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तब छकड़े, बैलगाड़ी ही यातायात के साधन थे

16 वीं, 17 वीं और 18 वीं सदी में पटना पश्चिम में गंगा नदी के जरिये बनारस, इलाहाबाद और आगरा के साथ साथ ही यह पश्चिम एशिया, मध्य एशिया और  ईजिप्ट से जुड़ा हुआ था और  पूरब में सड़क मार्ग से आगरा से लेकर चिटगांव तक जुडा हुआ था।

उन दिनों पटना से सड़क मार्ग द्वारा निर्यात किये जाने वाले सामानों को घोड़ो द्वारा खींचे जाने वाले छकड़े या बैलगाड़ी से भेजा जाता था। सूखे मौसम में पटना से आगरा की करीब 900 किलोमीटर की दूरी तय करने में छकड़े को करीब 35 दिन लगते थे। बरसात के दिनों में जब सड़क छकड़े के लायक नहीं रह जाती तो बैलगाड़ी ही माल ढुलाई का एक मात्र साधन हुआ करता था। बरसात के बाद अक्टूबर से छकड़े के मार्फ़त माल ढुलाई का काम शुरू हो जाता था।

ब्रिटिश भूगोलवेत्ता और इतिहासकार जेम्स रेनेल ने अपने संस्मरण में आगरा तक की माल ढुलाई का रोचक जिक्र किया है। उसने लिखा है, ‘पटना के एक आढ़तिये ने 4 अक्टूबर, 1620 को 26 गट्ठर माल 4 छकड़ों पर 10 नौकरों की देखरेख में आगरा के लिए रवाना किया। उसे 30 दिन के निर्धारित समय पर आगरा पहुँचने का आदेश दिया गया था। इसके लिए उसे निर्धारित सवा रूपये या डेढ़ रूपये प्रति मन से अधिक 2 रूपये प्रति मन का किराया दिया गया। आढ़तिये ने 81 मन के लिए कुल 153 रूपये का भुगतान किया। इसके साथ यह शर्त भी रखी गयी कि अगर माल निर्धारित समय पर आगरा के आढ़तिये के पास पहुंचा दिया गया तो 8 रूपये बख्शीश के तौर पर अलग से दिए जायेंगे।

इसके साथ यह भी शर्त थी कि अगर माल समय पर नहीं पहुंचा तो उन्हें मात्र डेढ़ रूपये के दर से ही भुगतान किया जायेगा और बकाया राशि की वसूली पटना में उनके द्वारा जमा की गयी जमानत की राशि से की जाएगी। प्रत्येक नौकरों को चार चार रूपये यात्रा के लिए दिए गए थे।
आकस्मिक खर्च के लिए १५ रूपये के साथ एक व्यक्ति इनके साथ था जो सामानों की पहुँचने की खबर वापस लौट कर देता। यह सारा माल निर्धारित समय पर आगरा पहुंच गया।

एक और दूसरी यात्रा का भी जिक्र रेनेल ने किया है। 19 मई, 1621 को पटना के आढ़तिये ने सामानों के 17 गट्ठर, जिनका वजन 52 मन था, एक रूपये साढ़े बारह आना की दर से दो छकड़ों पर लाद कर आगरा भेजा। सामानों के साथ 100 छकड़ों का कारवां भी था। साढ़े चौहत्तर  रूपये छकड़े वाले को अग्रिम दिया गया। शेष राशि उसे सामान को आगरा सही सलामत पहुँचाने के बाद मिलना था। कारवां की सुरक्षा के लिए तीर कमान से लैश 6 रखवाले भी थे। राह खर्च के लिए 10 रुपया के साथ एक आदमी भी था। लेकिन दुर्भाग्यवश इसे रास्ते में ही इसे लूट लिया गया। यह आगरा नहीं पहुंच सका।

साभार: प्रभात खबर

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