+91 943 029 3163 info@biharkhojkhabar.com

दोआबा: अपनी ही आवाज़ को सुने जाने वाली पत्रिका

आज उन्माद को बेहद करीने से सजाकर हमारे सामने रखा जा रहा है। हम हैं कि उन्माद को उठाकर इस तरह चल-फिर रहे हैं जैसे उन्माद हमारा सच्चा हमदम हो। आज की राजनीति हमें यही सब करने के लिए सीखा रही है, परदे के पीछे छिपकर नहीं बल्कि सामने से। आज की राजनीति का यह दमघोंटू पैंतरा हम ख़ूब आज़मा भी रहे हैं, अपने ही किसी भाई, अपने ही किसी साथी, अपने ही किसी रिश्तेदार पर। तब भी एक आवाज़ है, जो हमें ऐसा करने से रोकती रही है। यह आवाज़ हमारे आज के साहित्य की आवाज़ है। साहित्य हमारा हमेशा से सच्चा दोस्त रहा है, और राजनीति हमेशा हमारी दुश्मन।

दुनिया के ख्यात कवियों में शुमार कवि बेन ओकरी ने कहा भी है : उस दुनिया में, जहाँ बंदूक़ों की होड़ लगी हुई है, बम-बारूदों की बहसें जारी हैं, और इस उन्माद को पोसता विश्वास फैला है कि हमारा पक्ष, हमारा धर्म, हमारी राजनीति ही सही है, दुनिया युद्ध की ओर एक घातक अंश पर झुकी हुई है। बेन ओकरी का कहा यह एक दुष्कर सत्य है।

इस सत्य को लिखते हुए कितना कष्ट हुआ होगा बेन ओकरी को, यह आप ना भी समझें, मैं ख़ूब समझता हूँ। मेरे मन में यह विचार ‘दोआबा’ का तेईसवाँ अंक पढ़कर आ रहा है। ‘दोआबा’ हिंदी-उर्दू के प्रसिद्ध कवि-कथाकार जाबिर हुसेन के संपादन में निकलने वाली ऐसी पत्रिका है जिसका प्रत्येक अंक अपने समय से संगत करता है।

‘दोआबा’ यह नया तेईसवाँ अंक भी इतना सुंदर, सार्थक, मूल्यवान है कि अंक की हर रचना ख़ुद को पढ़े जाने की दावत देती है। इस अंक में विश्व-कथा से फ्रैंज़ काफ़्का की कहानी ‘उपवास करने वाला कलाकार’, ग्रैबिएल गार्सिया मार्खे़ज़ की कहानी ‘दुनिया का सबसे रूपवान डूबा हुआ आदमी’, लायम ओ’ फ़्लैहर्टी की कहानी ‘छिपा हुआ निशानची’, निकोलाई तेलेशोव की कहानी ‘द्वंद्व-युद्ध’, लुइगी पिरांदेलो की कहानी ‘जिगरी यार’ तथा जूलियो कोर्टाज़ार की कहानी ‘एक पीला फूल’ छापी गई है।

इन सारी कहानियों का अनुवाद कवि-कथाकार सुशांत सुप्रिय ने बड़े मनोयोग से किया है। इन कहानियों को पढ़ते हुए ऐसा कहीं पर नहीं लगता कि हम अनूदित कहानियाँ पढ़ रहे हैं। इन कहानियों को पढ़ते हुए यही लगता रहता है कि हम मूल हिंदी कहानियों को पढ़ने का आस्वाद ले रहे हैं। ये सारी कहानियाँ उन स्थितियों-परिस्थितियों की हैं, जो विश्व भर में आदमी के साथ घटित होती रहती आई हैं। ये सारी कहानियाँ बेहद काव्यात्मक हैं।

भारतीय कथाकारों में उद्भ्रांत की कहानी ‘अजीता का नगला’, उषाकिरण खान की कहानी ‘किसी नज़र को तेरा इंतज़ार आज भी है’ तथा शर्मिला बोहरा जालान की कहानी ‘तलछट’ को शामिल किया गया है। ये तीनों कहानियाँ हमारे जीवन के अँधेरे और उजाले से भरे कोनों को बारीकी से दिखाती हैं।

इन सब कहानियों से अलग पत्रिका के संपादक जाबिर हुसेन की अपनी बात के बहाने उनकी एक कथा-डायरी ‘रामसकल बस्ती नहीं छोड़ेगा’ छापी गई है। यह कथा-डायरी इतनी संवेदनशील, इतनी मर्मस्पर्शी, दिल को छू लेने वाली है कि हम इस कथा-डायरी को पढ़ते वक़्त यह महसूस करते हैं कि यह हमारे ही जीवन का कोई दीर्घ गीत है, जिसे हमीं गाते हुए जीवन के रणक्षेत्र में उतर रहे हैं।

