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गणपति की ‘नई दस्तावेज’

Ganpatiशुक्र है कि भा.क.पा. (माओवादी) के सर्वेसर्वा का॰ गणपति अब लेनिन की तस्वीर के साये में प्रकट होने लगे हैं। राजनीतिज्ञ कहेंगे यह अवसरवाद है, चूंकि अपनी डूबती नैया को वे लेनिन का सहारा देना चाहते हैं। निश्चित रूप से काॅ॰ गणपति में कुछ तब्दिली आई है। पहले उनके आलेख में, भाषण में, चित्रों में जहाँ माओ ही माओ दिखते थे, अब कुछ-कुछ लेनिन भी दिख रहे हैं। उनके आलेख “Lessons and challenges of Indian Revolution-2014” में जहाँ तहाँ रूसी क्रांति, बोलरोविकीकरण इत्यादि का जिक्र भी मिलता है (हालांकि वह सिर्फ रट लगाने तक सीमित है)। क्या इससे हम निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि आगे गणपति सकरात्मक सोच की ओर अग्रसर होंगे?

उनकी इस दिशा में अग्रसर होने में सबसे बड़ी बाधा है भारतीय अर्थतंत्र का उनके द्वारा किया गया मूल्यांकन। भारतीय अर्थतंत्र को वे अर्द्धसामंती, अर्द्धऔपनिवेशिक मानते हैं। उनके इसी मूल्यांकन से उनके अन्य भटकाव पैदा होते हैं। उनके आलेख में एक छोटा सा हिस्सा आता है, जहाँ वे कहते हैं “Recently in our country, some persons have once again brought forth views that capitalist relations have replaced. Semi feudal relations in Indian society and PPW line is not suitable for our country.”। इसका अर्थ है कि गणपति की दकियानुसी सोच के विरूद्ध आवाज उनकी पार्टी के अन्दर से भी उठ रही है। उसे अनसुनी करने की भारी कीमत आगे चलकर गणपति एवं समस्त पार्टी को चुकानी पड़ेगी।

गणपति की या यूँ कहिए माओवादी पार्टी की तमाम गलतियों की जड़ इसी गलत मूल्यांकन में निहित है। आज जब भारतीय पूँजीवाद अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर एक ताकत बन चुका है तब यह मानना कि यहाँ उत्पादन के सम्बन्ध में अर्द्धसामंती तथा अर्द्धऔपनिवेसिक है, कहाँ जायज है? गणपति इस सच्चाई को देखने में असमर्थ हैं तथा पार्टी में आए सारे क्षरण के लिए अन्यत्र कारण ढूंढ़ते हैं।

क्या कहते हैं गणपति ? वे कहते हैं- “Our party lost considerable number of comrades belonging to all levels, right from cc to village level in the offensive of the enemy. Though leadership losses began since 2005 may itself, they increased gradually after unity congress and the situation took a serious turn by 2011 end. The leadership failed to a large extent in defending itself and the ranks.”

गणपति की मानें तो एकता कांग्रेस के बाद पार्टी नेतृत्व पर हमले बढ़ गए और 2011 के बाद परिस्थिति गम्भीर हो गई। सम्भवतः गणपति इसके लिए शोषकवर्ग की प्रतिहिंसा को जवाबदेह मानते हैं। लेकिन प्रश्न यह है कि इन नुकसानों के लिए गणपति की रणनीति को जवाबदेह क्यों नहीं मानी जाए ? या भा.क.पा. (माओवादी) की रणनीति को ? वैसे भी माओवाद के जानकार सूत्रों का कहना है कि एकता कांग्रेस के दौरान पार्टी का एकीकरण पूरी तरह नहीं हुआ था। पी.डब्लू.जी और एम.सी.सी. पहले एक दूसरे के खून के प्यासे थे, बाद में अचानक गलबाहियाँ करने लगे। क्या ऐसे कुछ होता है? पार्टी विलय एक लम्बी प्रक्रिया है जिसमें समय की आवश्यकता होती है। हड़बड़ाकर काम करने से बचकाने नतीजे निकल सकते हैं और कुछ नहीं। आश्चर्य है कि कोई क्रांति की अवधारणा के साथ ऐसा खिलवाड़ भी कर सकता है।

गणपति के अनुसार भारतीय क्रांति के तीन जादुई औजार हैं- पार्टी, जनमुक्ति गुरिल्ला फौज और संयुक्त मोर्चा – जो शासक वर्ग के हमले से बूरी तरह क्षतिग्रस्त हुए। इसे गणपति एक गम्भीर नुकसान मानते हैं। लेकिन कहीं इसका जिक्र नहीं करते हैं कि उनकी अपनी दुःहसाहसिकतावादी नीति इसके लिए कहाँ तक जवाबदेह है? क्या जनमुक्ति गुरिल्ला फौज का निर्माण जायज था ? क्या उसके लिए निर्धारित समय आ गया था या गणपति का निष्कर्ष महज यांत्रिक था? क्या गणपति अपने निष्कर्षों को सही ठहराने के लिए अनगिनत युवाओं की जान जोखिम में नहीं डाल रहे थे ?

