+91 943 029 3163 info@biharkhojkhabar.com

चंपारण सत्याग्रह के सौ वर्ष: अरुण भोले

चंपारण सत्याग्रह के सौ साल पूरे हो चुके हैं। आज जब उसकी चर्चा चली है तो बड़े-बुज़ुर्गों से जानी-सुनी अनेक पुरानी बातें याद आ जाती हैं। हम लोग चंपारण ज़िले के पुश्तैनी बाशिंदा हैं और मेरे परबाबा, बाबू गोपालजी सहाय, उन दिनो मोतिहारी में ‘प्लैंटर्सएसोसीएशन’ के मुक़ामी मुख़्तार थे। सत्याग्रह के दौरान नीलहा साहबों से नाता तोड़ वे गांधीजी की सहायक-मंडली के साथ हो लिए।

बिहारका चंपारण ज़िला भौगोलिक दृष्टि से हिमालय की तराईका विस्तार है। उस ज़िला में गोरे नीलहा साहबों के सैकड़ों कोठियाँ थीं। वे लोग छोटे किसानों को पट्टे पर ज़मीन देते और प्रति बीघा तीन कट्ठे में ज़बरन नील की खेती करवाते। खेती का सारा ख़र्च बेचारे जोतदारों के मत्थे चढ़ता। उस प्रथा को ‘तीनकठिया’ कहा जाता था।

तीन कठिया का फंदा बड़ा दुखदायी था। रैयतों को न केवल ज़मीन की मालगुज़ारी बल्कि अनाज के अलावा आम-कटहल जैसे फलों की फ़सल पर भी कर देना पड़ता। साहब को हाथी-घोड़ा ख़रीदना हो या मोटरगाड़ी, छुट्टी बिताने पहाड़ों पर जाना हो या समुद्र किनारे; सबके लिए रैयतों का अंशदान ज़रूरी था। खेतों में मज़दूरों को या तो मुफ़्त खटवाया जाता अथवा बनिहारी के नाम पर मात्र दस पैसे थमा दिए जाते। औरतों को छः पैसे और बच्चों को सिर्फ़ तीन पैसे। चूँ-चपड़ की कोई गुंजाइश नहीं।

गोरों का दबदबा इतना था कि इलाक़े के दबंग राजपूत-भूमिहार जागीरदारों तक की मजाल न थी कि नीलहों के खिलाफ जुबान खोलें। रैयतों की झोपड़ी जला देना, माल-मवेशी हाँक ले जाना, औरत-मर्दों की धुनाई-पिटाई, बेदख़ली आदि अत्याचार आए दिन होते ही रहते। नीलहा साहब लोग ज़िले केकलेक्टर, एसपी को इसलिए तनिक भी भाव न देते क्योंकि उनका सीधा सरोकार सूबे के लाटसाहब (गवर्नर) से हुआ करता था। पुराने लोग बताते कि लाट साहब जब अपने दल-बल के साथ भैंसलोटन के जंगलों में शिकार खेलने आते थे तो उनके प्रवास-आखेट, आमोद-प्रमोद आदि का सारा आयोजन नीलहा साहबों के ओर से ही हुआ करता था।

न जाने राजकुमार शुक्ल को कैसे सूझी कि किसानों की दुर्दशा मिटाने गांधी जी को वे चंपारण ले आए। उन दिनों भारत में गांधी को कम ही लोग जानते थे। उनकी अपेक्षा पंडित मदन मोहन मालवीय और श्रीमती एनी बेसेंट ज़्यादा मशहूर थीं। मालवीय जी साल 1909 में कांग्रेस-अध्यक्ष रह चुके थे तथा सत्याग्रह के समय (वर्ष 1917) एनी बेसेंट भी कांग्रेस-अध्यक्षा चुनी गयी थीं।

स्वयं राजकुमार शुक्ल चंपारण के एक मामूली किसान थे। थे तो वे जाति के ब्राह्मण, किंतु बहुत कम पढ़े-लिखे। एक सीधा-सदा व्यक्ति जिसके परिचय या प्रभाव का दायरा बहुत छोटा था।हाँ, वे लगनशील और परोपकारी अवश्य थे। उनके साथ गांधीजी निकल तो पड़े लेकिन पटना पहुँचते ही उन्हें लगा कि काम जितना कठिन है उनमें शुकुल महाराज कारगर नहीं होंगे।

