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थियेटर ओलंपिक फार्स है-आलोकधन्वा

 

“थियेटर ओलंपिक के नाम के नाम पर हम फार्स परोसा जा रहा है। आखिर देश के बड़े व संजीदा रंगकर्मी इस आयोजन में शामिल क्यों नहीं है ? इस प्रतिरोध सभा ने देश भर छाई चुप्पी को पहली बार इतने संगठित तरीके और लोकतांत्रिक तरीके से तोड़ा। इस मुद्दे पर सभी रंगकर्मियों की एकता बननी चाहिए।”

ये बातें प्रख्यात कवि व संगीत नाटक अकादमी के पूर्व अध्यक्ष आलोक धन्वा ने रंगकर्मियों-कलाकारों के साझा मंच ‘ हिंसा के विरुद्ध संस्कृतिकर्मी ‘ द्वारा थियेटर ओलम्पिक’ के खिलाफ कालिदास रंगालय में आयोजित प्रतिरोध में बोलते हुए कहा।

स्थानीय कालिदास रंगालय के सभागार में रंगमंच विरोधी थियेटर ओलम्पिक के खिलाफ हुए प्रतिरोध सभा में बड़ी संख्या में रंगकर्मी, कलाकार, साहित्यकार, सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हुए। । बिहार के विभिन्न जिलों हाजीपुर, खगौल, मुजफ्फरपुर आदि के रंगकर्मी भी इस प्रतिरोध सभा मे शामिल हुए।

सर्वप्रथम युवा रंगकर्मी राजन कुमार सिंह के प्रतिरोध सभा के पर्चे का पाठ करते हुए कहा ” नाटक विरोध की भाषा है और विरोध एक स्वच्छ, लोकतांत्रिक और संवैधानिक प्रक्रिया है जिसका सम्मान होना चाहिए। लेकिन अभी प्रेमचन्द रंगशाला में हो रहे आयोजन के पक्ष में रंगकर्मियों का आक्रामक होना चिन्ता का विषय है। ‘

विषय प्रवेश करते हुए मृत्युंजय शर्मा ने कहा.” पटना में थियेटर ओलंपिक का मकसद गलत है। ये हिंदुस्तान के जमीनी रंगकर्मियों को हीनतर बताना चाहती है। जो भी सीमित पैसा है उसे भी आने लोगों के बीच केंद्रित किया जा रहा है।” .

सर्वप्रथम युवा रंगकर्मी राजन कुमार सिंह के प्रतिरोध सभा के पर्चे का पाठ करते हुए कहा ” नाटक विरोध की भाषा है और विरोध एक स्वच्छ, लोकतांत्रिक और संवैधानिक प्रक्रिया है जिसका सम्मान होना चाहिए। लेकिन अभी प्रेमचन्द रंगशाला में हो रहे आयोजन के पक्ष में रंगकर्मियों का आक्रामक होना चिन्ता का विषय है।”

वरिष्ठ रंगकर्मी कुणाल झा ने अपने संबोधन में कहा ” रंगमंच एक प्रतिरोध की कला है। इसका यही मज़ा है। कैसे हो रहा है ये महत्वपूर्ण नही है एनएसडी जैसे संस्थान और ऐसे आयोजन पर उन्होंने सवाल उठाया और उसके प्रशिक्षण और कार्य प्रणाली को हवाबाजी करार दिया। इस संस्थान से लौटने के बाद वो अजीब श्रेष्ठता के बोध से ग्रसित होते हैं जाता है और आम रंगकर्मियों को कमतर आँकते हैं जैसे उन्हें कुछ नही आता। रंगमंच जनता की कला और उनके खुद के मनोरंजन के लिये है। रंगकर्मियों के प्रतिरोध भाव को मिटाने की साजिश सत्ता कर रही है और उसमे कामयाब है। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण इस तरह का आयोजन है।”

