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ज्ञान-विज्ञान और संविधान के मूल्यों का हिन्दुस्तान चाह रहा है आज का दलित

‘‘दुनिया में जहां इंसानों को आर्थिक मापदण्ड की कसौटी पर तौला जाता है, वहीं हिन्दुस्तान दुनिया का एक ऐसा मुल्क है जहां जन्म, जाति और पेशा इंसान की हैसियत का पैमाना माना जाता है। यह कसौटी आस्था और विश्वास पर आधारित है। तर्क, बुद्धि, ज्ञान-विज्ञान पर आधारित नहीं है। ऐसे में आस्था और विश्वास की ज़मीन पर फैलायी गयी धर्ममांधता, परम्परा और रूढ़ीवादिता से लबरेज़ समाज में सामाजिक बदलाव की लड़ाई बड़ी ही मुष्किल हो जाती है।’’

दशकों पहले डाॅ0 अम्बेदकर ने ऐसे बुनियादी सवालों को खड़ा किया था जो आज के सत्तर साल युवा भारतीय लोकतंत्र का एक कड़वा सामाजिक सच है। यानि हिन्दुस्तान की जम्हूरियत रूपी हम्माम (स्नानघर) में लोकतंत्र तार-तार और उसके सभी शिल्पी नंगे?
मगर आज हिन्दुस्तान का दलित समाज एक नये हिन्दुस्तान की लड़ाई लड़ने को आगे बढ़ रहा है। अपनी इस लड़ाई के लिये वह लाम्बन्द भी हो रहा है, समानता और वैज्ञानिक तर्को पर आधारित इस नये हिन्दुस्तान का वह एक नयी इबारत भी लिखने की कोशिश कर रहा है, नई इबारत को गढ़ने के लिए इस तबके से एक नूतन नेतृत्व समूह भी उभरा है जो समानता पर आधारित हिन्दुस्तान के लिये विजडम, विज़न एवं एक्षन के साथ सड़कों पर अपनी एक मजबूत हाजरी दर्ज करा गया। पिछले 2 अप्रैल, 2018 का बन्द इनके इसी साझा सपनों की अभिव्यक्ति जीता-जागता सबूत है।

उल्लेखनीय है कि इस बार हिन्दुस्तान के अभिवंचितों की यह लाम्बंदी पिछले कई दशकों के लामबंदी से थोड़ा अलग था। इसके इस बेक़रारी, साझा सपने और साझा संघर्ष का आधार था ज्ञान-विज्ञान और संविधान जिसे यह समाज समानता पर आधारित एक नये हिन्दुस्तान के निर्माण के लिये डाॅ0 अम्बेदकर की विरासत मानता है।

02 अप्रैल, 2018 की अभिव्यक्ति (बंद), इस अभिव्यक्ति का स्वप्न, आंदोलन की रूप-रेखा सब कुछ ज्ञान पर आधारित था और इस ज्ञान पर आधारित अभिव्यक्ति एक वर्क आउट किया हुआ हस्तक्षेप था। संभवतः यही कारण था कि 2 अप्रैल, 2018 की यह अभिव्यक्ति (बंद) अपने उदेश्य में सफल हुआ और आगे भी किस ज्ञान (Wisdom) के आधार पर कदम उठाये जाने हैं, उसकी रणनीतियां क्या होगी, इसका भी एक स्वायत गढ़ गया।

दूसरी ओर यह अभिव्यक्ति (बंद) जिस ज्ञान पर खड़ा था उस ज्ञान के आधार पर एक वैज्ञानिक प्लानिंग के साथ काठियावार से कामरूप, कटिहार से कैमूर, गोपालगंज से गया, मेरठ से मऊ, गोरखपुर से गुड़गाॅव, हटिया से हजारीबाग, जयपुर से जोधपुर, भोपाल से भिण्ड, फरूखाबाद से फिरोजपुर सभी जगहों पर एक वैज्ञानिक तरीके से इन अभिवंचितों ने अपने को संगठित किया था। यानि एक वैज्ञानिक तौर-तरीके से गोलबन्दी, वैज्ञानिक तरीके से आंदोलन का अनुषासन, साथ ही एक वैज्ञानिक चेतना एवं वैज्ञानिक तर्कों पर आधारित एक आंदोलन की रूप-रेखा।

इस अभिव्यक्ति (बंद) के पीछे जहां पहली बार सुविचारित ज्ञान, विज्ञान और वैज्ञानिक तर्कों के साथ संविधान प्रदत प्रावधानों का संबल भी इन अभिवंचितों के ऊर्जावान स्वर का एक स्वर था।

गोया कि आज के हिन्दुस्तान का यह दलित-अभिवंचित वर्ग समझ गया है या समझने लगा है कि 21वीं सदी के हिन्दुस्तान में अगर अपने लिये ‘‘इज्जत की जिंदगी और दो जून की रोटी’’ रूपी अपने अधिकारिता स्वरुप को हासिल करना है तो ज्ञान विज्ञान और संविधान ही एक वाहिद रास्ता है जिसके सहारे मनुवादी शक्तियों को हाशिये पर डालकर अपनी दावेदारी और हिस्सेदारी ठोकी जा सकती है क्योंकि हिन्दुस्तान का संविधान इस समाज को यह हक देता हैं।

इस समाज को इस अधिकारिता (Entitlement) को दिलवाने में डाॅ0 भीमराव अम्बेदकर ने यदि अपने ज्ञान (wisdom) वैज्ञानिक तर्क और चिंतन का इस्तेमाल नहीं किया होता तो शायद जिन परिस्थितियों में देश के संविधान की इबारत इन्होंने लिखी, आज उसको आधार बनाकर 21 वीं सदीं के दूसरे दशा में 2 अप्रैल, 2018 को हिन्दुस्तान का दलित समाज अपने सामूहिक नेतृत्व के साथ जो बात कह गया वह संभव नहीं था। यानि इस देश  व्यापी अधिकारिता के ज्वार का संबल था ज्ञान-विज्ञान और संविधान जो इस सबल्टर्न को दो जून की रोटी और इज़्जत की जिन्दगी की गारण्टी दे सकता है।

ग़ालिब जनसरोकार से जुड़े सुप्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता है।

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