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नीतीश, इस इमारत को आप बचाएं !

पटना के डाकबंगला चैराहे से गुजरते हुए लोगों के कदम रिजवान कैसल को देख अब भी ठिठक जाते हैं। गोथिक शैली में बनी यह इमारत आसपास उग आये कंक्रीट के जगल के बीच ‘ओएसिस’ की तरह दिखता है।

पिछली सदी के दूसरे दशक में इन्डो-ब्रिटिश आर्किटेक्चर के मशहूर विशेषज्ञ   फिलिप डेविस अपने शोध के क्रम में पटना आये थे। उन्होंने अपनी पुस्तक ‘ब्रिटिश आर्किटेक्चर इन इंडिया, 1660-1947’ में रिजवान कैसल के बारे में लिखा है-पटना के बाहर बांकीपुर में गोथिक शैली में बनी एक शानदार इमारत (किला) है। इस इमारत में मुंडेर, बाहर की ओर निकले टावर, उसमें बनी सीढ़ियां और बाहर से ढ़की धुनषाकार खिड़कियां है। प्रवेश द्वार पर बना खूबसूरत पोर्टिको की संरचना न तो पूरी तरह यूरोपियन है और न ही हिन्दुस्तानी।

रिजवान कैसल जिस जमीन पर बना है, वह मशहूर स्वतंत्रता सेनानी मजहरूल हक की थी। जब सैयद हसन इमाम ने इसे खरीदा तब इस पर एक इमारत प्लिंथ तक बनी हुई थी। हसन इमाम ने इसकी संरचना में परिवर्तन करते हुए ब्रिटिश-स्कॉटिश शैली में एक नया किला बनवाया। इसे नया नाम मिला-रिजवान कैसल।

यद्यपि यह एक किला है, किन्तु आम तौर पर किले के साथ बनी सीधी ढाल, पुश्ता, सीढ़ी, किले के दीवार से लगा खुलने वाला दरवाजा, चैकीदार का घर, प्राचीर, बुर्ज, भीतरी और बाहरी खाई इत्यादि नहीं है। फिर भी चैकीदार का घर, किले की बाहरी दीवार, मुंडेर और उत्तर और दक्खिन में बनी दो सीढ़िया मुख्य भवन में ही बने हैं।

इमारत के बीच में गोथिक शैली में बना एक पोर्टिको है। सामने के बरामदे में पोर्टिको के दायीं और बायीं और दो नुकीले मेहराब बने हैं। इमारत के मुख्य हाॅल और प्रत्येक लिविंग रूम में बाहर से ढ़की गोथिक शैली में बनी खिड़कियां हैं। उनपर क्राॅस के निशान हैं। इस तरह की खिड़कियां भवन के प्रत्येक हिस्से में है। इमारत का पिछला हिस्सा भी कमोबेश आगे की तरह ही बना है। अहाते में एक वाटर टावर भी बना है। यह पटना हाईकोर्ट के निकट बने वाटर टावर की तरह ही है। किन्तु उससे थोड़ा छोटा। पूरी तरह उपेक्षित यह इमारत अभी भी भव्य दिखता है।

सन् 1912 ई0 में पटना में हुए ऐतिहासिक कांग्रेस अधिवेशन में इस किले ने कई महत्वपूर्ण मेहमानों की मेजबानी भी की थी। इस किले के मालिक सैयद हसन इमाम अपने वक्त के मशहूर अधिवक्ता और स्वतंत्रता सेनानी थे। इंगलैंड में पढ़ाई पूरी करने के बाद वे कलकत्ता हाईकोर्ट में 1916 तक जज रहे। 1916 में जब पटना हाईकोर्ट का गठन हुआ तो उन्होंने अपना तबादला पटना करवाना चाहा। किन्तु ब्रिटिश सरकार ने उनका तबादला नहीं किया। नाराज हो उन्होंने नौकरी छोड़ दी।

हसन इमाम पटना हाईकोर्ट में वकालत करने लगे। शीघ्र ही उनकी वकालत चल निकली। उन्होंने नाम के साथ खूब पैसे भी कमाये। पटना में उन्होंने इसके अतिरिक्त कई और भी आलीशान मकान बनवाया। जैसे-नशेमन, सिल्वर वुड, शान्तिनिकेतन, हसन मंजिल इत्यादि। इतनी समृद्धि उन्हें अभिमानी भी बना सकता था। किन्तु इसके विपरीत वे बहुत ही नम्र और उदार थे। वे सदा दूसरों की मदद के लिए तत्पर रहते थे। उनकी दानशीलता के कई किस्से भी हैं।

एक बार पटना हाईकोर्ट के एक निम्नवर्ग के कर्मचारी की मौत हो गई। उसके लड़के के पास अपने पिता की अंतिम क्रियाकर्म के लिए भी पैसे नहीं थे। वह हसन इमाम के पास आया। उसकी दयनीय अवस्था देख उन्होंने न केवल उसी वक्त उसे 500 रूपये दिये बल्कि भविष्य में भी मदद का आश्वासन दिया।

वे प्रतिदिन भिखारियों को चवन्नी दिया करते थे। उनका मानना था कि चार आने से कम में किसी भी व्यक्ति का पेट नहीं भर सकता। वे स्वयं मुसलमान थे, किन्तु उनके कर्मचारियों में बंगाली हिन्दू अधिक थे।

वे देशभक्त थे। अपने देश के सम्मान की चिंता उन्हें हमेशा रही। वे अंग्रेजों के तानों को बर्दाश्त नहीं करते थे। एक बार कोर्ट में जिरह के दौरान जज एफ.आर. रो ने उनपर टिप्पणी की, ‘मि. इमाम आप बकवास कर रहे हैं।’ हसन इमाम ने तत्काल ही उत्तर दिया, ‘मी लाॅड, मैंने इस तरह की टिप्पणी आपके बारे में भी कई लोगों से सुना है।’ जज सुनकर स्तब्ध रह गए। उन्होंने इस तरह की टिप्पणी फिर कभी नहीं की।

एक बार हसन इमाम रेलगाड़ी से रांची जा रहे थे। उसी बोगी में बिहार और उड़ीसा सरकार के तत्कालीन सचिव मि. क्लेटन भी थे। उन्होंने हसन इमाम के साथ बदसलूकी की। पटना लौटकर हसन इमाम ने उनपर मानहानि का मुकदमा ठोक दिया। उन्होंने मुआवजे में बड़ी रकम रखी। अंततः मि. क्लेटन को माफी मांगनी पड़ी। अपमानित मि. क्लेटन इस घटना से बुरी तरह आहत हो गए। आखिरकार उन्होंने नौकरी छोड़ दी और वापस इंगलैंड चले गए।

फिलवक्त इस शानदार ईमारत की हालत अत्यंत दयनीय है। भू-माफियायों की गिद्ध दृष्टि इस पर लगी है। अगर वक्त रहते सरकार इसे अधिगृहित नहीं करती है तो यह ऐतिहासिक और वास्तुशिल्प के लिहाज से अतुलनीय ईमारत इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह जायेगा।

 

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