+91 943 029 3163 info@biharkhojkhabar.com

दिल्ली में किसान मुक्ति संसद

राजधानी दिल्ली के संसद मार्ग पर किसानों की रैली दिनभर जमी रही अौर लगातार अपनी बात कहती रही. रैली इस अर्थ में नयी थी कि उसमें 184 किसान संगठनों ने शिरकत की थी. जैसी टूट राजनीति के मंच पर है, वैसी ही टूट किसानों के मंच पर भी है. हमारे सारे जन-अांदोलन अापस में भी अौर एक-दूसरे के साथ भी इस कदर टूटे हुए हैं कि न अावाज एक हो पाती है, न निशाना! टूट की यह त्रासदी उन सबको भीतर-भीतर एक किये देती है, जिनसे लड़ने का खम भरते हैं ये अांदोलन!

आज किसान दुखी है, क्योंकि हर तरह से, हर तरफ से उसे दुखी करने की कोशिशें जारी हैं. हर किसी के पास किसानों के नाम पर बहाने के लिए अांसू हैं, पर कोई अपनी अांखों का कोर भी भिगोना नहीं चाहता है. ऐसी त्रासदी में असंगठित किसानों का एकजुट होना अौर राजधानी पहुंचकर दस्तक देना ध्यान तो खींचता ही है. यह देखना भी हैरान कर रहा था कि रैली में चल-चलकर संसद मार्ग पर पहुंची महिलाअों की संख्या खासी थी, जो वहां किसान महिलाअों के रूप में अायी थीं. हम, जो किसानों का स्वतंत्र अस्तित्व कबूल करने को भी बमुश्किल तैयार होते हैं, महिला किसानों का यह स्वरूप, उनकी दृढ़ता व साहस भरी जागरूकता से हैरान-से थे.

हमारे देश में महिलाअों व बच्चों का कोई अस्तित्व नहीं मानता है. लेकिन, यहां मौजूद किसान महिलाएं ऐसी नहीं थीं. वे थीं- अपनी वेदना, दर्द अौर दमन सबको संभालती, पीती हुई अपनी बातें कहे जा रही थीं.

किसान महिलाअों की संसद वहीं संसद मार्ग पर बैठी थी अौर उस संसद की अध्यक्ष मेधा पाटकर बार-बार भर अाता अपना गला अौर बार-बार उमड़ अाती अपनी अांखें बचाती-छुपाती हमें अहसास कराना चाह रही थीं कि ये बहनें नहीं हैं, किसान महिलाएं हैं, जो लड़ाई की सिपाही हैं. यहीं कहीं पीछे से नरेंद्र मोदी के कांग्रेस मुक्त भारत या नीतीश कुमार के संघ व शराब मुक्त भारत की पैरोडी भी याद अा रही थी.

हमारा राजनीतिक प्रशिक्षण इस तरह हुअा है कि हम किसान को भी एक वर्ग मानकर, उसे उसके लाभ के सवाल पर संगठित कर लड़ाई में उतारना चाहते हैं. किसानों को लुभाने-भरमाने के लिए भाजपा ने कहा कि वह स्वामीनाथन अायोग की सिफारिशों को लागू करेगी अौर फसल की लागत की दोगुनी कीमत देगी.

यह सीधा सौदा था, जिसकी व्यवहारिकता या शक्यता पर किसी ने विचार नहीं किया अौर भाजपा की झोली वोटों से भर गयी. तब भी ये ही नेता थे अौर ये ही किसान संगठन थे. भाजपा ने अपनी जीत पक्की कर ली, सरकार बना ली अौर फिर यह सच्चाई बयान कर दी कि उसने चुनाव के वक्त जो कुछ कहा वह सब जुमलेबाजी थी.

भाजपा से पिटने के बाद किसान नेताअों ने उन जुमलों को ही नारा बना लिया अौर कर्जमाफी, स्वामीनाथन अायोग की सिफारिशें तथा लाभकारी मूल्य की मांग खड़ी कर किसानों को अपने झंडे के नीचे जमा करने लगे. एक तरह की राजनीतिक होड़ शुरू हुई, जिसमें किसान कम, किसान नेता ज्यादा हावी हो गये. किसान नेता पार्टियों में टूटे हैं, वे वोटों का सौदा करते हैं, वे भी खुले या छुपे तौर पर नाम व नामा की होड़ में लगे हैं. राजस्थान के कोटा की एक सभा में एक किसान ने पूछा कि भाईजी, किसान है कहां यहां? यहां मैं हूं, जो भाजपा का किसान हूं; अाप कांग्रेस के किसान हैं अौर वह बसपा का किसान है!