अनीश अंकुर ने अपने वक्तव्य में कहा, “आजाद भारत मे रंगमंचीय संप्रभुता के साथ समझौते को दर्शाता है थियेटर ओलंपिक। वर्तमान केंद्र सरकार आने साफ्ट पावर की योजना को आगे बढ़ा रही है। अंग्रेजों के ज़माने के कानून की तरह राष्ट्रविरोधी नाटकों को न शामिल करने की बात की जा रही है। अतीत की दक्षिणपंथी परिकल्पना को थियेटर ओलंपिक के ज़रिए बढ़ाया जा रहा है। पब्लिक प्राइवेट पार्टनीशिप की घातक मॉडल को रंगमंच में लागू किया जा रहा है। प्रसन्ना ने कहा था एक रंगकर्मी पर एन एस डी एक करोड़ रुपये खर्च करती हैं वही एक सामान्य रंगकर्मी पर मात्र 15 पैसा।”

युवा रंगकर्मी अजित कुमार ने कहा कि ” इस तरह के आयोजन को विकेन्द्रित करने के साथ युवाओं को ज्यादा मंच देने देने की जरूरत है। हमारे वरिष्ठ रंगकर्मियों ने रंगमंच के किसी मुद्दे पर बिहार का साथ नहीं दिया। विरोध को व्यक्तिगत बनाने की आज ज्यादा कोशिश हो जाती है। वरिष्ठ है तो उन्हें अपनी जिम्मेदारी का एहसास होनी चाहिए और ज्वलन्त मुद्दे पर हमारे साथ खड़ा हों। हमें विरोध करने का हक़ है आप इस दायरे में आते हैं तो आपका भी होगा।”

संस्कृतिकर्मी सुमन्त जी ने कहा ” अभिव्यक्ति के माध्यम पर लगातार हमले बढ़ती जा रही है। राष्ट्रविरोध और अश्लील चीजों को शामिल नहीं करने की घोषणा ही इसके प्रासंगिकता पर सवाल खड़े करती है। ये निरंकुश सत्ता किसान, आम आदमी, साहित्यकार और कलाप्रेमी के लिये बेहद संवेदनहीन है। इस लड़ाई को जारी रखने की जरूरत है। ”

नवाब आलम ने कहा ” करोड़ों का बंदरबांट हो रहा है, इसका विरोध पहले क्यों नहीं किया गया? रंगमंच को हम कहाँ ले जाना चाहते हैं। इसका विरोध होना जरूरी है। खगौल में रंगमंच का बंदरबांट हो गया बौद्धिकता का आज ह्रास हो गया है। इन कमजोरियों को दूर किये बिना रंगकर्मियों की समस्या खत्म नही होगी। मूलभूत सुविधाएं नही हैं उसपर काम होने की आवश्यकता है। इस आयोजन के बहाने हम संगठित हुए हैं इसे बरकरार रखा जाए। ”

अरुण मिश्रा ने कहा, “बाज़ारवाद के सम्बंध में उन्होंने बताया कि इससे लड़ाई व्यक्तिवादी होकर नही लड़ी जा सकती है। संघर्ष में सरकारी पैसे की खपत शिक्षण में होनी चाहिये।”

खगौल से उदय कुमार ने कहा की ” रंगकर्मी दो प्रकार के होते हैं एक सरकारी और दूसरा असरकारी। हमें तय करना है कि आप किस तरफ हैं।”

महिला रंगकर्मी अंजली ने “ओलंपिक के पटना में होने वाले क्रियान्वयन पर कई सवाल उठाए, जिसके तहत प्रेमचंद रंगशाला की बदहाली के बारे में बात की। “प्रतिरोध सभा को हाजीपुर के वरिष्ठ रंगकर्मी क्षितिज प्रकाश, युवा रंगकर्मी सिकंदर आज़म,विवेक, ने भी संबोधित किया। सभा में भारतीय मैत्री व सांस्कृतिक सहयोग के रवींद्र नाथ राय, सतीश , सुनील कुमार, राजवीर गुंजन, पारस, संजय कुमार सिंह, नीरज, नूपुर चक्रवर्ती आदि मौजूद थे। प्रतिरोध सभा का संचालन युवा रंगकर्मी जयप्रकाश ने किया।

प्रतिरोध सभा में शाहजहांपुर में ‘गाय’ नाटक को फासिस्ट कार्रवाई, हिंदी भवन को कलेक्टेरियत , और बिहार सरकार द्वारा संस्कृति के संबंध में बजट कम जिये जाने के विरुद्ध प्रस्ताव वास किया गया। अंत में स्टीफन हॉकिंग, मूर्तिकार जयनारायण सिंह, और अभिनेता नरेंद्र झा की याद में दो मिनट का मौन रखा गया।

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