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तेजस्वी को चाहिए कि वह स्वयं इस्तीफा दे दें !

तेजस्वी यादव के इस्तीफे और बर्खास्तगी को लेकर बिहार के राजनीतिक गलियारों में आशंकाओं और कयासों का बाजार गर्म है. राजद ने अपना निर्णय सुना दिया है कि तेजस्वी यादव इस्तीफा नहीं देंगे. अब जनता दल यू को फैसला लेना है.

बीजेपी ने राजद के गठबंधन से अलग होने की सूरत में नातीश कुमार की सरकार को बाहर से समर्थन देने और बचाए रखने का मोहपाश फेंक दिया है. लेकिन नीतीश कुमार और उनकी पार्टी दोनों मौन हैं. नीतीश हर कदम फूंक फूंक कर उठानेवाले राजनेता के तौर पर जाने जाते हैं. हालांकि, यह भी सच है कि उनके सामने संकट की घडी है. एक गलत फैसला उनके राजनीतिक करियर और छवि को बर्बाद कर दे सकता है.

नीतीश कुमार दोराहे नहीं; तेराहे पर खड़े हैं. पहला ये कि तेजस्वी पर इस्तीफे के लिए दबाव न बनाएं और राजद के फैसले के साथ चलें. ऐसे में उनकी साफ़ सुथरी छवि भ्रष्टाचार के झोल में फंसती है, दूसरा रास्ता ये है कि बीजेपी का साथ लेलें, ऐसे में उनकी मौक़ा परस्त, सत्तालोलुप राजनीति छवि उभरती है. और तीसरा रास्ता यह है कि वह मध्यावधि चुनाव के लिए कमर कस लें. लेकिन नीतीश कुमार के लिए चिंता की बात यह है कि तीनों ही रास्ते उन्हें मनमाफिक दिशा में नहीं ले जाते हैं. और यही वजह है कि नीतीश कुमार चुपचाप परिस्थितियों को भांप रहे हैं. लेकिन यह राजनीतिक हालात सिर्फ नीतीश कुमार के लिए ही नहीं, खुद तेजस्वी के लिए भी दुविधापूर्ण हैं.

तेजस्वी यादव की छवि लालू यादव और परिवार से अलग है. भले मैट्रिक पास भी नहीं होने कीवजह से लोग उनकी आलोचना करें, लेकिन मंत्री के तौर पर अपने काम और प्रेस के सामने अपने संजीदा बयान से उन्होंने अपनी अलग, साफ़ और समझदार नेता की बनायी है. भ्रष्टाचार के जिस जाल में अभी तेजस्वी फंसे नजर आ रहे हैं, उसमें भी उनके पिताजी का ही योगदान है. लालू प्रसाद यादव, जो गरीब गुरबा और देहात की राजनीति करते बड़े हुए थे, देश की राजनीति के चौसर में ताकतवर बनने के बाद भ्रष्टाचार और कुशासन के पर्याय बन गए और नैतिकता के सारे मानदंडों को उन्होंने अपनी करनी से ही ध्वस्त किया.

लालू बेशक राजनीति के धुरंधर रहे हैं, लेकिन अब वक़्त की नब्ज पकड़ने में चूक कर रहे हैं. तेजस्वी को भ्रष्टाचार के दलदल में फंसाने वाले लालू ही हैं, और तेजस्वी का इस्तीफा रोककर वह उसे और भी दलदल में धंसा रहे हैं. आगे उनकी राजनीति खात्मे की ओर है, लेकिन तेजस्वी की राजनीतिक उम्र अभी बहुत लम्बी है. तेजस्वी ने अपने क्रियाकलापों और बयानों से अपनी संजीदा छवि गढ़ी है. लेकिन राजद का यह फैसला उस छवि को मलिन करता है.

यहां यूपी में अखिलेश यादव के साथ हुई घटनाएँ सबक के तौर पर पढ़ी जा सकती हैं. अखिलेश ने अपनी अलग और अच्छी छवि गढ़ी थी, लेकिन मुलायम और चाचा से दूर न जा सके या कहें कि जाने में बहुत देर कर दी और तबतक उनकी छवि की हवा निकल गयी. तेजस्वी को अगर आगे बढ़िया पारी खेलनी है तो खुद आगे बढ़कर पार्टी लाइन से हटकर इस्तीफा देकर गठबंधन और नीतीश कुमार दोनों को बचा लेना चाहिए.

नालंदा, बिहार के रहने वाले धनंजय कुमार पेशे से फिल्मकार हैं। वे मुंबई में रहते हैं। 

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