बात यह है कि अाज देश को अौर इसके लोकतंत्र को किसान अांदोलन की जरूरत नहीं है. उसे जरूरत है एक सर्वस्पर्शी जनांदोलन की, जिसका नेतृत्व किसान करे. क्योंकि लड़ाई क्या है अौर किसके बीच है? यह लड़ाई सभ्यताअों के बीच है, जिसे वर्गों या पेशों में इस कदर उलझा दिया गया है कि हम असली लड़ाई अौर असली सिपाही की पहचान भूल गये हैं.

अगर लड़ाई अपने लिए सुविधा या अधिकार का एक छोटा टुकड़ा मांग लेने या छीन लेने की है, तो यह वर्गीय लड़ाई या पेशों की लड़ाई ठीक ही है. तब किसान भी इतना ही मांगेंगे कि उन्हें कर्जों से माफी मिल जाये अौर लागत कीमत मिल जाये; बैंक या हवाई सेवाअों के अधिकारी भी अपना वेतन बढ़वाने की मांग ले कर हड़ताल पर उतरेंगे अौर अालू-प्याज के अाढ़ती कीमतों के छप्पर फाड़कर निकल जाने का अौचित्य बता देंगे अौर फिर कीमत दो-एक रुपये उतर अाने को हम भी बड़ी राहत मानकर कबूल कर लेंगे. सांसद अौर विधायक अौर देश की सबसे ऊंची कुर्सियों पर बैठे नौकरशाह सभी अपना-अपना वेतन बढ़ाते रहेंगे अौर हमें सबको स्वीकार कर चलना होगा.

यह लड़ाई खेतिहर सभ्यता अौर अौद्योगिक सभ्यता के बीच है. हमारा देश खेतिहर सभ्यता का देश है. इसका अौद्योगिक विकास भी खेतिहर सभ्यता को केंद्र में रखकर ही किया जा सकता है.

खेतिहर सभ्यता मतलब मात्र किसान नहीं, पूरा खेतिहर समाज. वे सारे लोग, सारी प्रणालियां, पशु-पक्षी, जो खेती से जुड़े हैं, इस लड़ाई के केंद्र में हैं. परिवर्तन का यह अांदोलन खेतिहर परिवार के नेतृत्व में चलेगा, तभी परिणामकारी होगा. तब यह लड़ाई कर्जमाफी की नहीं होगी, बल्कि खेती-किसानी कर्ज के बिना कैसे हो, इसकी खोज की होगी अौर ऐसी व्यवस्था बनाने की होगी कि जिसमें किसान को भाव मांगने की जरूरत नहीं होगी, बल्कि उसे उसके जीवनयापन की सारी सुविधा अौर सारे अवसर समाज द्वारा सुनिश्चित होंगे.

खेती-किसानी वह पेशा या नौकरी नहीं है कि जो हर साल हड़ताल करे अौर इस या उस पार्टी का दामन थामे, ताकि उसकी उपयोगिता का अाकलन करने के लिए अायोग बैठे अौर किसान कमीशन भी बनाया जाये. यह हमारे अस्तित्व का अाधार है. हम अपनी तमाम भौतिक सुविधाअों के बावजूद खेती पर निर्भर रहते हैं.

इसलिए ऐसा समाज बने, जो खेती-किसानी को केंद्र में रखता हो. किसान न तो ऐसी भूमिका ले पा रहे हैं, न ऐसी भूमिका के लिए उन्हें तैयार किया जा रहा है. इसलिए सारे किसान अांदोलन एक सीमित दायरे में अपने लाभ-हानि की बात करते हैं अौर मजदूर यूनियनों का चरित्र अोढ़ लेते हैं. व्यवस्था इन्हें उसी तरह लील जाती है, जिस तरह उसने सारा मजदूर अांदोलन लील लिया है.

किसान अपनी जमीन से उखड़ा हुअा अौर अौद्योगिक इकाइयों की छाया में जीनेवाला मजदूर नहीं है. वह अपनी जमीन से जुड़ा अौर जमीन से जीवन रचनेवाला स्थायी समाज है. वही खेतिहर सभ्यता का अाधार है. हम राजा को याचक बनाने की गलती कर रहे हैं, जो विफल भी होगी अौर सत्वहीन भी बनायेगी.

कुमार प्रशांत
गांधीवादी विचारक
साभार: प्रभात खबर

Related Posts

Leave a Reply

*