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क्लिक को कला में बदलने वाले सीताराम

जबसे स्मार्ट फोन और मोबाईल में कैमरे की सुविधा हुई है एक नया संसार से खुल गया लगता है।कैमरा जो कुछ विशिष्ट हाथों की चीज हुआ करता था स्मार्टफोन ने उसे सर्वसुलभ बना दिया है। उसका लोकतांत्रीकरण सा हो गया है। अब हर कोई अपने स्मार्टफोन से जैसी चाहे वैसी तस्वीरें खींच उसे मनचाहा स्वरूप दे सकता है। एक व्यक्ति को इस तरह से कलात्मक स्तर पर एम्पावर भी कर रहा है।

बिहार के चर्चित चित्रकार सीताराम जो वैसे तो अपनी चित्रकला अपने अनोखे डिज़ायन शैली के लिए मशहूर हैं । आंदोलनों के साथ साथ कला के विभिन्न अनुशासनों से उनका जुड़ाव और अपने आसपास की दुनिया की देशी कलात्मक समझ उन्हें बाकी कलाकारों से अलग करती है। उन्होंने मोबाइल से ली गई वैसी तस्वीरों को एक पेंटिंग की शक्ल में तब्दील कर दिया है।

सीताराम इस तस्वीरों को निरंतर अपने फेसबुक प्रोफ़ाइल पर अपलोड भी किया करते रहते हैं। तस्वीरों को सोशल मीडिया पर काफी लोकप्रियता भी मिल रही है। इससे उनके कामों को आसानी से देखा जा सकता है। उन्होंने अपने इस रचनात्मक उद्यम को ‘क्लिकियाना’ की संज्ञा दी है। क्लिक को यहां कला में परिवर्तित कर दिया गया है।

सीताराम अपने आस पास जी दुनिया में मौजूद नजरों से ओझल चीजों की ओर हमारा ध्यान आकर्षित करते हैं। एक सामान्य दर्शक को संभव है उस पेड़ ,पौधे में एकबारगी ये सब न दिखे लेकिन सीताराम की सतर्क व सृजनात्मक निगाह उसमें कुछ सार्थक ढूंढ़ लेती है।

सीताराम जी के क्लिक की कुछ खास बातें हैं प्रकृति से उनका खास लगाव। अब जैसे किसी पेड़ में कोई मानवाकृति का अहसास कराना। सिर्फ वही नहीं बल्कि उस मनुष्य के अंदर के भावों को भी प्रकट कराना ।कई दफे मनुष्य या किसी पशु, पक्षी की कोई भंगिमा, मुद्रा या मनःस्थिति को प्रकट करती तस्वीर नजर आती है।

पता नहीं क्यों जब भी किसी मनुष्य की आकृति उभरती प्रतीत होती है अधिकांशतः वो चिंतित, परेशान, स्तब्ध या कभी कभी दुख में डूबा नजर आती है। पता नहीं इसका संबंध खींचने वाले की मनःस्थिति से है या नहीं ?

पेड़ पौधों के अलावा पुराने ढहते मकान, ध्वस्त होते किसी घर का कोई हिस्सा या उजड़े हुए पलस्तर में से वे अपने काम की चीज ढूंढ लेती है। देखने वाले के लिए ये आश्चर्य मिश्रित सुखद अहसास होता है। ये काम कुछ कुछ प्रकृति पर अपने मनोभावों को आरोपित करने जैसा भी है। सीताराम जी ने इसे धीरे -धीरे बड़े धर्य व परिश्रम से इसे विकसित किया है। इन कामों को देखने के लिए दर्शक से भी ध्यान व एकाग्रता की अपेक्षा रखती है।

क्लिक किये गए तस्वीरों को सीताराम जी मोबाइल में ही एडिट भी करते हैं। उसमें प्रकाश और रंग का रंग का अनूठा संतुलन पैदा करते हैं जिससे तस्वीरों के कैमरे में कैद कच्ची सामग्री का समुचित कलाकृति में रूपांतरण हो जाता है।

सीताराम जी चूंकि लंबे अरसे से पेंटिंग, डिज़ायन से जुड़े हैं फलतः उन्हें रंगों की काफी गहरी समझ है। इसके अलावा रंगमंच से उनका रिश्ता , स्पेस और कंपोजिशन के महत्व का अहसास इसमें एक और आयाम जोड़ता है।

उनकी इन तस्वीरों में प्रकाश और छाया का अनूठा संयोजन भी देखने को मिलता है। कई दफा मौसम और उसका बदलता मिज़ाज़ भी उनकी सहायता करता है। जब मौसम का चरित्र परिवर्तित होता है वो संक्रमण दिलचस्प होता है।

कई कलाकृतियों को अमूर्तन, एब्स्ट्रेक्शन की श्रेणी में रखा भी जा सकता है। भले ही ये कृतियां अब्सजट्रैकट हों पर हैं बड़ी सशक्त। कहा भी जाता है ‘पावर लाइज़ इन एब्स्ट्रेक्शन’ इन कलाकृतियों यदि प्रदर्शन हो तो इसका समुचित मूल्यांकन हो सकेगा और कला पारखियों की दृष्टि जा सकेगी।

रिपोर्ट: अनीश अंकुर

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