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तुम जहां भी रहो हमारे हो…

अख़तर पयामी और जाबिर हुसेन

मई 2013 में, एक विशेष मनः स्थिति में, मैंने अपने बड़े भाई, उर्दू के बड़े शायर, अख़तर पयामी और प्रो. सैयद मूसी रज़ा के बारे में एक स्मृति-आलेख लिपिबद्ध किया था। यह आलेख उर्दू में था, जिसे बिहार-झारखण्ड के सभी उर्दू अख़बारों ने प्रमुखता से प्रकाशित किया। इस सहयोग के लिए मैं उन सभी उर्दू अख़बारों के प्रति शुक्रगुज़ार हूं।

इधर, उर्दू पाठकों ने लगातार इस आलेख को फ़ेसबुक पर पोस्ट करने का अनुरोध किया है। उनके आग्रह पर, मूल उर्दू लिपि में लिखा यह आलेख फ़ेसबुक पर डाला गया। इसके बाद हिन्दी पाठकों ने इसे देवनागरी में फेसबुक पर डालने की मांग की। मुझे यह देखकर आश्चर्य हो रहा था कि उर्दू-हिन्दी पाठकों ने समान रूप से अख़तर पयामी और प्रो. मूसी रज़ा के योगदान में इस क़दर दिलचस्पी दिखाई।

अपनी व्यस्तताओं के कारण आलेख का देवनागरी पाठ तैयार करने में थोड़ा समय लग गया। अब इसे यहां पाठकों के लिए प्रकाशित किया जा रहा है।

पिछले कुछ महीने हमारे लिए ‘मौत का मौसम’ साबित हुए हैं। हमारे इर्दगिर्द, एक के बाद एक, अज़ीज़ बहन भाइयों की मौतें हुई हैं। ऐसी मौतें जिनकी कल्पना से ही हमारी रूह में एक बेक़रारी पैदा हो जाती है। यहां तक कि ख़ुद हमारी ज़िन्दगी किसी हद तक हमारी नज़रों में अविश्वसनीय महसूस होने लगती है।

इन मौतों में दो ऐसी हैं, जिनके गुज़र जाने का ग़म भुलाए नहीं भूलता। अपनी ज़िन्दगी ख़ुद दुखों का एक आदमक़द आईना बन कर रह गई है। एक आईना, जिसकी साफ़-शफ़्फ़ाफ़ सतह पर कुछ ऐसी आकृतियां उभर आई हैं, जो मिटाए नहीं मिटतीं, और जिन में अब भी ज़िन्दगी की तमाम निशानियां हरकत में हैं। इन आकृतियों के रौशन चिन्ह हमारे दिल में गहरे पेवस्त हैं।

पहली नवंबर, 2012 को हमारे अज़ीज़ भाई सैयद मूसी रज़ा (पटना विश्वविद्यालय) हमें आज़माइश की मंज़िलों में तन्हा छोड़ गए। गोया छह दशकों की नज़दीकियां कुछ लम्हों में तारीकी में खो गईं। इस लम्बे अरसे में इनकी मुहब्बतें मौसम-ब-मौसम हमारी ज़िन्दगी के उतार-चढ़ाव में एक साए की तरह शामिल रही हैं। भाई तो एक अधूरा शब्द है। वो भाई से कहीं ज़्यादा रिश्ता बरतने और निभाने में यक़ीन रखते थे। उन जैसा आत्मीय व्यक्तित्व तलाश करना किसी कठिन काम को अंजाम तक पहुंचाना है।

जब-जब हमें ज़िन्दगी ने कामयाबियां बख़्शी और हमारे अज़ीज़ों को हमारी उपलब्धियों पर ख़ुश होने के मौक़े मिले, मूसी रज़ा हम पर मुहब्बत और ख़ुलूस की बारिश करते रहे। इस दौरान, कुछ तारीक लम्हे भी हमारी ज़िन्दगी में आए, जब हमने ख़ुद को बिल्कुल तन्हा पाया। ये लम्हे हमारे राजनीतिक-सामाजिक सरोकारों ने हमें दिए थे। यह ऐसा स्याह दौर था जब ख़ुद अपने घर के दरवाज़ों पर भी ताले पड़ जाते हैं और रिश्तेदार भी आंखें चुराने लगते हैं। उन दिनों हमारे ठिकानों पर पुलिस की दस्तकें आम बात हो गई थीं। हमारे राजनीतिक विरोधी हमारी गतिविधियों पर कड़ी नज़र गड़ाए रखते थे।

