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चीफ की दावत

आज मिस्टर शामनाथ के घर चीफ की दावत थी। शामनाथ और उनकी धर्मपत्नी को पसीना पोछने की फुर्सत न थी।

पत्नी ड्रेसिंग गाउन पहने, उलझे हुए बालों जूड़ा बनाए, मुंह पर फैली हुई सुर्खी और पाउडर को मले और मिस्टर शामनाथ सिगरेट-पर-सिगरेट फूंकते हुए, चीजों की फेहरित्त हाथ थामें एक कमरे से दूसरे कमरे में आ जा रहे थे।

आखिर पांच बजते तैयारी मुकम्मल होने लगी। कुर्सियां, मेज तिपाइया, नैपकिन, फूल सब बरामदे में पहूंच गए। ड्रिंक का इंतजाम बैठक में कर दिया गया। अब घर का फालतू सामान अलमारियों के पीछे और पलंगो के पीछे छुपाया जाने लगा। तभी शामनाथ के सामने सहसा एक अड़चन खड़ी हो गई- मां का क्या होगा?

इस बात की ओर न उनका और न उनकी कुशल गृहिणी का ध्यान गया था। मि0 शामनाथ, श्रीमती की ओर धुमकर अंग्रेजी में बोले – मां का क्या होगा ?

श्रीमती काम करते-करते ठहर गई, और थोड़ी देर तक सोचने के बाद बोली – ‘‘इन्हें पिछवाड़े इनकी सहेली के घर भेज दो। रातभर बेशक वहीं रहे कल आ जाये।

शामनाथ सिगरेट मुंह में रखे, सिकुड़ी आखों से श्रीमती के चेहरे की ओर देखते हुए पलभर सोचते रहे, फिर सिर हिलाकर बोले-नहीं, मैं नहीं चाहता कि उस बुढ़िया का आना-जाना यहां फिर से शुरू हो। पहले ही बड़ी मुश्किल से बंद किया था। मां से कहें कि जल्दी ही खाकर शाम को ही अपने कोठरी में चली जाएं। मेहमान कहीं आठ बजे आएंगे। इससे पहले ही अपने काम से निपट लें।

सुझाव ठीक था। दोनों को पसंद आया। मगर फिर सहसा श्रमती बो उठी ‘‘जो वह सो गई और नींद में खर्राटे लेने लगी तो ? साथ ही तो बरामदा है, जहां लोग खाना खाएंगे‘‘।

‘‘तो  कह देंगे कि अंदर से दरवाजा बंद कर लें। मैं बाहर से ताला लगा दूंगा, या मां को कह देता हूं कि अंदर जाकर सोए  नहीं बैठी रहें, और क्या ?‘‘

और जो सो गई तो ? डिनर का क्या मालूम कब तक चले। ग्यारह-बारह बजे तक तो तुम लोग ड्रिंक ही करते रहते हो।

शामनाथ कुछ खीज उठे, हाथ झटकते हुए बोले – अच्छी भली यह भाई के पास जा रही थी। तुमने यूं ही अच्छा बनने के लिए बीच में ही टांग अड़ा दी।

– वाह तुम मां और बेटे की बातों में मैं क्यों बुरी बनु? तुम जानों और वह जानों।

मिस्टर शामनाथ चुप रहें। मौका बहस का नहीं था। समस्या का हल ढूंढने का था। उन्होंने घूम कर मां की कोठरी कही ओर देखा। कोठरी का दरवाजा बरामदे की ओर खुलता था। बरामदे की ओर देखते हुए झट से बोलें ‘‘ मैने सोंच लिया है ”-  उन्हीं कदमो से मां की कोठरी के बाहर जा खड़े हुए। मां दिवार के साथ एक चोकी पर बैठी हुई थी, दुपट्टे में मुंह लपेटे माला जप रही थी।

सुबह तैयारी होते देखते मां का दिल घड़क रहा था। बेटे के दफ्तर का बड़ा साहब घर आ रहा है। सारा काम सुभीते से चल जाए।

