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नीम की सीढ़ीदार शाख़ों पर एक-एक बैठे तोते~ संदर्भ: पंखुरी सिन्हा की कविताएँ

         पानी को जगह चाहिए होती है

          बहने की

          कुछ वैसे ही

          या शायद उससे ज़्यादा

          जितनी हमें, तुम्हें चाहिए होती है

          जगह रहने की

 

         त्म हो गया है

          सबकी आँखों का पानी

 

          उसमें वही भूख है

          जो कुतर  है

          घास, पत्ते, टूसे, फुनगी, कोंपलें और प्रेम

                                                                – पंखुरी सिन्हा

 बेन ओकरी का कविता को लेकर ख़्याल है, ‘कविता हमारे भीतर एक अंतर्संवाद पैदा करती है। यह हमारे अपने सत्य के प्रति एक निजी यात्रा का प्रस्थान होती है।’ कविता को निकट से देखिए, महसूसिए, समझिए तो बेन ओकरी का कहा सच लगेगा कविता के हर दीवाने को। तभी कोई कविता ( अच्छी वाली कविता ) आप पढ़ते-सुनते हैं तो कविता अरसे तक आपसे संवाद करती दिखाई देती है। और आप भी उस कविता को अरसे तक मिस करते रहते हैं। आप ऐसा ना भी करते हों। मैं तो मिस करता हूँ। मेरे आसपास कोई नहीं होता तो कई कविताएँ मुझसे संवाद करती हैं। उन कविताओं में आपकी भी कविता हो सकती है। कविता का बतियाना ऐसा है कि कोई सूफ़ी बतिया रहे हैं या कोई दरिया या कोई पहाड़ या कोई दरख़्त या कोई घर या कोई सन्नाटा, या कोई उदासी या कोई भाषा या कोई अनुभूति या कोई लड़की। आपको किसी ‘मेंटल’ कवि का मेरा कहा लगे सो लगे, सच्चाई यही है, कविता से बिना बतियाए मुझे यही लगता है कि साँस लेना दूभर हो रहा है।

कविता से मुहब्बत, कविता से गपशप, कविता से मुलाक़ात थोड़ी अटपटी ज़रूर लगती होगी आपको मगर मेरे लिए इसे मैं कविता के लिए एक तरह की बेचैनी मानता हूँ। यह बेचैनी इसलिए भी अधिक है मेरे भीतर क्योंकि मैं एक निहत्था, असुरक्षित, नंगे पैर चलने वाला ख़ुद को मानता हूँ। मेरे जीवन में जो कुछ है, सब टूटा-फूटा हुआ है। पाँव में चप्पल है तो टूटी हुई है। जूता है तो बिना पॉलिश किया। जो कपड़े पहन रखे हैं, इन पर आयरन नहीं किया गया है। सड़क पर चल-फिर रहा हूँ तो किसी बेढ़ंग आदमी की तरह। अपने रोज़मर्रा के दिनों में जिस बोली का इस्तेमाल कर रहा होता हूँ उसमें कोई लय, कोई तुक, कोई चमक आप ढूँढ़ना चाहें तो आपको काफ़ी निराशा हाथ लगेगी। ख़ासकर वैसे कवियों को मेरे जीवन से निराशा हाथ लगेगी जिन्हें नगाड़े, ढोल, ताशे बजाते कवि अधिक पसंद हैं। यही सब बजा-बजाकर तो वे अपना कवि-धर्म निभा रहे होते हैं। हिंदी के आलोचक, समीक्षक, टिप्पणीकार को भी आजकल वे ही नगाड़े, ढोल, ताशे बजाने वाले कवि पसंद हैं। अब ऐसे आलोचक, समीक्षक, टिप्पणीकार भी तो सिर्फ़ नगाड़े, ढोल, ताशे बजा-बजाकर बाक़ी कवियों को ख़ारिज कर दे रहे हैं। फिर हिंदी-कविता के ऐसे ख़ास क़िस्म के समय में बुल-टहल रहीं कवयित्रियों का क्या, वे तो ना नगाड़े बजा सकती हैं, ना ढोल-ताशे। वे अपने ख़ाली समय में ठहाका भर मार लें तो दर्जनों ढोंगी कवि और टिप्पणीकार उनके इस ख़ाली समय को अपने अश्लील मैसेजेज़ वाले डर से भर देंगे। ऐसे ढोंगियों को यही लगता है कि कोई कवयित्री जितनी अकेली दिखेगी, वे उनके ठहाके को उतनी ही बख़ूबी से बहला-फुसला सकेंगे। वे फुसलाऊ कवि और टिप्पणीकार जो ठहरे!