हम शरणार्थियों की तरह, यहां से वहां, इस शहर से उस शहर, इस गांव से उस गांव अपनी सियासी मुहिम पर हुआ करते थे। इस वक़्त धरती पर सिर्फ एक घर था, सिर्फ़ एक दरवाज़ा था, जिस पर भय और आशंकाओं के ताले नहीं जड़े थे। वो घर था हमारे भाई मूसी रज़ा और हमारी बहन ज़ीशान फातमी का, जहां मैं देर-सवेर, वक़्त-बेवक़्त, बेझिझक धमक पड़ता था। जहां न सिर्फ़ हमारे खाने-पीने, सोने-जागने का ख़्याल रखा जाता, बल्कि जहां हमें पुलिस की बेजा दख़ल अंदाज़ियों से सुरक्षित रखने का पुख़्ता इंतज़ाम भी होता था। यही नहीं, हमारी बहन और हमारे भाई घर से निकलते वक़्त पूरी तरह इत्मीनान कर लेते थे कि हमारे पास सफ़र और भूमिगत ठहराव का बोझ उठाने के लिए ज़रूरी पैसे हैं या नहीं। कुछ ख़ामोश निगाहों से दोनों हमारी तरफ़ देखते, हमारे कंधे पर हाथ रखते और यक़ीन दिलाते कि आज़माइशों का ये स्याह दौर बहुत जल्द गुज़र जाएगा।

आठवें दशक के आख़िरी दिनों में जब बिहार साम्प्रदायिक दंगों की आग में झुलस रहा था, पचास से ज़्यादा शहरों में एक साथ कफ़र्यू था, शांति और सद्भाव क़ायम करने के लिए हमारी कोशिशें तेज़ हो गई थीं। ख़तरों से दोचार ज़िन्दगी के तार कभी-कभी कांपने लगते थे। हम अपनी ज़िद के आगे किसी की सलाह मानने को तैयार नहीं होते। उस वक़्त मूसी रज़ा ही थे जो न सिर्फ़ हमारा उत्साह बढ़ाते बल्कि कंधे से कंधा मिलाकर हमारे साथ खड़े भी रहते।

अपनी अध्ययनशीलता, गंभीर चिंतन और समाज की पेचीदगियों की गहरी समझ रखने और दूसरों की हर संभव मदद करने के लिए अपने को परेशानी में डालने जैसी ख़ूबियों के कारण ही उन्होंने आम जन के बीच अपनी लोकप्रियता क़ायम की थी। उनकी इंसान-दोस्ती, रिश्तों को आख़िरी हद तक निभाने के उनके स्वाभाविक गुण हर पल न सिर्फ़ हमें याद आते रहेंगे, बल्कि हमारी आंखों को नम भी रखेंगे। एक बहुमूल्य व्यक्तित्व हमसे अचानक ही छिन गया।

कोई बताए कि हमारे शोक की हदें कहां हैं।

अभी-अभी, 8 अप्रैल, 2013 की शाम, फोन पर हमारे बड़े भाई अख़तर पयामी की मौत की ख़बर ने जैसे हमारी रूह हमारे जिस्म से अलग कर दी हो, और हमारी सांसों को बर्फ़ की सिल्लियों से पूरी तरह ढंक दिया हो। जिसे बाहों का ‘शल्ल’ होना कहते हैं, हम उसी कैफ़ियत से गुज़रे। हमारी आंखें शून्य में अटक-सी गईं। एक अंतहीन ख़ामोशी, एक पुरदर्द कुहराम ने हमारी चेतना पर साया कर लिया। आधी सदी पूर्व, सब के दर्द अपने सीने में छिपा लेने वाली हमारी मां की मौत के बाद यह दूसरा हादसा था, जिसने हमें शोक के गहरे समुद्र में डुबो दिया। ज़ख़्मी परिंदों की तरह हम अपने होश-हवास खोकर, अपनी अपनी जगह, साकित पड़ गए।