– ‘‘मां आज तुम जल्दी से खा लेना। मेहमान लोग साढे सात बजे आ जाएंगे।‘‘

मां ने धीरे से मुंह का दुपट्टा हटाया और बेटे को देखते हुए कहा – ‘‘आज मुझे खाना नहीं खाना है, बेटा तुम जानते हो मांस, मछली बने तो मैं कुछ नहीं खाती।‘‘

– जैसा भी हो, अपने काम से जल्दी निपट देना।

– ‘‘अच्छा बेटा।‘‘

– ‘‘और मां हम लोग पहले बैठक में बैठेंगे।‘‘ उतनी देर तुम यहां बरामदे में बैठना फिर जब हम लोग यहां आ जाए तो तुम गुसलखाने के रास्ते बैठक में चली जाना।

मां आवाक बेटे का चेहरा देखने लगी। फिर धीरे से बोली – ‘‘अच्छा बेटा।‘‘

– और मां आज जल्दी सो नहीं जाना। तुम्हारे खर्राटों की आवाज दूर तक जाती है।

मां लज्जित सी आवाज में बोली – ‘‘क्या करूं बेटा मेरे बस की बात नहीं है। जब से बीमारी से उठी हूं, नाक से सांस नहीं ले सकती।‘‘

मिस्टर शामनाथ ने तो इंतजाम तो कर दिया, फिर भी उनकी उधेड़बुन खत्म नहीं हुई जो चीफ इधर आ निकला, तो ? आठ-दस मेहमान होंगे देसी अफसर और उनकी स्‍ित्रयां भी होंगीं कोई भी गुसलखाने की तरफ आ सकता है। झोम और क्रोध में वो सर झुंझलाने लगे। एक कुर्सी उठाकर बरामदे बाहर रखते हुए बोली – आओ मां  इस पर जरा बैठों तो।

मां माला सम्भाली, पल्ला ठीक करती हुई उठी, और धीरे से कुर्सी पर आकर बैठ गई।

– ‘‘यूं नहीं मां, टांगे उपर चढाकर नहीं बैठते। यह खाट नहीं है।‘‘

मां ने टांगे नीचे उतार ली।

– और खुदा के वास्ते नंगे पांव नहीं धुमना, न ही व खड़ाउ पहनकर सामने आना। किसी दिन वह तुम्हारी वह खड़ाउ उठाकर मैं बाहर फेंक दुंगा।

मां चुप रही।

– कपड़े कौन से पहनोगी मां?

– ‘‘जो है वहीं पहनुंगी, जो कहो पहन लूं।‘‘

मिस्टर शोमनाथ सिगरेट मुंह में रखे, फिर अधखुली आंखों से मां की और देखने लगे, और मां की कपड़ो की सोंचने लगे। मिस्टर शोमनाथ हर बात में तरतीब चाहते थे। घर का सब संचालन उनके हाथ में था। खूंटीया कमरों में कहां लगाई जाए, बिस्तर कहा बिछें, परदें किस रंग के लगाए जाए, श्रीमती कौन सी साड़ी पहनें, मेज किस साईज की हो। शामनाथ को चिंता थी की अगर चीफ का साक्षात् मां से हो गया तो कहीं लज्जित न होना पड़े। मां को सिर से पांव तक देखते हुए बोलें- ‘‘तुम सफेद कमीज और सफेद सलवार पहन लो, पहन के पास आओ जरा देखू।‘‘

मां धीरे से उठी और अपने कोठरी में कपड़े पहनने चली गयी।

– यह मां का झमेला तो रहेगा-उन्होने फिर अंगे्रजी में अपनी स्त्री से कहा कोई ढंग की बात हो तो भी कोई कहे। अगर कहीं उल्टी सिधी बात हो गयी, चीफ को बुरा लगा तो सारा मजा जाता रहेगा।

मां सफेद कमीज और सफेद सलवार पहन कर वापस निकली। छोटा सा कद सफेद कपड़ो में लिपटा, छोटा सा सुखा हुआ शरीर, घुंधली आंखे, केवल सिर से आधे झड़े हुए बाल पल्ले की ओट में छिप गये थे। पहले से कुछ ही कम कुरूप नजर आ रही थी।

