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जब पटना के आसपास गैंडों का बसेरा था

दो साल पहले की गयी एक एक गणना के मुताबिक अभी पूरे देश में गैंडों की संख्या करीब 3555  है। इसमें भी दो तिहाई असम के जंगलों में है। नब्बे के दशक में इनकी संख्या 1800 के आसपास थी जो संरक्षण की वजह से बढ़ कर अब इतनी हो पायी है। लेकिन आपको यह जानकार विस्मय होगा कि कभी पटना के आसपास के जंगलों में ये हजारों की संख्या में मौजूद थे।

1670 के आसपास जब ब्रिटिश व्यापारी थॉमस बाउरे पटना आया था तो उसने शहर के आसपास के बगीचों और जंगलों में भारी संख्या में एक सींग वाले गैंडों को देखा था। अपने लॉग बुक ‘एन अकाउंट ऑफ़ द जर्नल ऑफ़ ए  वॉयेज फ्रॉम इंग्लैंड टू बंगाल’ में उसने इन गैंडों का जिक्र किया है। उसने लिखा है,’ इन जंगलों में बड़ी संख्या में गैंडे घूमते हुए आसानी से दिख जाते हैं। कुछ तो ऐसे गैंडों को मैंने देखा जिनके 13-14 इंच लंबे सींग थे।  स्थानीय निवासी इनके बच्चों को पकड़ कर पालतू बना लेते हैं। इनकी हाथी से शत्रुता रहती है। जहां ये पाये जाते हैं वहां हाथी का होना मुमकिन नहीं है।’

उन्हीं वर्षों में एक डच राजनयिक ग्राफ भी पटना में मौजूद था। उसने भी यहां पाए जाने वाले गैंडों का जिक्र किया है। उसने लिखा है कि डच कंपनी के डायरेक्टर जैक वेरबर्ग को स्थानीय शिकारियों ने गैंडे का एक बच्चा लाकर उपहार में दिया था। वे उसे समीप के जंगल से उसकी माँ को मारने के बाद लेकर आये थे। यह बच्चा करीब पांच फ़ीट का था। यह भूरे मोती के रंग का था। इसका चमड़ा हाथी के चमड़े की तरह था। इसका सिर बड़ा और चौड़ा था। इसका थूथना भारी और काफी चौड़े थे। यह जानवर देखने लायक था।

ब्रिटिश लेखिका और पत्रकार एम्मा रॉबर्ट्स जब दीघा के अंग्रेज व्यवसायी मिस्टर हॉवेल के फार्म पर सड़क के रास्ते से जा रही थी तब उसने अगल बगल के बगीचों में इन गैंडों को देखा था। तब तक गैंडों की संख्या में कमी आने लगी थी। पटना में एम्मा रॉबर्ट्स ब्रिटिश चित्रकार और अफीम एजेंट चार्ल्स डी’ऑयली की मेहमान थीं।

कालांतर में इन गैंडों की संख्या सिमटती चली गयी। बड़े पैमाने पर इनका शिकार होने लगा। इनके सींगों की मांग पूरब के देशों में थी। साथ ही साथ यूरोपियन इनका शिकार अपने मनोरंजन के लिए करने लगे। बड़े पैमाने पर जंगलों को साफ़ कर खेती के लायक बनाया जाने लगा। इन खेतों में पोश्ते की खेती को प्रोत्साहन दिया जाने लगा। पोश्ते से अफीम तैयार किया जाता था। अफीम के कारखाने आस्तित्व मे आने लगे।

1811-12 में अपने सर्वेक्षण के क्रम में पटना आये बुकानन ने अपनी रिपोर्ट में गैंडों का कोई उल्लेख नहीं किया है। या तो उसने इसकी जरूरत नहीं समझी होगी या उस समय तक इनकी संख्या नगण्य हो गयी थी। 1907 में जब ओ’मैली पटना गज़ेटियर के लिए सर्वेक्षण कर रहा था तब भी अपनी रिपोर्ट में उसने गैंडे का कोई उल्लेख नहीं किया है। संभवतः इनका आस्तित्व इस समय तक ख़त्म हो गया था।

फिलवक्त इन्हें पटना के चिड़ियाखाना में देखा जा सकता है।

साभार: प्रभात खबर

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