उन्होंने कमान ख़ुद सम्भालना तय किया। लंदन में पढ़ाई के दिनों में मज़हरूल हक़ साहब उनके सहपाठी थे। अब वे पटना में बैरिस्टरी करते थे। ख़बर मिली तो गांधी जी को वे अपने घर ले आए। उनकी बात सुनी और इस दिशा में बड़ी सावधानी बरतने की सलाह दी। बताया कि नीलहा साहबों के अलावा सरकार से भी टक्कर लेनी पड़ेगी। जेल जाने तक की नौबत आन पड़े। हक़ साहब ने गांधी जी के मुज़फ़्फ़रपुर जाने का इंतज़ाम कर दिया। वह शहर तिरहुत कमिश्नरी का मुख्यालय है जिसके अंतर्गत उत्तर बिहार के चार ज़िले थे – सारण, चंपारण, दरभंगा और मुज़फ़्फ़रपुर।

मुजफ्फरपुर के जीबी कॉलेज में आचार्य कृपलानी प्रोफ़ेसर थे। गांधी जी का उन से परिचय था. गांधी जी उनके साथ ठहरे और उन्ही कि पहल पर कुछ स्थानीय वकीलों से विचार विमर्श किया. सबको लगा कि मामला कानूनी बन जायेगा और लम्बा खिचेगा।  चुंकि चंपारण का मुख्यालय मोतिहारी है, इसलिए केंद्र वहीँ बनाना पड़ेगा।

गांधी जी पहली बार बिहार आये थे। यहाँ के परिवेश से वे परिचित न थे। मोतिहारी पहुंचे तो पहला विकट प्रश्न था कि ठहरे कहाँ? इलाके में दूर-दूर तक कांग्रेस का नामो-निशान न था। तब तक वे कांग्रेस से पूरी तरह जुड़े भी तो न थे।

उस छोटे से शहर में होटल नाम की कोई चीज थी ही नहीं।  जिस अभियान में वे निकले थे वह नीलहा साहबों और सरकार को ललकारने जैसा था। अंजाम भी सब जानते थे।  फिर भी स्थानीय वकील गोरख प्रसाद ने किसी बात की परवाह किये बगैर गांधी जी को अपने घर ठहराया।  शहर के एक नामी साहूकार रामदयाल साह भी बेख़ौफ़ सामने आ गए। उन्होंने अंतत हर विधि गांधीजी की मदद की।  बात बढती गयी और चारों तरफ से लोग एक-एक कर जुटते चले गए – राजेंद्रबाबू, ब्रजकिशोर बाबू (जेपी के ससुर), धरणीधर बाबू, रामनवमी बाबू, बिंदा बाबू, जनकधारी बाबू, शंभू बाबू आदि।

ये तमाम नाम वही हैं जिनका जिक्र गांधी जी की आत्मकथा, राजेंद्र बाबू की पुस्तक ‘चंपारण सत्याग्रह, आचार्य कृपलानी और डॉ. अनुग्रह नारायण सिंह के संस्मरणों में प्रसंगानुसार अनेक बार होते गए हैं।  सर्वाधिक ध्यानाकर्षक बात यह है कि साहू जी को छोड़ बाक़ी सभी लोग पेशे से वकील और जाति के कायस्थ थे।

मोतिहारी में जब धरणीधर बाबू ने गांधी जी से कहा था कि उनके जेल जाने की  स्थिति में रामनवमी बाबू के साथ मिलकर वे सारा काम संभालेंगे और जेल भी जाना पड़ा तो वे दोनों तैयार हैं; तो सुनकर गांधी जी का चेहरा चमक उठा था और आह्लादित स्वर में वे बोल पड़े ‘बस, अब काम बन गया’! बात यह थी कि उन दिनों जेल का नाम सुनते ही बड़े-बड़ों के होश फाख्ता हो जाते।

बरसों बाद (6 मार्च 1925) जनकधारी बाबू को भेजे अपने पत्र में गांधी जी ने लिखा था –’चंपारण के अपने सहयोगियों की स्मृति मेरी अमूल्य निधि है।उन जैसे निष्ठावान सहकर्मियों की मंडली न मुझे पहले कभी मिली थी और शायद फिर मिले भी नहीं।यदि मिल गयी तो भारत को आज़ादी मिलते देर न लगेगी।

स्वतंत्रता-संग्राम में कायस्थों की भूमिका की एक हलकी झलक पाठकों को इतने से ही मिल गयी होगी।

मोतिहारी रवाना होने से पहले गांधी जी तीन दिनों तक मुजफ्फरपुर रुके थे। वहां नीलहा साहबों का संगठन ‘प्लांटर्स एसोसिएशन’ के सेक्रेटरी ने बड़ी नाराजगी में उनसे पूछा था कि कोठी की जायदाद-काश्तकारी वगैरह के मामले में उन जैसा कोई बाहरी शख्स क्यूं दखल देगा? तिरहुत के कमिश्नर साहब ने भी उन्हें तुरत वापस चले जाने की हिदायत कर दी।

