है ‘कवि जगपति’। उसके बाद ‘रंगो का विस्फोट’ कविता को भी मैं उसी श्रेणी में रखता हूं। षुरूआती दौर में जयपुर से प्रकाशित मंजुल उपाध्याय संपादित ‘शरर’ पत्रिका में ‘नीली नसें और गुलाबी हथेलियां’ आयी जो सात पृष्ठों की थी वह मेरे पास उपलब्ध नहीं है। दो अच्छी कविताओं के बीच कई छोटी कविता का सृजन आवश्यक हो जाता है और ये कविताएं किसी भी कवि की महत्वपूर्ण रचना के पहले आनेवाली उप सामग्रियां होती हैं। मेरी रचनाधर्मिता इसी तरह आगे बढ़ी हैं और कई वर्षों से ऐसी कविता नहीं लिख पाया हूं जिसका मैं स्वयं पाठक हो सकूं।

Arun Narayanअरुण नारायण नई पीढ़ी के एक संभावनाशील लेखक-संस्कृतिकर्मी हैं। उनके लेख, कविताएं, रपट, इंटरव्यू एवं समीक्षाएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते हैं। कृतियां: दास्तान-ए-जिन्दगी, ‘बिहार के पत्रकारों का जीवन-कर्म’ संपादन: ‘कृष्ण: मिथक के बरअक्स’, भारतीय समाज में श्रीकृष्ण, साहित्य, लोक और मिथक के कृष्ण, ‘निरंजना’ के स्त्री विमर्श पर केंद्रित, ‘पितृसता में स्त्रीः सृजन, संघर्ष और साझेदारी’ विषेशांक का अतिथि संपादन संप्रति: बिहार विधान परिषद में कार्यरत हैं। 

अरुण नारायण से मोबाइल नंबर 08292253306 पर सम्पर्क किया जा सकता है। 

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