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तब काम के बदले मिलता था अनाज

अंग्रेजों ने 1872 में पहली बार नियमित जनगणना का काम शुरू किया था। ओ’ मैली जब 1907 में गज़ेटियर पर काम कर रहा था उस वक्त पटना शहर की आबादी 134,785 और पूरे जिले की आबादी 1,624,742 थी। इनमें राजपूतों की संख्या 63, 724 थी। ओ’ मैली ने इन्हें उन सैनिकों का वंशज माना है जो यहां आकर बस गए थे।

ओ’ मैली ने लिखा है,’ राजपूत खुद को बाभनों (भूमिहारों) से श्रेष्ठ मानते हैं। इन्हें बहादुर और ईमानदार माना जाता है। पुलिस की नौकरी में राजपूत काफी संख्या में हैं। मुख्य रूप से राजपूत समृद्ध किसान होते हैं। इनमें से कुछ ज़मींदार हैं और पैसों के लेन देन के कारोबार से भी जुड़े हैं।’

ओ’ मैली ने पटना के निकट के बाढ़ सब डिवीजन का जिक्र करते हुए लिखा है कि यहां कई ऐसे प्राचीन गांव है जहां की पूरी आबादी ही राजपूतों की है। यहां तक कि गांव के चौकीदार भी राजपूत ही हैं।

गज़ट में हज्जामों (नाइयों) की कुल संख्या 27, 236 बताई गई है। ओ’ मैली लिखता है, ‘नाई जाति पूरी तरह हज़ामत के पेशे में लगी हुई है। ये गृहस्थों से जुड़े हुए हैं। इन्हें हज़ामत के एवज नकद राशि के बदले प्रति व्यस्क व्यक्ति सालाना दस सेर अनाज मिलता है। कई बार समृद्ध जमींदार इन्हें छोटी मोटी जागीर भी दे देते हैं।’

हज्जाम हरकारे का भी काम करते हैं। ओ’ मैली ने लिखा है,’अक्सर ब्याह शादी के मौके पर या अन्य कोई आयोजन के लिए निमंत्रण देने के लिए इनकी ही मदद ली जाती है। पंचायत बुलाने की मुनादी भी इन्हीं से करवाई जाती है। इसके एवज में इन्हें अनाज या पैसा दिया जाता है।’

फ़सल के वक्त में ये अपने प्रत्येक ग्राहकों के घर जाकर अपना अनाज इकठ्ठा कर लेते हैं। इससे अक्सर नाइयों के पास साल भर के खाने के लिए पर्याप्त अनाज एकत्रित हो जाता है। बावजूद बुरे वक्त में या आकस्मिक खर्च आ जाने पर इनके पास नकद पैसों की कमी रहती है। जिन नाइयों के ग्राहक समृद्ध हिंदुस्तानी या अंग्रेज होते हैं उन्हें नकद पैसा मिलता है। ये थोड़े बहुत पैसा बचा पाते हैं। लेकिन आमतौर पर नाई गरीब ही होते हैं।

गज़ेटियर में बढ़ई जाति की संख्या पूरे जिले में 26, 828 बताई गई है। ओ’ मैली के मुताबिक ये पूरी तरह बढ़ईगिरी के पेशे में हैं। आमतौर पर ये ग्रामीण इलाकों में रहते हैं। मुख्य रूप से इनका काम किसानों के लिए हल का निर्माण और उसके मरम्मत के साथ साथ अन्य खेती के उपकरणों के निर्माण का होता है। नाइयों की तरह इनके ग्राहक भी इन्हें आमतौर पर अनाज से ही भुगतान करते हैं। एक हल बनाने की कीमत इन्हें एक मन अनाज से दी जाती है।

पूरे जिले में कायस्थों की संख्या सबसे कम थी। 1907 में कायस्थों की जनसंख्या मात्र 25, 276 थी। ओ’ मैली ने इन्हें पढ़ने लिखने वाली जाति माना है। ओ’ मैली ने लिखा, ‘ कायस्थ आमतौर पर सरकारी दफ्तरों में मुलाजिम होते हैं। पुलिस विभाग में कई कायस्थ ऊँचे पदों पर हैं। पुलिस विभाग में मुंशी के पद पर भी कई कायस्थ नौकरी कर रहे हैं। कायस्थ व्यापार से घृणा करते हैं। इन्हे अपनी जाति पर गर्व है। ये पारिवारिक और सामाजिक समारोहों पर दिल खोल कर खर्च करते हैं। यद्यपि आमतौर पर ये गरीब ही होते हैं।’

ओ’ मैली ने विस्मय के साथ कायस्थों के दावात पूजा का उल्लेख किया है। वह उन्हें आश्चर्य के साथ कलम और रोशनाई की पूजा करते देखता है।

साभार: प्रभात खबर

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