नगाड़े, ढोल, ताशे बजाने वाले कवियन लोग जो चाहे बजावें, स्त्री-कविता मुझे कभी दुखी अथवा बेचैन दिखाई नहीं देती। स्त्री-कविता के पास अपनी ऐसी मज़बूत देह है कि उन्हें इधर-उधर झाँकने की ज़रूरत नहीं है। स्त्री-कविता के पास आत्मा की ताक़त ऐसी है कि इस आत्मा में जो कुछ भरा है, प्रेम ही भरा हुआ है अपनी पृथ्वी के लिए, जिस पृथ्वी पर वह चल-फिर रही हैं, उड़-उतर रही हैं, अँधेरे-उजाले को जी रही हैं। स्त्री-कविता को पढ़ते, सुनते, महसूसते हुए मैंने यही सबकुछ पाया है। स्त्री-कविता से गुज़रते हुए मैं जब पंखुरी सिन्हा के कविता-घर तक पहुँचा, मैंने देखा कि इस घर में कविता बेहद मासूमियत से मुस्करा रही है :

          अक्षरों के अनन्य प्रदेश में

          शब्दों की धूप में

          वाक्यों के छोटे से लम्बे

          लम्बे से छोटे होने की दलदल में

          कुछ सूर्य के उत्तरायण से दक्षिणायण

          होने के नतीजे बूझने की तरह

          छायाओं के लम्बे और छोटे होने की तरलता में

          रोशनी के घटतेबढ़ते जाल में

          जंजाल में

          उनकी बातें वाचाल में

          उनके अर्थों की बहुत नम

          धँसती, सनती, लिपटती

          सिक्त, अनासक्त

          विवादित ज़मीन पर

          बता पाना

          बतौर बयान

          बतौर साझा

          बतौर बस बात

          आपकी मेरी भाषा में

          ये जानते कि वाक़ई बहुत सुन्दर होते हैं दृश्य

          कल्पनातीत होते हैं

          और जबकि बहुत हिदायत दी जाती है

          कल्पना के आधार पर लिखने की

          और सौंदर्य की स्याही में

          डुबोकर नहीं

          यथार्थ का कल्पनावाद

          या कल्पना का यथार्थवाद

          ऐसी किसी धारा में ही बहने की हिदायत हो जब

          बता देना

          वह दृश्य जो बस इस तरह खूबसूरत हो

          जैसे बहुत खिलने वाला देशी गुलाब

          जैसे गुच्छों में खिलने वाला देशी गुलाब

          जैसे बड़ी फ़ादारी से खिलने वाले

          फूल के पेड़

          जैसे  बिछी मिट्टी में

          जूही की असल ख़ुशबू

          जैसे दिल्ली रिज से कसर

          कॉलेज हॉस्टल की ओर

          चला आने वाला

          भारीभरकम पंखों

          और मिलतीजुलती चाल वाला

          मोर

          जैसे परीक गया चूहा नहीं

          परीक गए बिल्ली के बच्चे

          जैसे पहाड़ी मैना के क़िस्से

          जैसे ग़ीचे में अकसर आने वाली हमिंगबर्ड

          बिलकुल वैसे ही

          किसी इलाक़े में अकसर नज़र आने वाले तोते

          मोहल्ले के बाशिंदे तोते

          नीम की सीढ़ीदार शाखों पर

          एकएक बैठे तोते

          जिनके स्वतः कलरव में हों

          सीखे वाक्यों से ज़्यादा बातें

          जिका टिया पाखी रंग हो

          नीम के पत्तों के यौवन का हरा रंग

          जो आकर छिप जाते हों

          नीम के पत्तों में

          साफ़ नज़र आते हों

          आम, लीची, पाकड़, गूलर, अमलतास, गुलमोहर पर

          अमरू पर भी

          और, और भी साफ़ पत्रहीन ठूँठ पर

          कुछ ऐसे भी ठूँठ

          जिनपर फुनगी, टहनी किसी भी चीज़ की गुंजाइश नहीं

          ऐसे में दूर से भी नज़र  जाता है

          आकार सुग्गे का

          उसकी पूँछ का वह पीला

          जिसमे पूजा की रोली के साथ की

          हल्दी का शुभ पीला होता है

          जिसमे सृष्टि को दुबारा रचने की

          सारी संभावनाएँ मौजूद होती हैं