– ‘‘चलों ठीक है। कोई चूड़िया-वूड़िया हो, तो वह भी पहन लो, कोई हर्ज नहीं है।‘‘

– ‘‘चूड़ियां कहां से लाउं बेटा, तुम तो जानते हो सब जेवर तुम्हारी पढ़ाई में बिक गये।‘‘

यह वाक्य शोमनाथ को तीर सा लगा। तिनककर बोले-यह कौन सा राग छेड़ दिया मां सिधा कह दो नहीं है जेवर बस। इससे पढ़ाई-वढ़ाई का क्या ताल्लुक है? जो जेवर बिका, तो कुछ बनकर ही आया हूं। निरा लंडूरा तो नहीं लौट आया। जितना दिया था उससे दूगना ले लेना।

– ‘‘मेरी जीभ जल जाए मैं तुमसे जेवर लूंगी। मेरे मुंह से यूं ही निकल गया, जो होते तो लाख बार पहनती।‘‘

साढ़े पांच बज चूके थे। अभी मिस्टर शोमनाथ को खुद ही नहा धोकर तैयार होना था। श्रीमती कब की अपने कमरे में जा चूकी थी। मिस्टर शोमनाथ जाते हुए मां को एक बार फिर से हिदायत देते गये-मां रोज की तरह गुमसुम बनकर नहीं बैठी रहना । अगर साहब इधर आ निकले और कोई बात पूछें, तो ठिक तरह से बात का जवाब देना।

– ‘‘मैं न पढ़ी न लिखी बेटा, मै क्या बात करूंगी। तुम कह देना मां अनपढ़ है, कुछ जानती समझती नहीं है। वह नहीं पूछेगा।‘‘

सात बजते बजते मां का दिल धक-धक करने लगा। अगर चीफ सामने आ गया और उसने कुछ पूछा, तो वह क्या जवाब देगी? अंग्रेज को तो दूर से ही देखकर वह घबरा उठती है। यह तो अमेरीकी है। न मालूम क्या पूछे। मैं क्या कहूंगी। मां का जी चाहा की चुपचाप पिछवाड़े विधवा सहेली के घर चली जाएं। मगर बैटे के हुकम को कैसे टाल सकती थी। चुपचात कुर्सी पर टां लगकाए वहीं बैठी रही।

एक कामयाब पार्टी वह है, जिसमें डिंक कामयाबी से चल जाए। शामनाथ की पार्टी सफलता के शिखर चूमने लगी। वार्तालाप उसी रौ में बह रहा था, जिस रौ में गिलास भरे जा रहे थें। कहीं कोई रूकावट थी, न अड़चन थी। साफा कवर का डिजाईन पसंद आया था। कमरे की सजावट पसंद आयी थी। इससे बढ़कर क्या चाहीए। साहब तो ड्रिंक के दूसरे दौर में ही चुटकुले और कहानियां कहने लग गये थे। दफ्तर में जितना रौब रखते थे, यहां पर उतने ही दोस्त परवर हो रहे थे। और उनकी स्त्री काला गाउन पहने, गले में सफेद मोतियां का हार, सेंट और पाउडर की महक से ओत-प्रोत, कमरे में बैठी सभी स्त्रीयों की अराधना का केन्द्र थी। बात-बात पर हॅसती, बात-बात पर सिर हिलाती, और शामनाथ की स्त्री की सी तो ऐसे बातें कर रहीं थी जैसे  उनकी पुरानी सहेली थी।

और इसी रौ में प‍ीते-पिलाते साढ़े दस बज गये। वक्त गुजरते पता हीं नहीं चला।

आखिर सब लोग अपने-अपने गिलासों में आखिरी धूंट पीकर खाना खाने के लिए उठे और बैठक के बाहर निकले। आगे-आगे शामनाथ रास्ता दिखाते हुए पीछे चीफ और दूसरे मेहमान।

