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जयंती: प्रज्ञा और पराक्रम के युगल-प्रतीक हैं परशुराम

पटना, 19अप्रैल। पुराकाल के मिथकीय ऋषि भगवान परशुराम प्रज्ञा और पराक्रम के महान प्रतीक हैं। वे अपने काल के युगांतरकारी क्रांतिकारी थे, जिन्होंने भारत-भूमि को दुराचारी और अत्याचारी शोषक शासकों से मुक्ति दिलाई थी। वे अपार बलशाली, युद्ध-कला और शास्त्र-विज्ञान के विलक्षण आचार्य और वैज्ञानिक थे। उन्होंने तब के श्रेष्ठतम आयुधों का निर्माण किया था। उनके बल और पराक्रम का प्रकोप ऐसा था कि, उनका नाम सुनते हीं, शक्तिमंत राजाओं और सेनापतियों के रक्त ज़माने लगते थे और रोम सिहर उठते थे। उन्होंने स्त्रियों के सम्मान और समानता के अधिकारों की लड़ाइयाँ भी लड़ीं तथा पीड़ीतों के समर्थन में सदा खड़े रहते थे। वे एक महान और वलिदानी तपस्वी हीं नहीं, अपने काल के महानतम योद्धा थे। शास्त्र और शास्त्र, दोनों हीं उनकी प्रचंड भुजाएँ थीं। वे युग-पुरुष युगावतार थे।

यह बातें आज यहाँ प्रज्ञा समिति के तत्त्वावधान में, बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन सभागार में आयोजित परशुराम जयंती समारोह को मुख्य अतिथि के रूप में, संबोधित करते हुए, सम्मेलन के अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने कही। डा सुलभ ने कहा कि, भगवान परशुराम के संबंध में यह भ्रांति है कि, वे क्षत्रियों के बैरी थे। वे किसी वर्ण या व्यक्ति के नहीं, बल्कि शोषकों और अत्याचारियों के शत्रु थे। वे महान उद्धारक थे।

समारोह का उद्घाटन उद्घाटन करते हुए, पटना उच्च न्यायालय के वरीय अधिवक्ता शशि शेखर द्विवेदी ने कहा कि, भगवान परशुराम सज्जनों के लिए ‘राम’ और दर्जनों के लिए परशु-धारक राम’ थे ।

प्रज्ञा समिति के अध्यक्ष डा शिववंश पाण्डेय की अध्यक्षता में “भारतीय मनीषा में अवतार की अवधारण” विषय पर आयोजित इस संगोष्ठी के मुख्य वक़्ता प्रसिद्ध विद्वान डा बलराम तिवारी ने अपना विचार व्यक्त करते हुए, कहा कि ईश्वर या ब्रह्म को शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। वह एक परोक्ष अनुभूति है। वह समझाए जाने से परे है। उन्होंने कहा कि, ‘अवतार’ का शाब्दिक अर्थ किसी का ऊपर से उतरना है, किंतु उसका समाज-स्वीकृत अर्थ है-‘आविर्भाव’। उस अलौकिक ब्रह्म को लौकिक रूप देने अथवा ‘अलोक ब्रह्म’ को ‘लोक-बद्ध बनाने के लिए ‘अवतार’ की संकल्पना आई।

पटना विश्व विद्यालय के कला-संकाय के अध्यक्ष डा अखिलानंद त्रिवेदी, प्रज्ञा समिति के कार्यकारी अध्यक्ष पंडितजी पांडेय, साहित्य सम्मेलन के उपाध्यक्ष नृपेंद्र नाथ गुप्त, डा रमाकान्त पांडेय, राजेंद्र तिवारी, ऋषिकेश पाठक तथा शकुंतला मिश्र ने भी अपने विचार व्यक्त किए।

इस अवसर पर डा अशोक कुमार अंशुमाली, प्रो मुकेश कुमार ओझा, डा विनय कुमार विष्णुपुरी, शंभुनाथ पाण्डेय, डा नागेश्वर यादव, राकेश दत्त मिश्र, कृष्ण रंजन सिंह, बशिष्ठ तिवारी, जय प्रकाश पुजारी, के के तिवारी, प्रभात धवन, गणेश झा, आर प्रवेश तथा अंशु पाठक समेत बड़ी संख्या में प्रबुद्धजन उपस्थित थे।

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