घटनाएँ एक स्त्री के जीवन का हिस्सा होती हैं। एक स्त्री जितनी मुलायम होती है, घटनाएँ उसके जीवन में उतनी ही भारी होकर घटती रहती हैं। लेकिन हर स्त्री आवाज़ की तरह हर घटना की आहट से सचेत रहती आई है। वह जानती है, वह ज़रा-सा भी चूकी कि उसके जीवन पर कोई घातक पत्थर आकर गिरेगा और उसके जीवन को आहत कर जाएगा। असावधानी, असुरक्षा, चिंता, यह सब किसी स्त्री के जीवन में ज़्यादा आती है। मगर एक स्त्री अगर कवयित्री है तो उसको मालूम है कि ऐसी अगड़म-बगड़म चीज़ों से उन्हें कैसे होशियार रहना है। एक कवयित्री अगर ठूँठ भी उठा लाएगी तो वह ठूँठ घर आकर कोई अच्छा गीत ही गाएगा ख़ुद में फिर से जीवन को भरते हुए। एक स्त्री भी यही करती है। एक कवयित्री भी यही करती है।

अगर उसके रास्ते में पड़ा कोई पेड़ सूख गया है, ठूँठ हो गया है तो वह स्त्री, वह कवयित्री उस मरे हुए पेड़ को जिलाकर ही दम लेगी। जिलाने का काम एक स्त्री के अलावा और कर कौन सकता है। एक स्त्री को हम अपने जीवन में कई-कई बार मार डालते हैं, तब भी वही स्त्री हमें कई बार जिलाकर यह साबित कर देती है कि अरे देखो, जीवन तो हमीं देती हैं… तुम तो बस मरण देना जानते हो। पंखुरी सिन्हा भी एक कवयित्री होने से पहले एक स्त्री हैं और कविता को जिलाने का जादू जानती हैं। तभी एक ऐसे समय में, कहीं-न-कहीं से जब किसी-न-किसी स्त्री के रोज़ मारे जाने की ख़बर आ रही है, बावजूद इसके पंखुरी सिन्हा अपनी कविता में उस मार डाली गई स्त्री को जिला देती हैं। यह जिलाना या जिलाए रखना बड़ा मायने रखता है। एक पुरुष किसी स्त्री को मार डालता है और एक स्त्री है कि मरकर भी उस मार डालने वाले पुरुष के लिए यह मैसेज छोड़कर जाती है कि तुम जो इतनी क्रूरता से मेरी जान ले लेते हो, मगर तुम्हारी जान भी तो एक स्त्री की ही दी हुई है। पंखुरी सिन्हा की कविता भी यही कहती है कि हमें मारो नहीं जिलाओ। हम ज़िंदा रहेंगी तभी तुम ज़िंदा रहोगे :

          नीलेनीले-से होंठों वाली वो लड़की

          नीले हो आ होंठों वाली वो लड़की

          नीलीनीलीसी सर्दी में चलती हुई बाहर

        बर्फ़ीली-सी सर्दी में चलती हुई बाहर

        कंटीली सर्दी  में चलती हुई बाहर

        करती लोगों से सवाल, हक़ों के बारे में

        और जीती हुई एक बिलकुल बेमज़ा ज़िन्दगी

        बेज़ार, बेकार, बर्बाद, बेजान

          गीलेगीले बालों पर पहनती हुई

          टोपी भी नीलीनीली अपनी

          अपने गीलेगीले बालों से

          भिगोती कंधे उसके

        किसी पहाड़ी कन्दरा में चलती किसी बस पर

        फंतासी या कि सच कोई

          नीले हो आए होँठों से

          आरे, तिरछे, मुस्कुराकर करती सवाल तमाम

        थामती उसे दोनों हाथों से

        जैसे अभी गिर पड़ेगी

        थामती उसे पुरज़ोर

       कभी तलाशती उसे

       अपने सारे सामानों में

       इर्दगिर्द उसके

       भूखीभूखी आँखों से देखती हुई

          सामने वाली औरत को ट्रेन में

          घूँट भरते, डोनट के साथ, कॉफ़ी की

          एक बहुत बड़ी ख़ुशबूदार प्याली से

          भूखीभूखी नज़रों से देखती

          सूप के साथ, ब्रेड और मक्खन खाती, उस लड़की को

          लॉ ऑफ़िस की शाम की क्लिनिक में

          लीगल एड के दफ़्तर में

          अजनबी राज्य के रीबों के लॉ ऑफ़िस में

          बहुत भूखी आँखों से पसारते हुए मक्खन को ब्रेड पर

          पिघलते हुए मक्खन को ब्रेड पर

          ये सोचते हुए कि वो उसके साथ सोकर उठती

          तो कैसा होता, गर्म ब्रेड के साथ

          मक्खन खाना

          एक स्त्री-जीवन के बारे में अपनी ‘प्रेशर कुकर’ सीरिज़-कविता के मध्यम से पंखुरी सिन्हा यह भी कहती हैं :