बरामदे में पहुचते ही शामनाथ सहसा ठिठक गये। जो दृश्य उन्होंने देखा, उनकी टांगें लड़खड़ा गई, और क्षण भर में सारा नशा हिरन होने लगा। बरामदे में ऐन कोठरी के बाहर मां अपनी कुर्सी पर ज्यों की त्यों बैठी थी, मगर पांव कुर्सी के सीट पर सटे हुए और सिर दाएं से बाएं, और बाएं से दाएं झुल रहा था। मुंह से लगातार खर्राटे की आवाजें आ रही थी। जब सिर कुछ देर के लिए टेढ़ा होकर थम जाता, तो खर्राटे और भी गहरे जो जाते। और फिर झटके से नींद टूटती, तो सिर फिर दाएं से बाएं झूलने लगता पल्ला सिर पर से खिसक आया था, और मां के झड़े हुए बाल, आधे गंजे सिर पर अस्त व्यस्त बिखर रहे थे।

देखते ही शामनाथ कु्रद्ध हो उठे। जी चाहा कि मां को धक्का देकर उठा दें, और मां को कोठरी में ढकेल दें। मगर ऐसा करना संभव नहीं था। चीफ और बाकी मेहमान पास खडे़ थे।

मां को देखते ही देशी अफसरों की कुछ स्त्रीयां हॅस दीं कि इतने में चीफ ने धीरे से कहा-‘‘पूअर डियर।‘‘

मां हड़बड़ाके उठ बैठी। सामने खड़े इतने लोगो को देखकर ऐसी घबराई कि कुछ कहते न बना। झट से पल्ला सिर पर रखते हुई खड़ी हो गई और जमीन को देखने लगी। उनके पांव लड़खड़ाने लगी। और हाथों की अंगुलियां थर-थर कांपने लगी।

– ‘‘मां तुम जाकर सो जाओं, तुम इतनी देर तक जाग रही थी?‘‘ – और खिसयाई हुई आवाज से शामनाथ चीफ की मुंह की ओर देखने लगे।

चीफ के चेहरे पर मुसकुराहट थी। वह वहीं खड़े-खड़े बोले – ‘‘नमस्ते !‘‘

मां ने झिझकते हुए अपने में सिमटते हुए दोनों हाथ जोड़े मगर एक हाथ दुपट्टे के अन्दर माला को पकड़े हुए था। दूसरा बाहर। ठीक तरह से नमस्ते भी नहीं कर पाई । शामनाथ इस पर भी खिन्न हो उठे। इतने में चीफ ने अपना दाया हाथ मिलाने के लिए आगे बढ़ाया । मां और भी घबरा उठी।

– ‘‘मां, हाथ मिलाओं।‘‘

पर हाथ कैसे मिलाती, दाएं हाथ में तो माला थी। घबराहट में मां ने बायां हाथ ही साहब के दाएं हाथ में रख दिया। शामनाथ दिल ही दिल में जल उठे। देशी स्‍ित्रयां खिलखिलाकर हॅस पड़ी।

– यूं नहीं मां तुम तो जानती हो कि दायां हाथ मिलाया जाता है। दायां हाथ मिलाओं।

मगर चीफ तब तक मां का बायां हाथ हिलाकर कह रहे थे – ‘‘हाउ डू यूडू ?‘‘

‘‘कहो मां मैं ठीक हूं, खैरियत से हूं।‘‘

मां कुछ बड़बराई ।

‘‘मां कहती हैं, मैं ठीक हूं। कहो मां, हाउ डू यू डू।‘‘ मां धीरे से सकुचाते हुए बोली-हाउ डू डू ……

एक बार फिर कहकहा उठा।

वातावरण हल्का होने लगा। साहब ने स्थिति सॅभाल ली थी। लोग हॅसने चहकने लगे थे। शामनाथ के मन का क्षोम भी कुछ कम होने लगा था।

साहब अपने हाथ में मां का हाथ अब भी पकड़े हुए थें, और मां सिकुड़ी जा रही थी। साहब के मुंह से शराब की बू आ रही थी। शामनाथ अंगे्रजी में बोले – मेरी मां गांव की रहने वाली है। उमर भर गांव में ही रही है। इसिलिए आपसे लजाती है।

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