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जानिए प्रेस कॉन्फ्रेंस करने वाले सुप्रीम कोर्ट के चारों जजों के बारे में

स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह पहला मौका था, जब सुप्रीम कोर्ट के चार सिटिंग जजों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर मीडिया के सामने अपनी बात रखी. जस्टिस जे चेलमेश्वर, जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस मदन लोकुर और जस्टिस कूरियन जोसेफ इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में मौजूद रहे. जजों का कहना था कि चीफ जस्टिस चार सबसे वरिष्ठ जजों की बात भी नहीं सुनते. जानिए इन चारों जजों के बारे में

जस्टिस जे चेलमेश्वर

जस्टिस जे. चेलमेश्वर का पूरा नाम जस्ती चेलमेश्वर है. उनका जन्म आंध्र प्रदेश के कृष्णा जिले में 23 जुलाई, 1953 को हुआ. चेलमेश्वर ने मद्रास लोयला कॉलेज से भौतिकी विषय से स्नातक की पढ़ाई की. इसके बाद आंध्र यूनिवर्सिटी से 1976 में कानून की पढ़ाई की. साल 2007 में गुवाहाटी हाईकोर्ट में प्रधान न्यायाधीश की भूमिका निभाने के बाद साल 2011 में वह सुप्रीम कोर्ट के जज बने.

उनके चर्चित फैसलों में आधार कार्ड से जुड़ा फैसला है. जिसमें उन्होंने कहा था कि अगर किसी नागरिक के पास आधार कार्ड नहीं है तो उसे किसी तरह की सब्सिडी से दूर नहीं रखा जा सकता है.

जस्टिस रंजन गोगोई

सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस बनने की कतार में खड़े रंजन गोगोई 18 नवंबर, 1954 को असम में पैदा हुए. वकालत की पढ़ाई पूरी करने के बाद 1978 में वकील बने. फरवरी 2001 को वह गुवाहाटी हाईकोर्ट में स्थाई जज के रूप में नियुक्त किए गए. इसके बाद 9 सितंबर 2010 को उनका तबादला पंजाब – हरियाणा हाईकोर्ट में हुआ. न्यायपालिका में इतने बड़े पद पर पहुंचनेवाले वह नॉर्थ ईस्ट के पहले नागरिक थे. साल 2012 को वह सुप्रीम कोर्ट के जज बने.

जस्टिस रंजन गोगोई उस बेंच में शामिल रहे हैं जिन्होंने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू को सौम्या मर्डर केस पर ब्लॉग लिखने के संबंध में निजी तौर पर अदालत में पेश होने के लिए कहा था. जस्टिस गोगोई के पिता केशव चंद्र गोगोई असम के मुख्यमंत्री रह चुके हैं.

जस्टिस मदन भीमराव लोकुर

जस्टिस मदन भीमराव लोकुर का जन्म 31 दिसंबर 1953 को हुआ था. उन्होंने दिल्ली के मॉडर्न स्कूल से पढ़ाई करने के बाद डीयू के सैंट स्टीफन कॉलेज से इतिहास में स्नातक की. फिर यहीं से 1977 में एलएलबी की डिग्री हासिल की. इसके बाद दिल्ली हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में वकालत की. वो 1981 में परीक्षा पास करके सुप्रीम कोर्ट में एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड में पंजीकृत हुए. सन् 1999 में दिल्ली हाईकोर्ट में बतौर एडिशनल जज वह नियुक्त किए गए, फिर इसी साल स्थाई जज भी बन गए.

इनके प्रमुख फैसलों में आरक्षण से जुड़ा फैसला है. आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के जज रहते हुए साल 2012 में इन्होंने अपने एक फैसले में कहा कि ओबीसी कोटे के तहत मिल रहे 27 प्रतिशत आरक्षण में माइनॉरिटी को अलग से 4.5 प्रतिशत आरक्षण नहीं दिया जाएगा. उन्होंने भारत सरकार के फैसले को पलट दिया था.

जस्टिस कुरियन जोसेफ

जस्टिस कुरियन का जन्म 30 नवंबर 1953 में केरल में हुआ था. इन्होंने केरल लॉ एकेडमी लॉ कॉलेज से तिरुवनंतपुरम से कानून की पढ़ाई की थी. 1977-78 में वो केरल यूनिवर्सिटी में एकेडमिक काउंसिल के सदस्य बने. 1983-85 तक कोच्चि यूनिवर्सिटी के सीनेट मेंबर रहे. 1979 से केरल हाई कोर्ट से वकालत शुरू करने वाले कुरियन 1987 में सरकारी वकील बने और 1994-96 तक एडिशनल जनरल एकवोकेट रहे. 1996 में वो सीनियर वकील बने और 12 जुलाई, 2000 को केरल हाई कोर्ट में जज बने.

जस्टिस कुरियन के प्रमुख फैसलों में कोयला घोटाले से जुड़े मामले हैं. तीन जजों की बेंच में रहते हुए उन्होंने मामले की जांच कर रही सीबीआई को छूट दी थी कि वह किसी भी राजनेता, ब्यूरोक्रैट से कभी भी पूछताछ कर सकती है. इसके साथ ही तीन तलाक से जुड़े मामले में उन्होंने कहा कि ट्रिपल तलाक एक धर्म विशेष समुदाय के लोगों का अभिन्न हिस्सा है और यह उनके व्यक्तिगत कानून का हिस्सा है.

साभार: फर्स्ट पोस्ट

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