           एक /

          वो लोग मेरा घर जलाकर

          इतनी संजीदगी से

          कह रहे थे

          मुझसे काम पर जाने

          कमाकर खाने को

          कि कर्तव्यपरायणता

          और अकर्मण्यता

          दोनों पर

          लम्बी बहसें बनती थीं

          बनती थी तहक़ीक़ात

          कईओं के भीतरी ज़ेहन में

          बोलने के हौसलों पर।

     दो /

          प्रेशर कुकर इन दिनों

          पुराना पसंदीदा इश्तहार था

          जो बीवी से सचमुच करें प्यार

          वो शादी से कैसे करें इकार

          कुछ टेढ़ासा

          राजनैतिक घुमाव लिए

          प्रेमी युगल

          इधर कुछ दिनों से

          अगर साथ नहीं रह रहे

          तो अकसर खाने पर

          मिल रहे हैं

          घर भी खाने पर

          लेकिन हमेशा ही

          इनके रिश्ते के

          तात्कालिक तापमान पर बोलने वाला

          नियंत्रण की भी विधियाँ बताने वाला

          ये व्यक्ति कौन है?

     तीन /

          जब ख़त्म होते गए सारे पैसे

          कुछ इस तरह भी

          कि विदेशी अर्थव्यवस्था

          पर्याय बना दी जाए

          अर्थोपाजन के सारे संसाधनों पर

          निषेध का

          और कहा जाए

          केवल र्चने को

          बल्कि दे देने को

          और ऐसे में जब ख़त्म होते गए

          ख़त्म हो गए सारे पैसे

          बंद हो गयी स्कॉलरशिप

          तो सबसे पहले बंद हुआ

          भोजन में मांस

          एकदम बंद हो गया

          भोजन में मांस

          और दुर्लभ बन गए

          मांसाहार के दिनों में

          मैंने पाया

          कुछ सब्ज़ियाँ हर मौसम में सस्ती होती थीं

          और ज़्यादातर ये कंदमूल जैसी सब्ज़ियाँ होती थीं

          या फिर कोंहड़े की जाति-प्रजाति की सब्ज़ियाँ

          वही जिसके इतने ढेर सारे उपयोग थे

          अमेरिकन थैंक्स गिविंग के त्यौहार में

          हाँ, वही त्यौहार

          जो मुझे डर था

          इस प्रायद्वीप के छूटने के साथ

          छूट न जा

          पर मेरे बिलकुल कंद और मूल रीदकर

          दुकान से पीठ पर ढोकर

          घर लाने के दिन थे

          बंद हो गया

          मेरा कुछ भी प्रेशर कुकर में पकाना

          सब व्यंजनों की सीटियों का लगना

          अब सब उबलाउबला पकता था

          सच कहूँ तो मसाले भी ख़त्म थे

          तेल भी

          कुछ भी पचाने की ताक़त भी

          लड़ाई का आख़िरी चरण ख़त्म हो रहा था

          इस बार लौट ही आना था मुझे

          पर कभी तो लौटूँगी हाँ

          जहाँ कटे हुए कद्दुओं और कोंहड़ों में

          इतने लट्टू जलते थे

     चार /

          ये बोस्टन मैराथन बॉम्बिंग के आसपास की बात है

          कैनाडा के किसी प्रदेश में

          प्रान्त में

          और  याद रहे कि कनाडा के उत्तरी प्रदेश

          बहुत ही बर्फ़ीले

          ठंडे, लगभग अनबसे प्रांत हैं

          उन लोगों के प्रांत

          जो यहाँ के मूल निवासी रहे हैं

          जो शब्द ही अपनेआप में

          एक बड़ी राजनैतिक लड़ाई है

          और जिसे शायद ही कोई

          सुलझा रहा है

          दुनिया के किसी भी बसाए हुए देश में

          लेकिन कनाडा का वह एक फ्रेंच भाषाभाषी प्रान्त

          जहाँ अलगाव को लेकर

          हज़ार मतदान हो चुके हैं

          और अभी हाल ही में

          एक वृद्धाश्रम में

          आग की एक भयानक दुर्घटना

          सबके दिल दहलाती घटी थी

          शायद वहीँ पकड़े गए थे