लेकिन पांव पीछे खींचना गाँधी की फितरत में न था। वे 15 अप्रैल 1917 के दिन मोतिहारी जा धमके।  अगली सुबह पड़ताल के सिलसिले में केसरिया थाने के जसौली पट्टी (हमारा पैतृक गाँव सुबइयां उसी जवार में बसा है) जाते समय दरोगा ने उन तक जिले के एसपी का सलाम पहुंचा दिया जिसका प्रशासनिक अर्थ था कि साहब ने उन्हें फ़ौरन तलब किया है।

धरणीधर बाबू और रामनवमी बाबू को गंतव्य की ओर भेज गांधी जी आधे रास्ते से ही मोतिहारी लौट आये।  वहां पर वह नोटिस तमिल हुई जिसके मुताबिक सारी जांच-पड़ताल बंद कर उन्हें फ़ौरन चंपारण छोड़ देने का हुक्म था। नोटिस की पावती रसीद पर गांधी जी ने दर्ज कर दिया कि जांच जब तक पूरी नहीं हो जाती।

चंपारण छोड़ने का उनका बिलकुल इरादा नहीं। लिहाज़ा, उन पर मुकदमा चला। 18 अप्रैल 1917 को कोर्ट में उनकी पेशी हुई। मजिस्ट्रेट ने उनसे पूछा ‘क्या आपका कोई वकील है?’ गांधी जी ने कहा, नहीं, अपना पक्ष मैं ख़ुद रखूँगा और यह कहते हुए इजलास के सामने अंग्रेजी में लिखा अपना बयान पढना शुरू किया जिसके कुछ अंश प्रस्तुतहैं, ‘मैंने सरकारी आदेश का उल्लंघन इसलिए नहीं किया कि मेरे मन में सरकार के प्रति अनादर के भाव हैं; बल्कि इसलिए कि अंतरात्मा की उच्चतर आज्ञा का पालन मैंने अधिक उचित समझा है। मेरे विचार में यह विषय स्थानीय स्थिति के प्रति प्रशासनिक अधिकारियों तथा मेरे बीच मतभेद का है।

मैं यहाँ उन रैयतों के आग्रह पर आया हूँ जिनकी शिकायत है कि नीलहा साहब लोग उनके साथ न्यायोचित व्यवहार नहीं करते। मैं उन लोगों की कोई सहायता कैसे कर सकता था जबतक वस्तुस्थिति की सच्चाई स्वयं देख-समझ न लूं? अपना काम यथासंभव मैं प्रशासनिक अधिकारियों तथा कोठी मालिकों के सहयोग से ही करना चाहता हूँ।  मैं स्वेच्छापूर्वक यह इलाका तबतक नहीं छोड़ सकता जब तक काम पूरा न हो जाए।  अतःअपने निष्कासन का भार अपनी ओर से मैं भी प्रशासन को ही सौंपता हूँ।  मैंने कानून की अवज्ञा अवश्यकी है, परन्तु बिना किसी विरोध के उसका दंड भुगतने को भी तैयार हूँ।

किसी मुक़दमे में ऐसा सच्चा, निडर और कृत संकल्प बयान शायद ही कभी सुना गया हो।  कोर्ट में सन्नाटा पसर गया। मैजिस्ट्रेट चकरा गए।  वे समझ नहीं पा रहे थे कि ऐसे केस में क्या फ़ैसला दिया जाए जिसमें अभियुक्त ख़ुद ही आरोप स्वीकार कर रहा हो और अपराध का दंड तो माँग रहा हो किंतु अपने उद्देश्य और अभियान के प्रति अब भी अडिग खड़ा हो।तब तो यही देखना बाक़ी है कि उस पर मढ़े गए दोष तथा उसके व्यवहार क्या क़ानून की दृष्टि में दंडनीय अपराध हैं? ऊहापोह की स्थिति में फ़ैसले की तारीख़ बढ़ा दी गयी।

