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क्या यह इस महान पुस्तकालय का अंत है?

फर्श पर पिछली रात की बारिश का पानी जमा था। कमरे की छत से पानी रिस कर फर्श पर अभी टपक ही रहा था। यह एक बड़ा सा कमरा था, जिसकी दो तरफ की दिवारें सागवान की लकड़ी से बनी बुक शेल्फों से ढकी हुई थी।

बुक शेल्फ के धुंधले पड़ चुके शीशों के पार एक कतार में करीने से रखी पुस्तकें दिखती है। बुक शेल्फों पर धूल की मोटी परत जमी थी, जो नमी के कारण चिपचिपी हो गई थी।

मुझे बताया गया था कि ये स्वर्गीय डा0 सच्चिदानन्द सिन्हा की निजी संग्रह की पुस्तकें थी, जो उन्होंने लाइब्रेरी को उपहार स्वरूप दी थी।

यह सिन्हा लाइब्रेरी है। आधुनिक बिहार के निर्माता स्वर्गीय डा0 सच्चिदानन्द सिन्हा द्वारा अपनी पत्नी स्वर्गीया श्रीमति राधिका सिन्हा की स्मृति में 1924 में स्थापित की गई लाइब्रेरी। डा0 सिन्हा ने इसकी स्थापना लोगों के मानसिक, बौद्धिक एवं शैक्षणिक विकास के लिए की थी।

पटना संग्रहालय से कुछेक कदमों के फासले पर स्थित यह लाइब्रेरी आज अराजकता और घृणित इरादों का जीता जागता उदाहरण बन कर रह गया है। आपका आश्चर्य और क्षोभ तब और भी बढ़ जाएगा जब आपको इस बात की जानकारी होगी कि इसको संचालित करने वाली ट्रस्ट के सदस्यों में पटना उच्च न्यायालय के माननीय मुख्य न्यायाधीश, राज्य के मुख्यमंत्री, राज्य के शिक्षा मंत्री तथा पटना विश्वविद्यालय के उपकुलपति हैं।

“किन्तु ट्रस्ट के सचिव ने ऐसी व्यवस्था कर रखी है कि इन सदस्यों को सभा की सूचना सभा के हो जाने के बाद ही मिलती है।” इस लाइब्रेरी से पिछले 40 वर्षो से भी अधिक समय से जुड़े रहे डा0 राम शोभित सिंह एक बातचीत में बताते हैं।

“ये लोग वर्षो से लाइब्रेरी की बैठक में शामिल नहीं हो पाये हैं। जबकि सचिव, अपने विश्वासपात्र सदस्यों को जो दिल्ली या देश के अन्य हिस्सों में होते हैं, हवाई यात्रा भत्ता दे, लाइब्रेरी की बैठक में शामिल करवाते हैं। जबकि माननीय मुख्य न्यायाधीश, मुख्यमंत्री, शिक्षा मंत्री और और उप कुलपति महज 2-3 किलोमीटर के फासले पर रहते हैं। यह विडंबना नहीं है तो क्या है।” डा0 सिंह पूछते हैं।

डा0 सिन्हा ने 10 मार्च 1926 को एक ट्रस्ट की स्थापना कर लाइब्रेरी की संचालन का जिम्मा उसे सौंप दिया। इस ट्रस्ट के सदस्यों में पदेन माननीय मुख्य न्यायाधीश, मुख्यमंत्री, शिक्षा मंत्री, पटना विश्वविद्यालय के उप कुलपति और उस समय के अन्य कई गणमान्य व्यक्ति आजीवन सदस्य बनाये गए।

डा0 सिन्हा को कोई संतान नहीं थी। उन्होंने अपने मित्र के बेटे को गोद लिया था। उनके दत्तक पुत्र अवैतनिक सचिव बनाए गए। ट्रस्ट डीड में इस बात की व्यवस्था की गई कि परिवार का सदस्य ही सचिव बने और सारे कार्यो का संचालन वही करे।

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