          कुछ जिहादी

          कुछ आतंकी

          और जैसाकि ये लोग करते हैं

          घरेलू बम बनाकर चलाते हैं

          इस बार बना रहे थे

          प्रेशर कुकर में

          प्रेशर कुकर तब तक स्मृतियों में

          धरोहरसी एक चीज़ बन गया था

          उसमे पकने वाला मांस

          ज़िंदा भेड़बकरों में तब्दील

          दूर पहाड़ों पर घूमने वाला आज़ाद जानवर

     पाँच /

          काफ़ी रूमानी क़िस्म की विधियाँ

          पकाई जा चुकी थीं

          तब तक प्रेशर कुकर में

          ये लगभग किशोरावस्था में

          पाक कला के उत्साह भरे दिन थे

          और एक नवोदित मित्र

          जिनका पदार्पण

          मेरी ज़िन्दगी और

          घर में भी

          नया लेकिन पुख़्ता था

          मुर्गे अथवा मुर्गी को

          बोतल की सॉस के साथ

          कुकर में सीटी लगवा चुके थे

          और मैगी समेत

          विदेशी तर्ज़ के खाने जहाँ सबको लुभा रहे थे

          लुभा रही थीं

          ढाबोंसी खुली

          ई-नई दुकानें भी

          घर में अब भी

          सिलबट्टे पर

          मसाला पिसता था

          द्वैत और अद्वैत पर

          निबंध लिखने के होमवर्क

          कॉलेज में मिलते थे

          एक प्रेम मैंने उसी वक़्त

          तोड़ा था

          और ज़िन्दगी तभी से

          जीवन शैलियों की

          राजनीति का अखाड़ा बन ग थी

     छह /

          इन दिनों माँ ने रात भर में

          दही जमा लेने का नया तरीक़ा जाद किया था

          और वो भी मीठा दही

          जिसे बिना गुड़चीनी के खाया जा सके

          तुरंत बंद कि

          गैस के चूल्हे पर

          तो उसे छोड़ा ही जाता था

          गर्म तवे पर

          उबले दूध के ढक्कन पर

          लेकिन माँ ने उसे

          कुकर हल्कासा गर्म कर

          उसमें बंद कर दिया था

          और सारी गर्माहट

          सुरक्षित रह गयी थी

          उसे जमा देने लाय

          जैसे घर की ऊष्मा

          बनी रहती है कुछ

          बाहर की कँपकँपाती ठं में भी

 पंखुरी सिन्हा की कविता-भाषा हमें अचरज में डालती है। यह भाषा आपके घर की हो, ना हो, मेरे घर की ज़रूर है। यानी पंखुरी सिन्हा की कविता-भाषा के जो शब्द हैं, सबके अपने शब्द हैं। ये शब्द इतने अपनत्व से भरे हैं कि आप इन शब्दों को अपने शब्द बनाकर कहीं भी घूम-फिर आ सकते हैं। पंखुरी सिन्हा की एक और ख़ासियत यह है कि कविता जनमते वक़्त का कोई हीला-हवाला इनके यहाँ दिखाई नहीं देता। कविता लिखने का यहाँ अपना माध्यम है, अपना बहाना है और अपना समय भी है। यही वजह है कि यह कविता भीड़ की कविता ना होकर मेरे-आपके घर की कविता है। वही घर, जो सबके भीतर शामिल होता है। यानी पंखुरी सिन्हा घर पा चुकीं कवयित्रियों में से हैं।

एक वजह यह भी है कि यह कविता किसी बड़े आंदोलन को सहयोग करने का दावा नहीं करती। तब सवाल यह है कि क्या किसी घर से बाहर आई कविता हमारे कितने काम की है? मेरी नज़र में यह कविता बेहद काम की है। ऐसी कविता में एक स्त्री के साथ घर और घर से बाहर क्या-कुछ और कितना-कुछ प्रिय-अप्रिय घट रहा है, उसका कच्चा-चिट्ठा कविता में जगज़ाहिर किया जा रहा होता है। इस वजह से पंखुरी सिन्हा की कविता मेरे-आपके घर की कविता है। और यह घर वह वाला घर नहीं है, जहाँ जीने के लिए संघर्ष कब का ख़त्म हो चुका होता है। पंखुरी सिन्हा के घर में जीने की जिजीविषा बची हुई है। जीने की यह जिजीविषा वही वाली है, जो पेड़ की फुनगी तक में बची रहती है। यह वही वाली जिजीविषा है, जिसेकि पेड़ के तोते तक अपने भीतर बचाए रखते हैं :

