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तब ‘मेड इन पटना’ की शोहरत दूर तक थी

19 वीं सदी में जब पटना का विस्तार हो रहा था, कई अंग्रेज महिलाएं अपने पति, भाई या पिता के साथ हिंदुस्तान आयीं थीं। कुछ ने तो अपने पतियों या पिता के साथ सामान्य जीवन जिया वहीँ कुछ महिलाओं ने यहां के रोचक प्रसंग लिखे। उनके संस्मरणों से तत्कालीन पटना को समझा जा सकता है।

ऐसी महिला लेखकों में एमिली और उसकी बहन फेनी एडेन, इसाबेला फेन और एम्मा रॉबर्ट्स प्रमुख हैं।

अपनी बहन और उसके पति कैप्टेन नहटन के साथ 1828 के फ़रवरी में हिंदुस्तान आई ब्रिटिश लेखिका एम्मा रॉबर्ट्स ने यहाँ रहकर विभिन्न पत्रिकाओं और जर्नल्स, खासकर एशियाटिक जर्नल के लिए लगातार लिखा। इनके लेखों को पर्याप्त प्रशंसा मिली। अपनी पुस्तक ‘सीन्स  एंड करक्टेरिस्टिक्स ऑफ़ हिन्दोस्तान विद् स्केत्चेस ऑफ़ एंग्लो इंडियन सोसाइटी’ में पटना के बारे में विस्तार से लिखा।

इसाबेला फेन भी ऐसी ही ब्रिटिश युवती थी। इंग्लिश फाॅर्स के कमांडर इन चीफ की बेटी इसाबेला 1835 में हिंदुस्तान आईं थीं। पटना की शोहरत से प्रभावित इसाबेला अपने पिता से जिद कर स्टीमर द्वारा कलकत्ता से 30 सितम्बर 1836 को पटना चली आईं।

वह शुक्रवार का दिन था और पूरे दिन तेज बारिश होती रही थी। मौसम ठंढा हो गया था। उसने लिखा है,’गंगा नदी के किनारे बसा यह शहर छह मील लंबा है। लेकिन यह उदास करने वाला शहर है जहां थोड़े से सुंदर घर हैं। यह शहर मोमबत्तियों, एक ख़ास किस्म के सूती कपडे से बने टेबल क्लॉथ, टेबल नैपकिन और तौलिये के लिए मशहूर है। ये बेहद सस्ते और उपयोगी हैं।’

यद्यपि इसाबेला के पिता ने उसके लिए कलकत्ता में ही इन चीजों की खरीदारी कर ली थी लेकिन उसकी जिद थी कि उसे पटना में, पटना में निर्मित टेबल क्लॉथ और नैपकिन चाहिए। सो वह पटना चली आयी। शाम में बांकीपुर के नजदीक उनके स्टीमर ने लंगर डाला। रात उन्होंने स्टीमर पर ही बिताई।

अगली सुबह वे किनारे पर आये। बांकीपुर के रहने वाले मिस्टर ट्रॉटर,अफीम के एक व्यापारी ने उनकी आगवानी की। इसाबेला ने लिखा है, ‘ मिस्टर ट्रॉटर ने अपने आलीशान ख़ूबसूरत बंगले में सुबह के नाश्ते पर हमें आमंत्रित  किया।’
शाम के वक्त उनका स्टीमर दानापुर के घाट पर लगा। ब्रिगेडियर बीचर की बग्घी से वे पटना की ओर चले। इसाबेला ने लिखा है,’ रास्ते में मक्के की फसल दूर तक लहलहा रही थी। मुझे बताया गया था कि यह जिला अफीम के लिये मशहूर है लेकिन इस हिस्से में मैंने मक्के की ही फसल पायी।’

अगले दिन रविवार को इसाबेला चर्च गयी। उसके बाद बांकीपुर में रह रहे यूरोपियन परिवारों से उनका मिलना जुलना हुआ। उनका सारा वक्त डिनर और पार्टी में ही व्यतीत हो गया जहां सिर्फ अंग्रेज पुरुष और औरतें ही आमंत्रित थीं। इसाबेला ने मिस्टर हॉवेल के दीघा फार्म के बारे में भी सुन रखा था।

हॉवेल के फार्म का तैयार किया हुआ चटनी, सॉसेज, बेकन, हैम्स, बीफ इत्यादि  बड़े पैमाने पर कलकत्ता भेजे जाते थे। कलकत्ता से ये लंदन निर्यात किये जाते थे। इनकी गुणवत्ता किसी भी तरह से इंग्लैंड में तैयार ऐसे खाद्य पदार्थों से कम नहीं होती थी। इसाबेला अपने स्थानीय हमवतनों के साथ दीघा फार्म गयीं। वहां उन्होंने सॉसेज खरीदी। दूसरे लोगों ने अन्य खाद्य वस्तुएं।

पटना से इसाबेला बक्सर गयीं जहां बंगाल आर्मी के लिये घोड़े तैयार करने वाला घुड़साल था।

इसाबेला के संस्मरणों में दो रोचक तथ्य मिलते हैं। एक तो पटना के उत्पादों की  शोहरत दूर तक थी। इतनी कि एक ब्रिटिश युवती जिद कर इन चीजों को खरीदने पटना आती है। दूसरा, यहां के दीघा फार्म में उत्पादित यूरोपियन खाद्य  वस्तुओं का निर्यात यूरोप तक हो रहा था। पहले यहां रह रहे  यूरोपियन इन खाद्य वस्तुओं का आयात करते थे। अब ये खाद्य वस्तुएं यहां से यूरोप निर्यात की जा रहीं थीं।

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