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नरेन्द्र मोदी की इजराइल यात्रा: एक जरूरी यात्रा

नरेन्द्र मोदी इजराइल जाने वाले पहले प्रधानमंत्री हैं. इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेत्यान्हू ने मोदी की इजराइल यात्रा को ऐतिहासिक और बहुप्रतीक्षित बताया. बेंजामिन ने नरेन्द्र मोदी को वर्ल्ड लीडर कहके संबोधित किया ! लेकिन भारत के मोदी विरोधी लोग इस संबोधन से भी खुश नहीं हैं. विपरीत विचारधारा के लोगों का मानना है कि मोदी का इजराइल जाना भारत की विदेश नीति को कमजोर और अरब देशों के साथ के संबंधों को तल्ख़ बनाएगा. भारत के मुसलमानों में भी गलत मैसेज जाएगा. लेकिन मोदी या उनकी पार्टी बीजेपी ऐसा नहीं मानते. मुझे भी मोदी की इस यात्रा में कोई बुराई नहीं दिखती.

इजराइल के साथ भारत का सम्बन्ध नरेन्द्र मोदी या बीजेपी का शुरू किया हुआ नहीं है. नेहरू जो गुटनिरपेक्ष आन्दोलन के प्रणेता थे, उन्होंने ही इजराइल को 1950 में देश के तौर पर मान्यता दी थी. फिर 90 के दशक में नरसिम्हा राव की अगुवाई वाली कांग्रेसी सरकार ने इजराइल के साथ राजनयिक सम्बन्धों की शुरुआत की.

इतिहास बताता है कि 62 के भारत चीन युद्ध के दौरान हमने इजराइल से सामरिक मदद मांगी और इजराइल ने हमारी मदद की. बाद के युद्धों में भी इजराइल से हमने मदद मांगी और इजराइल ने हमारी मदद की. लेकिन अबतक हमारे सम्बन्ध ढंके छुपे थे. हम इजराइल से मदद लेते थे, उससे हथियार खरीदते थे, लेकिन संबंधों का इजहार नहीं करते थे. वैचारिक और भावनात्मक स्तर पर हम फिलीस्तीन के साथ रहे. क्यों ?

मानवीयता को बचाने के लिए ? नहीं ; अरब देशों और सोवियत संघ के साथ संबंधों को बचाए रखने के लिए. साफ़ शब्दों में कहें तो डर के मारे ऐसा करते रहे. इन सबसे हमारे सम्बन्ध खराब हो जायेंगे तो चीन और पाकिस्तान की दुश्मनी से भारत को बचाने में कई तरह की मुश्किलें आयेंगी.

नेहरू की रणनीति अपनी जगह सही थी. लेकिन 90 के बाद दुनिया बदल गयी. दुनिया घर से बाजार बन गयी. दुनिया के तमाम देशों का पहला लक्ष्य अपने अपने देशों के उद्योगपतियों के लिए बड़े से बड़ा बाजार उपलब्ध कराना हो गया.

भारत दुनिया का सबसे बड़ा उपभोक्ता देश है. मोबाइल से लेकर हथियार तक हम दुनिया के बाजारों से खरीदते हैं. चीन के आम उपयोग के सामानों से हमारा बाजार पटा है. हथियारों की खरीदारी अमेरिका, रूस और इजराइल से करते हैं. ये सबको पता है. अरब को भी पता है कि हिन्दुस्तान उसके तेल का सबसे बड़ा ग्राहक है. ऐसे में भावनात्मक रिश्तों से ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है हमारा व्यापारिक रिश्ता. और जब देश हित की बात करते हैं तो सबसे ऊपर हो जाता है कूटनीतिक रिश्ता.

इजराइल और इजराइल के बाद जर्मनी जाने का निर्णय नरेन्द्र मोदी की कूटनीतिक समझदारी को दर्शाता है. मित्र डर डर कर जीने का वक्त अब ख़त्म हो चुका है, ये समझना होगा. पाकिस्तान रोज हमारी पंख नोचने में लगा रहता है तो इसलिए कि हम अब भी चीन के साथ हार के भय से उबर नहीं पाए हैं. हमें इस भय से निकलना होगा. अगर आपको लगता है कि चीन से युद्ध हम सह नहीं सकते, तो क्या चीन युद्ध सहने की स्थिति में है ? चीन हथियारों का सौदागर नहीं है. उसे भारत में मोमबती और दीये तक बेचने हैं ! इसलिए उसकी बन्दर घुड़की से भारत को डरने के बजाय मुस्कुराने की जरूरत है.

और यह मुस्कराहट तभी आयेगी, जब हम दुनिया के व्यापारियों को अपने स्तर पर तोलने मोलने की स्थिति में होंगे. व्यापारी किसी भी ग्राहक को अछूत नहीं मानता. वह सबको अपना सामान बेचता है. तो ग्राहक क्यों किसी ख़ास बनिए के साथ बंधा रहे ? !

इस नई रणनीति को समझिये और एंज्वाय कीजिए. जय हिन्द !!

नालंदा, बिहार के रहने वाले धनंजय कुमार पेशे से फिल्मकार हैं। वे मुंबई में रहते हैं। 

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