            दिन आवारा

            दिन फक्कड़ बिंदास

            दिन बंजारे

            दिन इकहरे दोहरे

            दिन अकेले दुकेले

            दिन साथ साथ

            दिन पास पास

            दिन रीब कहीं

            नज़दीक ही

            दिन पकड़ से दूर

            दिन दूर दूर

            दिन डालडाल

            दिन पातपात

            दिन बातबात

            दिन सुरीले

            दिन कँटीले

            दिन ख़ामोश

            दिन बोलते

            दिन धुनों से भटके

            दिन बेज़ार

            दिन बेकार

            दिन बेरोगार

            दिन बेगाने

            दिन भूखे

            दिन अबारों के इश्तहार

            दिन खूबसूरत बत्तियों वाले कैफेज़ के आगे

            सजे मुलायम बिस्किट्स के काँच के शेल्

            दिन कुछ भी ना रीद पाने की नियति

            दिन अंतहीन सड़क

            दिन बंद रास्ता

            दिन चक्का जाम

            दिन अदृश्य बाधाएँ

            दिन कहीं और का युद्ध

            दिन किसी और की बातें

            दिन बहलाव

            दिन व्यतीत

            दिन उम्र

            दिन अग़वा

            दिन क़ातिल

            दिन क्षणिक

            दिन शाश्वत।

 पंखुरी सिन्हा की कविता अपनी धरती को पकड़कर रखती है। यह कविता आपको हैरतज़दा नहीं करना चाहती। यह कविता आपको विस्मित नहीं करना चाहती। यह कविता आपको चौंकाना नहीं चाहती। यह कविता आपकी आत्मा में जाकर आपको मुस्कराहट ज़रूर देना चाहती है। कोई कविता आपको आपकी मुस्कराहट देना चाहती है तो यह आज के किसी अख़बार की ख़बर ज़रूर बननी चाहिए। कौन है, जो आज की तारीख़ में किसी को उसकी मुस्कराहट लौटाना चाहता है। आज तो आप रा-सा मुस्कराए नहीं कि आपके मत्थे कोई बुरी ख़बर मढ़ दी जाती है। कभी महँगाई बढ़ाकर। कभी दंगा-फ़साद करवाकर। कभी हत्या करवाकर। कभी डाकाज़नी करवाकर। और तो और, आपको देशद्रोही बताकर। यह सब करवा कौन रहा है, एक कवि की बाज़ वाली आँखों को सब पता रहता है। यही वजह है कि पंखुरी सिन्हा की कविता आपको यह सब बताकर दुखी नहीं करना चाहती। सारा दुःख विश्व भर की कविता ख़ुद सहकर आपको आपकी मुस्कराहट लौटाना चाहती है। पंखुरी सिन्हा की कविता ऐसा कर भी रही है तो यह दूसरों को मुस्कराहट देने वाली मुस्कराहट इसने ख़ुद पंखुरी सिन्हा की मुस्कराहट से सीखी है। अब कोई हमको चूतिया बनाना भी चाहे तो ख़ुशी-ख़ुशी बनाए हमको बुरे दिनों में धकेलकर। हमारे पास है ना उनकी गड़बड़ियाँ जगज़ाहिर करने के वास्ते हमारी कविता की ताक़त। पंखुरी सिन्हा भी अपनी कविता की ताक़त के भरोसे ही तो कठिन दिनों में मुस्कराती रही हैं। अपने ख़ाली, अपने अँधेरे, अपने सुनसान रास्ते पर चलते हुए मुस्कराती रही हैं। कविता की ताक़त ऐसी ही होती है। कविता का ज़मीर ऐसा ही होता है। कविता की रूह ऐसी ही होती है। यही वजह है, पंखुरी सिन्हा कविता के समय को अपने प्रेम से भर रही हैं।

    

पंखुरी सिन्हा

संपर्क : A-204, Prakriti Apartments, Sector 6, Plot no 26, Dwarka, New Delhi 110075

ईमेल : nilirag18@gmail.com, फ़ोन : 09968186375

 