इस बीच गांधी जी ने वाइसरॉय, सूबे के गवर्नर, मालवीय जी, दीनबंधू ऐंड्रूज़, मिस्टर पोलक तथा मज़हरूल हक़ सरीखे पटना के कुछेक गणमान्य लोगों को तार द्वारा आवश्यक जानकारी दे दी। अपनी ओर से सत्याग्रह को वे कोई राजनैतिक स्वरूप देना नहीं चाहते थे।फिर भी ‘स्टेट्समैन’ जैसे अंग्रेज़ी के कुछ मशहूर अख़बारों के कारण मामला तूल पकड़ने लगा था। ब्रिटिश सरकार इस बात से चिंतित थी कि एकतरफ़ प्रथम विश्वयुद्ध का घमासान छिड़ा था तो दूसरी ओर रूस में लेनिन की बोलशेविक क्रांति निर्णायक मुक़ाम पर जा पहुँची थी। ऐसे नाज़ुक दौर में किसी सरकार के लिए बलप्रयोग की अपेक्षा बुद्धिमत्ता की अधिक आवश्यकता थी।सो स्थानीय प्रशासन को गवर्नर का आदेश मिला की गांधी के ख़िलाफ़ मुकदमा तुरत उठा लिया जाए तथा उन्हें जाँच-पड़ताल की पूरी छूट देते हुए उनके कार्य में आवश्यक प्रशासनिक सहयोग भी दिए जाएँ।

नतीजतन, पड़ताल में तेज़ी आ गयी। सत्याग्रही खुलकर गाँव-गाँव जाने लगे। मोतिहारी के बंजरिया पंडाल स्थित सत्याग्रह कार्यालय में बयान दर्ज करवाने वाले रैयतों का हुजूम उमड़ने लगा। गांधी जी की दिक़्क़त यह थी कि वे चंपारण की भोजपुरी बोली नहीं समझ पाते थे, नाही कैथी और फ़ारसी लिपि में लिखे हुए दस्तावेज़ पढ़ पाना उनके लिए मुमकिन था। इसलिए वक़ील-मंडली के कुछ सहकर्मियों को उन्होंने अपना दुभाषिया बनाया और बाक़ी को बयान दर्ज करने में जुटा दिया। पाँच हज़ार से अधिक रैयतों के बयान दर्ज हुए थे। इस काम में पारदर्शिताऔरप्रामाणिकता के प्रति गांधी जी इतने सावधान रहे कि उनके आदेशानुसार प्रायःसभी बयान सीआइडी अथवा अन्य कोई सरकारी अधिकारी तथा नीलहा कोठी के कर्मचारियों की उपस्थिति में ही सुने जाते थे और काग़ज़ पर तबतक दर्ज न होते जबतक जिरह-मुबाहिसे के दौरान यह न लगे कि कथन प्रथम दृष्टयामिथ्या अथवा अतिरंजित ही है।

अपने प्रारम्भिक चरण में सत्याग्रह कोई राजनैतिक तूल न पकड़ ले, इसलिए गांधी जी ने कई अख़बार के सम्पादकों को लिखा था कि इस क्षेत्र में वे अपना कोई संवाददाता न भेजें। प्रकाशन योग्य सभी आवश्यक सूचनाएँ सत्याग्रह कार्यालय द्वारा ही उन्हें प्रेषित कर दी जाएँगी। कुछ ही महीने बाद प्रांतीय सरकार ने अपनी ओर से भी एक जाँच समिति गठित कर दी जिसमें गांधी जी भी मनोनीत किए गए थे।उस समिति की अनुशंसा पर लगभग सौ साल पुरानी तिनकठिया प्रथाक़ानूनी तौर पर सदा के लिए समाप्त कर दी गयी। हताश नीलहा साहबों में अनेक ने अपने बोरिया-बिस्तर बांधे और वतन लौट गए।

तो ऐसा विलक्षण था गांधी का चंपारण सत्याग्रह जिसमें न हड़ताल हुई, न विराट जन प्रदर्शन हुए। न कभी जुलूस निकला, न कहीं हिंसक झड़पें हुईं। लाठी-गोली चलने का कोई अवसर आया ही नहीं। फिर भी सत्याग्रह इतना सफल रहा कि उन की ऊर्जा से निरीह जनों के मन में भी अन्याय-अत्याचार के विरूद्ध डट खड़े होने की शक्ति आ गयी। भारतीय राजनीति में सत्य-अहिंसा के साथ गांधी का वह पहला सार्वजनिक प्रयोग था। भाँपने वाले उसी घड़ी भाँप गए कि भारत में ब्रिटिशराज अधिक दिनों टिकने वाला नहीं।

अरुण भोले
(स्वराज और समाजवादी आंदोलन से जुड़े बिहार के जाने-माने जनसेवी और लेखक)

Bihar Khoj Khabar
About the Author
Bihar Khoj Khabar is a premier News Portal Website. It contains news of National, International, State Label and lots More..

Related Posts

Leave a Reply

*