अदब और सहाफ़त की दुनिया में अख़तर पयामी एक बड़े शायर, एक बड़े सहाफ़ी के तौर पर हमेशा याद किए जाएंगे। इल्म और विवेक की रौशन राहदारियां मुद्दतों उन चिराग़ों से रौशन रहेंगी, जिनमें अख़तर पयामी ने अपना लहू उंडेल दिया था। इन चिराग़ों से ही इंसानी ज़िन्दगी के ऊंचे मूल्यों की हिफ़ाज़त के रास्ते खुलते हैं।

हमें यह कहने में कोई झिझक नहीं कि अख़तर पयामी के हवाले से परहेज़ करने वाला प्रगतिशील तहरीक का कोई भी इतिहास अधूरा ही माना जाएगा, चाहे उस इतिहास का लिखने वाला कितना ही महान क्यों न हो।

अख़तर पयामी जितने बड़े शायर और सहाफ़ी थे, उतने ही बड़े इंसान भी थे। उन्हें मरहूम कहते हुए कलेजा मुंह को आता है। वो हम से हज़ारों मील के फ़ासले पर ‘वादिए हुसेन’ (कराची) के एक गोशे में मौत की नींद सो रहे हैं। उन्हें दुनिया के दुखों से निजात मिल गई है। लेकिन हम, जो उन्हें अपने सृजन-आकाश का सबसे ज़्यादा रौशन सितारा मानकर अब तक जी रहे थे, हमारे लिए ये बड़ी विपदा की घड़ी है। काश ये विपदा जो इस वक़्त हम पर पड़ी है, हमारे सब्र और विश्वास की आख़िरी आज़माइश साबित हो!

याद आता है, दस वर्ष पूर्व, इसी मार्च-अप्रैल (2003) में अख़तर पयामी आख़िरी बार अपने वतन, हिन्दोस्तान, आए थे। तब उन्होंने पटना के अलावा राजगीर (उनका जन्म-स्थान), गया, शेखपुरा-हुसेनाबाद, मुज़फ़्फ़रपुर आदि शहरों का आख़िरी दीदार करने की इच्छा प्रकट की थी। मैं अपने तीन भाइयों और मूसी रज़ा के साथ इस सफ़र में शामिल था। नालंदा (राजगीर) और शेखपुरा की तंग गलियों से गुज़रते हुए मैंने उनकी आंखों में जो चमक देखी वो सचमुच हैरत में डालने वाली थी। उनके साथ मैं बरुई (शेखपुरा) भी गया, जहां, सदियों पूर्व, एक ग्वालन ने भूख-प्यास से बेहाल शेरशाह को अपनी गाय का मीठा दूध पिलाया था, और जिसकी याद में शेरशाह ने पहाड़ का सीना चीर कर ग्वालन और दूसरे गांववासियों के आने-जाने के लिए एक दर्रा (मार्ग) बनवा दिया था। कराची लौटकर, अख़तर पयामी ने ‘डॉन’ अख़बार के अपने कॉलम में इस यात्रा का बहुत ही मार्मिक संस्मरण लिखा था।

स्मृतियों के द्वार खोल देने पर ऐसी अनेक घटनाएं हमारे मन को और भी विचलित कर देंगी। तब अपने उदास मन को शांत करना और भी कठिन हो जाएगा।

एक बार, एक ख़त में, मेरी जनपक्षी राजनीतिक सक्रियताओं का ज़िक्र करते हुए अख़तर पयामी ने लिख दिया था – ‘तुम मेरे ख़ाबों की ताबीर हो।’ अक्सर सोचता हूं, क्या थे उनके ख़ाब! मैं उनके ख़ाबों के स्वर्णिम मानक पर ख़ुद को कहां ठहरा हुआ पाता हूं?

जाबिर हुसैन

साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित जाबिर हुसैन हिंदी और उर्दू में समान रूप से लेखन करते हैं। अंग्रेजी के प्रोफेसर रहे जाबिर हुसैन ने अपने जीवन की शुरुआत वामपंथी आंदोलन से की थी। जयप्रकाश आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने वाले जाबिर हुसैन एक संवेदनशील राजनेता भी हैं। लंबे समय तक आप बिहार विधान सभा के अध्यक्ष भी रहे। 

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