जन्म : 18 जून 1975

शिक्षा : एम ए, इतिहास, सनी बफैलो, 2008पी जी डिप्लोमा, पत्रकारिता, S.I.J.C. पुणे, 1998बी ए, हानर्स, इतिहास, इन्द्रप्रस्थ कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय, 1996

अध्यवसाय : BITV, और ‘The Pioneer’ में इंटर्नशिप, 1997-98, FTII में समाचार वाचन की ट्रेनिंग, 1997-98राष्ट्रीय सहारा टीवी में पत्रकारिता, 1998—2000

प्रकाशन : हंस, वागर्थ, पहल, नया ज्ञानोदय, कथादेश, कथाक्रम, वसुधा, साक्षात्कार, बया, मंतव्य, आउटलुक, अकार, अभिव्यक्ति, जनज्वार, अक्षरौटी, युग ज़माना, बेला, समयमान, अनुनाद, सिताब दियारा, पहली बार, पुरवाई, लन्दन, पुरवाई भारत, लोकतंत्र दर्पण, सृजनगाथा, विचार मीमांसा, रविवार, सादर ब्लोगस्ते, हस्तक्षेप, दिव्य नर्मदा, शिक्षा व धरम संस्कृति, उत्तर केसरी, इनफार्मेशन2 मीडिया, रंगकृति, हमज़बान, अपनी माटी, लिखो यहाँ वहां, बाबूजी का भारत मित्र, जयकृष्णराय तुषार. ब्लागस्पाट. कॉम, चिंगारी ग्रामीण विकास केंद्र, हिंदी चेतना, नई इबारत, सारा सच, साहित्य रागिनी, साहित्य दर्पण, करुणावती साहित्य धारा, मंतव्य  आदि पत्र पत्रिकाओं में, रचनायें प्रकाशित, दैनिक भास्कर पटना में कवितायेँ एवं निबंध, हिंदुस्तान पटना में कविता एवं निबंध, हिंदिनी, हाशिये पर, हहाकार, कलम की शान, समास, गुफ्तगू, उमंग, साहित्य उत्कर्ष आदि पत्रिकाओं, ब्लौग्स व वेब पत्रिकाओं में, कवितायेँ तथा कहानियां, प्रतीक्षित

किताबें : ‘कोई भी दिन’, कहानीसंग्रह, ज्ञानपीठ, 2006

             ‘क़िस्सा-ए-कोहिनूर’, कहानीसंग्रह, ज्ञानपीठ, 2008

              ‘प्रिजन टॉकीज़’, अंग्रेज़ी में पहला कवितासंग्रह, एक्सिलीब्रीस, इंडियाना, 2013

               ‘डिअर सुज़ाना’ अंग्रेज़ी में दूसरा कवितासंग्रह, एक्सिलीब्रीस, इंडियाना, 2014

               पवन जैन द्वारा सम्पादित शीघ्र प्रकाश्य काव्यसंग्रह ‘काव्यशाला’ में कविताएँ सम्मिलित

               हिमांशु जोशी द्वारा सम्पादित पुस्तक ‘प्रतिनिधि आप्रवासी कहानियाँ’, संकलन में कहानी सम्मिलित

               विजेंद्र द्वारा सम्पादित और बोधि प्रकाशन द्वारा प्रकाशित कवितासंकलन ‘शतदल’ में कविताएँ शामिल 

               रवींद्र प्रताप सिंह द्वारा सम्पादित कवितासंकलन ‘समंदर में सूरज’ में कविताएँ शामिल

              गीता श्री द्वारा सम्पादित कहानी-संकलन ‘कथा रंग पूरबी’ में कहानी शामिल

              ‘रक्तिम सन्धियां’, साहित्य भंडार इलाहाबाद से पहला कवितासंग्रह, 2015

              पुस्तक मेला २०१७ में बोधि प्रकाशन से दूसरा कवितासंग्रह ‘बहस पार की लंबी धूप’ प्रकाशित

              पुरस्कार : कविता के लिए राजस्थान पत्रिका का २०१७ का पहला पुरस्कार

              राजीव गाँधी एक्सीलेंस अवार्ड 2013

             प्रथम कहानीसंग्रह ‘कोई भी दिन’ को 2007 का चित्रा कुमार शैलेश मटियानीसम्मान

             कोबरा : गॉड ऐट मर्सी’, डाक्यूमेंट्री का स्क्रिप्ट लेखन, जिसे 1998-99 के यू जी सी फिल्म महोत्सव में सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का ख़िताब मिला