दरअसल एक उम्दा कथा-रचना की पहचान यही है कि वह पढ़े जाते समय पढ़ रहे आदमी की अपनी कथा-रचना लगे, और यह सच है कि जाबिर हुसेन की कथा-रचना पढ़ते हुए पढ़ रहा आदमी यही महसूस करता आया है कि यह कथा-रचना उसी के जीवन के अकल्पित हिस्से से ले ली गई है।

इन कहानियों के साथ-साथ हिलाल अहमद का हम सबके प्रिय लेखक अजितकुमार पर लिखी स्मरण-कथा हम पर अपना गहरा असर छोड़ती है इसी क्रम में कंवल भारती का संस्मरण ‘अब्दुल हई : जिनसे मैंने कुछ जाना’ अपनी ही आवाज़ को जानने जैसा मुझे लगा।

समकालीन हिंदी कविता-समय से ‘दोआबा’ के इस अंक में जिन कवियों-कवयित्रियों का चयन किया है, वे सुधीर सक्सेना, राजकिशोर राजन, अनिल विभाकर, नंदिता राजश्री, रंजना श्रीवास्तव, निर्देश निधि, देवांशु पाल, महेश वर्मा, नीरज कुमार नीर और नित्यानंद गायेन हैं। इन कवियों-कवयित्रियों की कविताओं से गुज़रते वक़्त यही लगता है कि ये कविताएँ उस बहते हुए पानी जैसी हैं जिस पानी को पीकर हम अपने को ताज़ादम महसूसते हैं और इस पानी से आपका रिश्ता गहरा होता जाता है।

संवाद-खंड में लक्ष्मी पाण्डेय, आबिद सुरती, क़ासिम ख़ुर्शीद, पारो शैवलिनी, संजीव श्रीवास्तव की समीक्षाएँ आकर्षित करती हैं। सच पूछिए तो ‘दोआबा’ के इस अंक में छपीं रचनाओं को पढ़कर यही लगा कि ये रचनाएँ आदमी के घावों को ठीक करने में कारगर सिद्ध होती हैं। ख़ासकर आदमी के उन घावों को जिन्हें एक सच्चा लेखक ही देख पाता है जिस आदमी के जिस्म पर घाव है, ना वह देख पाता है और आप देख पाते हैं।

दोआबा / संपादक : जाबिर हुसेन / संपादकीय संपर्क : 247 एम आई जी, लोहियानगर, पटना-800020, मोबाइल : 09431602575, ईमेल : doabapatna@gmail.com / मूल्य : 50

शहंशाह आलम
जन्म : 15 जुलाई, 1966, मुंगेर, बिहार।
शिक्षा : एम. ए. (हिन्दी) 
प्रकाशन : ‘गर दादी की कोई ख़बर आए’, ‘अभी शेष है पृथ्वी-राग’, ‘अच्छे दिनों 
में ऊंटनियों का कोरस’, ‘वितान’, ‘इस समय की पटकथा’ पांच कविता-संग्रह 
प्रकाशित। सभी संग्रह चर्चित। ‘गर दादी की कोई ख़बर आए’ कविता-संग्रह बिहार 
सरकार के राजभाषा विभाग द्वारा पुरस्कृत। ‘मैंने साधा बाघ को’ कविता-संग्रह 
शीघ्र प्रकाश्य। ‘बारिश मेरी खिड़की है’ बारिश विषयक कविताअों का चयन-संपादन। 
‘स्वर-एकादश’ कविता-संकलन में कविताएं संकलित। ‘वितान’ (कविता-संग्रह) पर 
पंजाब विश्वविद्यालय की छात्रा जसलीन कौर द्वारा शोध-कार्य।
हिन्दी की सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाअों में कविताएं प्रकाशित। बातचीत, 
अालेख, अनुवाद, लघुकथा, चित्रांकन, समीक्षा भी प्रकाशित।
पुरस्कार/सम्मान : बिहार सरकार के अलावे दर्जन भर से अधिक महत्वपूर्ण 
पुरस्कार/सम्मान मिले हैं।
संप्रति, बिहार विधान परिषद् के प्रकाशन विभाग में सहायक हिन्दी प्रकाशन।
संपर्क : हुसैन कॉलोनी, नोहसा बाग़ीचा, नोहसा रोड, पेट्रोल पाइप लेन के 
नज़दीक, फुलवारीशरीफ़, पटना-801505, बिहार।
मोबाइल : 09835417537
ई-मेल : shahanshahalam01@gmail.com

 

Related Posts

Leave a Reply

*