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छविनाथ पांडेय न होते तो साहित्य सम्मेलन को न भूमि होती न भवन होता

पटना, 14अप्रैल। 19 अक्टूबर 1919 को मुज़फ़्फ़रपुर नगर में बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन की स्थापना हुई थी। तबसे अगले १७ वर्षों तक यह संस्था उदारमना प्रबुद्धजनों के सहयोग से निःशुल्क अथवा किराए पर प्राप्त कमरों में चलती रही। सम्मेलन के पूर्णिया अधिवेशन में, तब के सुप्रतिष्ठ पत्रकार और साहित्यसेवी पं छविनाथ पाण्डेय को सम्मेलन का प्रधानमंत्री बनाया गया।

श्री पांडेय के आग्रह पर उसी वर्ष से सम्मेलन का कार्यालय पटना में स्थानांतरित किया गया। पांडेय जी ने अपने प्रभाव और श्रम से क़दमकुआं में राज्य सरकार से भूमि प्राप्त की।

तब बिहार केसरी बाबू श्रीकृष्ण सिंह के नेतृत्व में प्रदेश में अंतरिम सरकार गठित हो चुकी थी और श्री बाबू समेत उनके मंत्रिपरिषद के अनेक सदस्य साहित्य सम्मेलन से सक्रिए रूप से जुड़े हुए थे। सबका सहयोग मिला और भूमि मिल गई। फिर राज्य सरकार और साहित्यसेवियों तथा उदार सज्जनों के सहयोग से भवन भी बना। निर्माण में बनैली के राजा कृत्यानंद सिंह का दस हज़ार रूपाए का सहयोग विशेष उल्लेखनीय है। कहना यह चाहिए कि पं छविनाथ पाण्डेय न होते तो सम्मेलन को न भूमि होती न भवन मिलता।

यह बातें आज सम्मेलन सभागार में आयोजित जयंती समारोह व कवि-गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए, सम्मेलन अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने कही। डा सुलभ ने कहा कि, सम्मेलन को अमर बनाने में जिन साहित्यकारों ने अपना सब कुछ न्योछावर किया, उनमें छविनाथ जी अग्रगण्य थे। वे मुद्रण-कला के भी विशेषज्ञ थे और इस विषय पर अनेक पुस्तकें भी लिखी थी। हिंदी और अंग्रेज़ी के महान विद्वान पांडेय जी पत्रकारिता के भी आदर्श-पुरुष थे।साधु-पुरुष सा उनका पारदर्शी और सादा सारस्वत जीवन अनुकरणीय है।

समारोह का उद्घाटन करते हुए, न्यायमूर्ति राजेंद्र प्रसाद ने कहा कि, मातृभाषा में हीं हम अपने आप को पहचान सकते हैं, क्योंकि अपनी भाषा में ही हमारी आत्मा शुद्ध-प्रबुद्ध रूप में प्रकट होती है।

इसके पूर्व अतिथियों का स्वागत करते हुए, सम्मेलन के साहित्यमंत्री डा शिववंश पांडेय ने कहा कि, पांडेय जी दीर्घ काल तक सम्मेलन के प्रधानमंत्री रहे तथा एक सत्र के लिए सम्मेलन के अध्यक्ष भी चुने गए। उनके समय में हीं सम्मेलन अपना विशाल आकार ग्रहण कर लिया था। सम्मेलन के उपाध्यक्ष नृपेंद्र नाथ गुप्त ने भी अपने उद्गार व्यक्त किए।

इस अवसर पर आयोजित कवि सम्मेलन का आरंभ कवि राज कुमार प्रेमी की वाणी-वंदना से हुआ। वरिष्ठ कवि मृत्युंजय मिश्र ‘करुणेश’ ने प्रकृति की जीवंतता को शब्द देते हुए कहा कि, “ बादल है घहराएगा ही, सागर है, लहराएगा हीं।जिसने होंठों पर रख ली है, वो बाँसुरी बजाएगा हीं/ इक पीपल का पेड़ घना है, इक ‘करुणेश’ कुआँ है गहरा/ जाना, पास बिठाएगा ही, जाना,प्यास बुझाएगा हीं”। व्यंग्य के कवि ओम् प्रकाश पांडेय ‘प्रकाश’ ने आज की शोषक प्रवृति वाली राजनीति पर इन पंक्तियों से प्रहार किया कि, “ तुम मेरी मौसी के बेटे/ हम तुम्हारी मौसी के/ कल तुमने ख़ून चूसा था, खाया था/ आज हम चूसेंगे,खाएँगे/ वतन को बारंबार जलाएँगे”।

डा शंकर प्रसाद ने कुछ इस तरह आवाज़ दी कि, “हुई शाम मीठी ग़ज़ल सुनाया करो/ हमारी गली में भी आया करो/ नज़र से बचाके, सभी से छुपा के/ बचा के छुपा के आया करो”। डा कल्याणी कुसुम सिंह ने स्त्री-वेदना को इन पंक्तियों में अभिव्यक्ति दी कि, “रोज़ हीं होते सेमिनार/ हो स्त्रियों का उद्धार/ फिर भी रोज़ रोज़ स्त्रियाँ सह रही अत्याचार”। युवा कवयित्री नन्दिनी प्रनय ने कहा कि, “अपनी ख़्वाहिश पूरी करने को, कुछ सपने बुनते लोग मिले/ कुछ तो थे बेगाने उनमें, कुछ अपने जैसे लोग मिले”।

शायर रमेश कँवल का कहना था कि, “ जो पल गुज़र गए उन्हें मुड़कर न देखिए/सब कुछ है आज, माज़ी के मंज़र न देखिए”। रखिए बहु को जैसे हों बेटे, दुलारिए/ लाई है साथ क्या जेबर न देखिए”। कवि घनश्याम ने अपने दर्द का बयान इस तरह किया कि, “ तेरी आँखों की नादानी न होती/ मुझे इतनी परेशानी न होती/ तुम्हारे हौसले थाँधे न होते मुझे फिर आग सुलगानी न होती”।

कवि जय प्रकाश पुजारी, डा मेहता नगेंद्र सिंह, अमियनाथ चटर्जी, डा दिनेश दिवाकर, सुनील कुमार दूबे, शैलेंद्र झा ‘उन्मन’, शुभ चंद्र सिन्हा, डा विनय कुमार विष्णुपुरी, इंद्र मोहन मिश्र ‘महफ़िल’, डा अर्चना त्रिपाठी, पूजा ऋतुराज, पंकज प्रियम, डा प्रतिभा पराशर, बच्चा ठाकुर, प्रभात धवन, प्रकाश महतो वियोगी, शमा कौसर, अजय कुमार सिंह, पं गणेश झा, बाँके बिहारी साव, तथा अजीत कुमार सिन्हा ने भी अपनी रचनाओं से महफ़िल में चार चाँद लगाए। मंच का संचालन योगेन्द्र प्रसाद मिश्र ने तथा धन्यवाद-ज्ञापन कृष्ण रंजन सिंह ने किया।

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