अतीत में नक्सलपंथियों से जा भूलें हुई उनके प्रति गणपति सचेत दिखते हैं, चाहे वे नक्सलबाड़ी दौर की गलतियाँ हो या तेलंगाना और आंध्र प्रदेश दौर की गलतियाँ। लेकिन गणपति सचते ”दिखते“ भर है, सचेत हैं नहीं। अगर वह सचेत होतें तो इन दौरों की गलतियों को नहीं दोहराते, वह भी इतने बड़े पैमाने पर।

हांलाकि गणपति आत्म-आलोचना से बिल्कुल खाली हैं, ऐसा समझना गलत है। वे कहते हैं “Shortcomings in rallying the middle classes newly developing in the rural areas and the oppressed social sections have negatively impacted the devlopment of guerilla warfare, in the past ten years, the movement in plain areas and urban centres have weakened.” गणपति ने आत्म आलोचना तो की जरूर, लेकिन समतल में, तथा शहरी इलाकों में आए नए बदलाव उनकी नजरों से ओझल ही रह गए। इस घटना को घटित होते हुए गणपति देखते हैं पर इसकी कोई व्याख्या उनके पास नहीं है। तब उनके ”दीर्घकालीन लोकयुद्ध“ के सिद्धांत पर हम कैसे विश्वास करें? अपने विध्वंस की सारी जवाबदेही दुश्मन पर मढ़ने से काम नहीं चलेगी। भा.क.पा.(माओवादी) का दुःसाहसिकतावाद भी इसके लिए जिम्मेवार है। जिस नन्दीग्राम और लालगढ़ का नाम गणपति ले रहे हैं, वहाँ क्रांति के नाम पर कितने निरपराध मारे गए, इसकी कोई लेखाजोखा नहीं है। लालगढ़ नन्दीग्राम में इसी अतिवाद के कारण कोटेश्वर राव की जान गई। जब सुरक्षा बल उन्हें घेर रहा था तब उनके साथ खड़ा होने वाला कोई नहीं था।

सामाजिक गतिशीलता नई वास्तविकताओं को सामने ला रही है, यह सही बात है। उनका अध्ययन करना चाहिए, यह और भी सही बात है, लेकिन कौन करेगा यह अध्ययन? जो आँख रहते अंधे हैं, यह नई वास्तविकता उनके काबू में नहीं आनेवाली। उसकी गहराई में जाना होगा, समझना होगा वह मुझे कौन सा संदेश दे रही है। उस संदेश के अनुसार खुद को ढालना होगा। क्या गणपति से या भा.क.पा. (माओवादी) से यह काम होनेवाला है? वे तो ”गुरिल्लायुद्ध …. गुरिल्लायुद्ध“ रटते रह जायेेंगे।

मुझे नहीं लगता है कि उनसे यह अध्ययन होनेवाला है। बल्कि मुझे यह लगता है कि गणपति और उनकी पार्टी पीछे जा रहे हैं। अन्यथा वे लोहियावादियों की तरह ब्राह्मण फासीवाद की बात नहीं करते। ज्यार्जी दिमित्रोव ने फासिवाद को परिभाषित करते हुए कहा था- ”यह एकाधिकार पूँजी की नग्नतम तानाशाही है।“ भारत में एकाधिकार पूँजी वत्र्तमान है लेकिन संसदीय लोकतंत्र भी अस्तित्व में है। इस संसदीय लोकतंत्र में कम्युनिस्टों की भी हिस्सेदारी है। इसलिए हम निश्चित होकर यह नहीं कह सकते कि भारत में फासीवाद कायम हो गया है। फासीवाद कायम हो गया होता तो इस देश में बड़े-बड़े कामगार आन्दोलन बिना रोक-टोक के नहीं चलते होते। मेरा कहना यह नहीं है कि आर.एस.एस की विचारधारा हिन्दू एकाधिकारवादी नहीं है। लेकिन ब्राह्मण फासीवाद क्या है? गणपति को इसकी व्याख्या करनी चाहिए। इस भाषा में तो लोहियावादी बाते करते हैं। क्या हो गया कि एक माओवादी नेता इस लब्ज में बातें कर रहा है? नई वास्तविकता क्या यही है?

मार्क्सवादी अवधारणाओं को नक्सल धारा के नेताओं ने सबसे अधिक दूषित किया है। गणपति सिर्फ उनमें एक नया संयोजन मात्र हैं। उनसे अधिक कुछ प्रत्याशा नहीं करनी है। उनकी भारी भरकम दस्तावेज मार्क्सवादियों को जातिवादियों के साथ एक पांत में खड़ा करती है।

लेनिन को दृश्यतः अपनाने के बावजूद लेनिन से वर्ग आधारित मूल्यांकन की शिक्षा गणपति ने नहीं ली। वाकई यह अफसोस की बात है।

विश्वजीत सेन बंगला के सुप्रसिद्ध कवि और लेखक हैं

Bishwjeet Sen

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