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गांव और शहर के कुशल चितेरे ब्रज कुमार पांडे

सुप्रसिद्ध लेखक व समाज वैज्ञानिक ब्रज कुमार पांडे ने अस्सी वर्ष पूरे कर लिए। अपनेे विपुल रचना संसार में उन्होंने समाज, राजनीति, इतिहास, संस्कृति, साहित्य सें जुड़े लगभग साठ पुस्तकों की रचना की। इन विषयों पर ब्रज कुमार पांडे अभी भी लगातार सक्रिय हैं।

‘प्रगतिशील लेखक संघ’ के इतिहास पर दस्तावेजी महत्व का उनका काम अपने अंतिम चरणों में है। वैचारिक सक्रियता के अलावा उन्होंने हमेशा खुद को, संगठन व आंदोलन से भी, जोड़कर रखा। मार्क्सवाद उनके व्यक्तित्व व कृतित्व के दिशा निर्देशक सिद्धांत के रूप में काम करता रहा। अपनी विचारधारात्मक निष्ठा से कभी डिगे नहीं ।

गाॅंधी, लोहिया, जिन्ना, राहुल सांस्कृत्यान, इकबाल, नेहरू, डांगे, पी.सी.जोशी जैसी विभूतियों के माध्यम से समाज व राजनीति केा समझने का प्रयास किया। समाजविज्ञान के क्षेत्र में अंग्रेजी के दबदबे के दौर में ब्रज कुमार पांडे ने अधिकांश लेखन हिंदी में किया। बिहार की राजनीति, अर्थव्यवस्था, समाज और सांस्कृतिक गतिविधियों पर जमकर लिखा है। ब्रज कुमार पांडे ने प्रख्यात अर्थशास्त्री गिरीश मिश्र के साथ संयुक्त लेखन का पालन कई क्षेत्रों में किया है। जाति-प्रथा और जातिवाद का अध्ययन और लोहिया के जीवन व व्यक्तित्व के बारे में ब्रजकुमार पांडे का काम देश भर में चर्चित हुआ।

डाॅ ब्रज कुमार पांडे का जन्म 1937 में बक्सर जिले के एक गाॅंव गायघाट में हुआ था। पिता हनुमंत पांडे दर्शन और वेदांत के प्रकांड विद्वान थे। 1955 में, जब वे बी.एन.काॅलेज के छात्र थे , आजाद भारत में छात्रों पर पहली बार पुलिस ने गोली चलायी। पुलिस की गोली से छात्र दीना नाथ पांडे मारे गए। इस घटना ने उन पर गहरा प्रभाव डाला। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू तक को पटना आना पड़ा था। वे स्टुडेंट फेडरेशन की गतिविधियों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेने लगे। ब्रज कुमार पांडे के प्रयासों से बाद में पटना विश्वविद्यालय में छात्र यूनियन की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हुआ।

बाद में कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हुए। उस समय कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता प्राप्त करना आसान न था। कम्युनिस्ट होने को लेकर उनके पंडित पिता को गाॅंव के आस-पास के लोग भड़काया करते थे। बकौल ब्रज कुमार पांडे ‘‘गाॅंव के लोग कम्युनिस्ट पार्टी को धर्म विरोधी, धन-धरती बाॅंटने वाली पार्टी के रूप में जानते थे। इसीलिए कोई अगड़ी जाति का आदमी इलाके में कम्युनिस्ट बने और वह भी पंडित जी का बेटा कम्युनिस्ट बन जाए य किसी को गंवारा नहीं था। ऐसे लोग मेरे पिताजी को भड़काया करते थे।’’

पढ़ाई पूरी करने के बाद बाद में आर.एन. काॅलेज, हाजीपुर में शिक्षक नियुक्त हुए और आजीवन वहीं रहे। काॅलेज में रहते हुए छात्रों में शोधवृत्ति को विकसित करने पर बल दिया। हाजीपुर की प्रसिद्ध शख्सियत सिद्धिनाथ मिश्र के अनुसार ‘‘बिहार विश्वविद्यालय में ब्रज कुमार जी पहले ऐसे व्यक्ति हैं जो विश्वविद्यालय से बाहर यानी मुफस्सिल काॅलेज में रहकर शोध कार्य कराया। मुफस्सिल काॅलेज का कोई शिक्षक शोध कराने की हिम्मत जुटाने की बात तो क्या उस जमाने में शोध कराने की केाई संस्कृति ही विकसित नहीं हुई थी।’’

ब्रज कुमार पांडे

ब्रज कुमार पांडे के साथ जाति प्रथा एवं लोहिया पर संयुक्त रूप से कई पुस्तक लिखने वाले सुप्रसिद्ध अर्थशास्त्री गिरीश मिश्र के अनुसार ‘‘बिहार में रहते हुए भी अन्य शिक्षकों की तरह व्यवसाय, टुएशन जमीन-मकान बटोरने में अपना समय नहीं लगाया है। ज्ञान अर्जन कर उसका दान करने को ही उन्होंने सबसे बड़ा पुण्य माना है।’’

ब्रज कुमार पांडे इस उम्र में भी सांगठनिक स्तर पर सक्रिय हैं। संप्रति वे बिहार प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष तथा ‘एप्सो’ के राष्ट्रीय अध्यक्षमंडली के सदस्य हैं। आजकल लेखकों में संगठन के प्रति अवसरवादी व्यवहार को रेखांकित करते हैं ‘‘ जो लेखक जिस किसी भी संगठन से अपने को प्रतिबद्ध बताते हैं, उनकी बैठकों में शामिल भी होते हैं, उनके निर्णयों में हाथ बंटाते हैं। लेकिन जब उनसे सदस्यता लेने को कहा जाता है तो वे भाग खड़े होते हैं। कुछ ऐसे भी लेखक हैं जो बिहार के बाहर दूसरे राज्य में उसी संगठन के मंच पर बतौर एक्टीविस्ट के रूप में अपने को पेश करते हैं। ऐसे लेखक इन संगठनों से संबद्ध वरीय लेखकों से अपनी रचनाओं का रिकग्निशन तो चाहते हैं लेकिन इन संगठनों के क्रियाकलापों में भाग लेने से बचना चाहते हैं।’’

कस्बाई शहर हाजीपुर में रहकर उन्होंने अपनी मेधा, प्रतिबद्धता तथा परिश्रम के बल अर्जित दृष्टि के बल पर पूरे हिंदी क्षेत्र प्रगतिशील, आधुनिक और लोकतांत्रिक बनाने में जो योगदान दिया है वो अतुलनीय है। उनके अनन्य युवा सहयोगी व लेखक दीपक कुमार राय कहते हैं ‘‘ वे परिवर्तनकारी चेतना के विमर्शकार हैं तो वैज्ञानिक समाजवाद के अभ्यासकर्ता भी।’’

आलेख: अनीश अंकुर

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