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जन्म शताब्दी: व्यापक सरोकारों वाले क्रांतिकारी डॉ.सेन

अजित कुमार सेन, दुनिया जिन्हें डॉ ए. के. सेन के नाम से जानती थी, की जन्मशताब्दी चल रही है। बिहार और विशेषकर पटना के नागरिक समाज को आधुनिक व लोकतांत्रिक बनाने में जिन शख्सियतों का महती योगदान रहा है, उनमें डॉ ए. के. सेन अग्रणी रहे हैं। पेशे से चिकत्सिक रहे डॉ सेन बिहार के कई सामाजिक-सांस्कृतिक संगठनों और आंदोलनों की मुख्य प्ररेणा रहे। आजादी के बाद लगभग तीन-चार दशकों तक पटना के मध्यम वर्ग में प्रगतिशील चेतना पैदा करने और उन्हें सामाजिक कायरे के लिए प्रेरित करने का श्रेय जितना डॉ सेन को जाता है, उतना शायद ही किसी अन्य शख्स को।

डॉ सेन का जन्म 1916 बिहार के मुजफ्फरपुर में हुआ था। उनके पिता रमेश चंद्र सेन वहां भौतिकी के प्राध्यापक थे। ए. के. सेन की प्रारंभिक पढ़ाई-लिखाई मुजफ्फरपुर में हुई। उनके पिता चटगांव विद्रोहियों से बेहद प्रभावित थे और स्वाधीनता आंदोलन की सहायता भी किया करते थे। किशोर ए. के. सेन पर इन सबका गहरा असर पड़ा। स्कूली दिनों में सुप्रसिद्ध फिल्मकार विमल राय कुछ दिनों तक उनके सहपाठी रहे।

सांस्कृतिक स्तर पर पिछड़े बिहारी समाज में गीत, संगीत, नाटक के माध्यम से लोगों की रुचियों में परिवर्तन के लिए उन्होंने ‘‘भारतीय जन नाट्य संघ’ (इप्टा) की बिहार ईकाई को सक्रिय करने में बड़ी भूमिका निभाई। चिकित्सा के अपने व्यस्ततम पेशे के बावजूद डॉ. सेन नाटकों के रिहर्सल में पहुंच जाया करते थे। इप्टा के समक्ष जब भी सांगठनिक, आर्थिक समस्याएं सामने आतीं उनकी मदद से ही उन्हें निपटाया जाता। कई बार सांस्कृतिक प्रदर्शन के टिकटों की बिक्री की व्यवस्था उन्हें दी जाती। इप्टा के अलावा ‘‘इस्कस ( अब ‘‘इस्कफ’) और ‘‘एप्सो’ से भी इनका जुड़ाव रहा। डॉ. सेन कहा करते कि ‘‘दो घंटे के एक कार्यक्रम के सफल प्रदर्शन का संगठन पीएचडी की एक थीसिस लिखने के बराबर है।’

एक चिकित्सक के रूप में उन्होंने अपार ख्याति अर्जित की। वामपंथी राजनीति के प्रति झुकाव ने उन्हें गरीब-गुरबों के इलाज के प्रति विशेष रूप से सचेत बनाया। सस्ती दवा लिखना, प्रत्येक मरीज के साथ देर तक बातें करने की उनकी आदत से अधिकांश मरीजों को यह अहसास होता कि उनका आधा रोग ठीक हो गया। पटना के झुग्गीवासियों के बीच एक कहावत ही प्रचलित थी ‘‘डॉ. सेन के यहां रोते-कराहते जाओ और हंसते हुए लौटो’।

डॉ. सेन ने चिकित्सकों की प्रतिनिधि संस्था आईएमए को एक गॉसिप क्लब से एक प्रगतिशील और प्रभावी संगठन में तब्दील कर उसे देशके मानचित्र पर स्थापित किया।

चिकित्सकीय पेशे के अतिरिक्त ‘‘साइंस फॉर सोसायटी’, सिटीजंस फोरम, एकता मंच, किताब मंच जैसी संस्थाओं के डॉ. ए.के. सेन प्रेरणास्रेत रहे। 1979 में आईस्टीन की जन्म शताब्दी पटना में बड़े धूमधाम से बनाई गई। इसी के बाद ‘‘साइंस फॉर सोसायटी’ का अभ्युदय हुआ। पढ़ने-लिखने की आदत विकसित करने के लिए ‘‘किताब मंच’ जैसा अनूठा संगठन अस्तित्व में आया। बिहार के नागरिक जीवन में हस्तक्षेप करने वाली ‘‘सिटीजंस फोरम’ काफी लोकप्रिय थी। ‘‘एकता मंच’ ने बिहारशरीफ के दंगों में सांप्रदायिक सद्भाव के पक्ष में अभियान चलाया। पचास-साठ के दशक में विविद्यालय कर्मचारियों का कोई संघ नहीं था, उनकी कोई सेवाशर्त न थी। उनकी सेवा महाविद्यालय के प्रबंधन की मर्जी पर निर्भर था। डॉ सेन के नेतृत्व में कर्मचारियों के लिए वेतनमान और सेवाशर्त निर्धारित करने पर प्रबंधन को मजबूर होना पड़ा।डॉ सेन राजनीतिक तौर पर भी बेहद सक्रिय थे।

1969 में हुए मध्यावधि चुनाव पटना पश्चिम विधान सभा से सीपीआई के उम्मीदवार के रूप में उन्होंने बिहार के मुख्यमंत्री रहे महामाया प्रसाद सिन्हा, कांग्रेस के मोइनुल हक, जन संघ के आरपी लाल आदि को पराजित कर तहलका मचा दिया। वह डॅाक्टरों की उस महान परंपरा में थे, अपने पेशे के अतिरिक्त जनता के संघर्षो में सीधे-सीधे भाग लिया। 1970 में कम्युनिस्ट पार्टी ने ‘‘अतिरिक्त भूमि कब्जा करो’ का नारा दिया। फुलवारीशरीफ में डॉ सेन ग्रामीण गरीबों के साथ लाल झंडा लेकर भूमि दखल अभियान में भी गए।

एक बार पटना के प्रसिद्ध चिकित्सक डॉ. यू. एन. शाही ने वामपंथी नेता चतुरानन मिश्र से शिकायत की ‘‘आप लोग डॉ. सेन जैसे विशेषज्ञों को मजदूरों-कर्मचारियों के संघर्ष में लगाकर चिकित्सा जगत का नुकसान कर रहे हैं।’ डॉ सेन की प्रतिक्रिया कुछ-कुछ महान लैटिन अमेरिकी क्रांतिकारी चेग्वेरा, वह भी पेशे से डॉक्टर थे, जैसी थी ‘‘डॉ शाही सर्जन हैं। वह प्रिवेंटिव चिकित्सा को समझ नहीं पा रहे हैं। जो रोगग्रस्त हैं, उनकी चिकित्सा तो होनी चाहिए किन्तु रोगियों की संख्या बढ़े नहीं, यह भी तो डॉक्टरों का कर्तव्य है। समाज को यथासंभव रोगमुक्त होने की दिशा में ले चलने के लिए इस पूंजीवादी रोग से भी मुक्ति अनिवार्य है।’

अनीश अंकुर
साभार: राष्ट्रीय सहारा

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