             ‘एक नया मौन एक नया उद्घोष’, कविता पर,1995 का गिरिजा कुमार माथुर स्मृति पुरस्कार, 1993 में CBSE बोर्ड, कक्षा बारहवीं में, हिंदी में सर्वोच्च अंक पाने के लिए, भारत गौरव सम्मान

अनुवाद : कविताएँ मराठी, बांग्ला, पंजाबी, स्पेनिश  में अनूदित, कहानीसंग्रह के मराठी अनुवाद का कार्य आरम्भ, उदयन वाजपेयी द्वारा रतन थियम के साक्षात्कार का अनुवाद, रमणिका गुप्ता की कहानियों का हिंदी से अंग्रेज़ी में अनुवाद

सम्प्रति : पत्रकारिता सम्बन्धी कई किताबों पर काम, माइग्रेशन और स्टूडेंट पॉलिटिक्स को लेकर ‘ऑन एस्पियोनाज़’, एक किताब एक लाटरी स्कैम को लेकर, कैनाडा में स्पेनिश नाइजीरियन लाटरी स्कैम, और एक किताब एकेडेमिया की इमीग्रेशन राजनीती को लेकर, ‘एकेडेमियाज़ वार ऑफ़ इमीग्रेशन’। साथ में, हिंदी और अंग्रेज़ी में कविता लेखन, सन स्टार एवं दैनिक भास्कर में नियमित स्तम्भ एवम साक्षात्कार

● शहंशाह आलम
● जन्म : 15 जुलाई, 1966, मुंगेर, बिहार
● शिक्षा : एम. ए. (हिन्दी) 
● प्रकाशन : ‘गर दादी की कोई ख़बर आए’, ‘अभी शेष है पृथ्वी-राग’, ‘अच्छे दिनों में ऊंटनियों का कोरस’, ‘वितान’, ‘इस समय की पटकथा’, ‘थिरक रहा देह का पानी’ छह कविता-संग्रह तथा आलोचना की पहली किताब ‘कवि का आलोचक’ प्रकाशित। ‘गर दादी की कोई ख़बर आए’ कविता-संग्रह बिहार सरकार के राजभाषा विभाग द्वारा पुरस्कृत। ‘आग मुझमें कहाँ नहीं पाई जाती है’ कविता-संग्रह शीघ्र प्रकाश्य। ‘बारिश मेरी खिड़की है’ बारिश विषयक कविताओं का चयन-संपादन। ‘स्वर-एकादश’ कविता-संकलन में कविताएं संकलित। ‘वितान’ (कविता-संग्रह) पर पंजाबी विश्वविद्यालय की छात्रा जसलीन कौर द्वारा शोध-कार्य। दूरदर्शन और आकाशवाणी से कविताओं का नियमित प्रसारण। हिन्दी की सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं प्रकाशित। बातचीत, आलेख, अनुवाद, लघुकथा, चित्रांकन, समीक्षा भी प्रकाशित। वेब पत्रिकाओं में भी रचनाएं प्रमुखता से आती रही हैं।
● पुरस्कार/सम्मान : बिहार सरकार का राजभाषा विभाग, राष्ट्रभाषा परिषद पुरस्कार तथा बिहार प्रगतिशील लेखक संघ का प्रतिष्ठित पुरस्कार ‘कवि कन्हैया स्मृति सम्मान’ के अलावा दर्जन भर से अधिक महत्वपूर्ण पुरस्कार/सम्मान मिले हैं।
● संप्रति, बिहार विधान परिषद् के प्रकाशन विभाग में सहायक हिन्दी प्रकाशन।
● संपर्क : हुसैन कॉलोनी, नोहसा बाग़ीचा, नोहसा रोड, पेट्रोल पाइप लेन के नज़दीक, फुलवारीशरीफ़, पटना-801505, बिहार।
मोबाइल : 09835417537
ई-मेल : shahanshahalam01@gmail.com

  1. शहंशाह आलम

    बिहार खोज खबर का आभार।

  2. रज़िया

    बहुत ही बढ़िया।

  3. Bhawana Sinha

    कवयित्री पंखुरी सिन्हा जी की सुन्दर भाव- भाषाशैली की कविताएं प्रभावित करती हैं।
    इन कविताओं को और गहराई प्रदान करने वाली बेहतरीन समीक्षा के लिए समीक्षक को हार्दिक बधाई व शुभकामनाएं।
    भावना सिन्हा।

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