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न समझोगे तो…मिट जाओगे

पंजाब को अपवाद मानकर, उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, गोवा, मणिपुर में सम्पन्न विधान सभा चुनाव-2017 और उसका परिणाम भारतीय राजनीति, शासक दलों और लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए साफ-साफ बता रहा है कि चौधराहट, नेताजी, दीदीजी, भइयाजी, चाचाजी, युवराजजी, भाभीजी को अपनी सुविधा की राजनीति, अपनी पंसद और नापसंद से स्थानीय क्षत्रपों के बीच टिकट वितरण के शास्त्र का व्याकरण अब नहीं चलने वाला है।

अब आगामी चुनावों में परंपरागत राजनैतिक युगलबाजी, टेकेन फाॅर गारन्टी, कथित विकासात्मक शब्दजाल से काम नहीं चलने वाला है। अगर इस बात को सभी क्षेत्रों के लोकतंत्र के कथित वाहक, सत्ताधारी दलों के सिद्धान्तकार, रणनीतिकार दिल से कबूल करें तब सवाल उठता है कि चुनावों के द्वारा सत्ता सुख कैसे हासिल किया जाय? मंगरु राम, सोहन महतो, कपिल मांझी, मालती देवी, फूलो देवी, आयषा बानो, क्रिस्टाॅफर हेम्ब्रम का विष्वास कैसे जीता जाय?

मगर, यह इतना आसान भी नही है, ऐसा सोचने-विचारने के लिये सभी दलों को चाहे वह मध्य मार्गी, बुर्जवादी सत्ताधारी दल और उनके चुनाव मैनेजमेंट गुरु या वाम राजनीत करने वाले दल हो या नई राजनीति की बात कर दिल्ली में चुनाव जीतने वाली आम आदमी पार्टी हो या क्षेत्रीय दलों के क्षत्रप, सबों को अपने को रिविजिट करना होगा, वरन् न समझोगे तो मिट जाओगें…

इन सम्पन्न राज्यों के विधान सभा चुनाव-2017 के परिणामों को समझने के क्रम में कुछ बात 20 वीं सदीं के 60 से 90 दषक और 21वीं सदीं के पहले-दूसरे दशक की राजनीति, रणनीति, प्रबन्धन, टिकट वितरण, घोषणा पत्र में विकास का मायायावी शब्दजाल का शंखनादी झुनझुना चलने वाला नही। लोग यानी देशज जन अपने पंचवर्षीय अधिकार (यूनिवर्सल फ्रेन्चाइज) की कीमत, उसकी प्रासंगिकता और उसके निहितार्थ को समझने लगा है। वह (वोटर जन) समझने लगा है कि दिल्ली, लखनऊ, देहरादून, चण्डीगढ़, पंजी, इम्फाल में बैठकर… नेता जी, दीदी जी, भइया जी, चाचा जी, चैधरी जी, युवराज जी, भाभी जी की नही चलेगी। टेकेन फाॅर गारन्टी की राजनीति नहीं चलेगी। विकास का शब्दजाल और उसका सतही शास्त्रीय विषयवस्तु नही चलनेवाला हैं, तो चलने वाला क्या है?

अब इन सत्ताधारियों एवं उनके दलों, संगठनों को भविष्य के गर्म में पल रही एक नई राजनीति, उस राजनीति का अर्थशास्त्र, उसका न्यायशास्त्र, उसका युवाशास्त्र और इन सबों के रोडमैप को 2017 के सन्दर्भ में समझकर सत्ता की राजनीति का एक नया व्याकरण गढ़ना होगा। यह व्याकरण गैर भाजपा दलों और विभिन्न धाराओं में बंटी सभी वामपंथी दलों और उनकि आनुवंशिक संगठनों को समझ कर रचना और संघर्ष की राजनीति की रुप-रेखा खींचनी होगी, उसमें रंग-रोगन भरकर, फूल-प्रूफ जमीनी तैयारी कर इस भारतीय संसदीय राजनीति के चुनावी समर में कुदना पड़ेगा। क्योंकि भाजपा की जीत इस दल को एक प्रचण्ड बहुमत और वोट प्रतिशत की मात्र जीत नही है।

इसका साफ-साफ सीख है कि इनकेे आनुवांषिक संगठनों ने कितनी गंभीरता से अपने विध्वंसकारी रचनात्मक कार्यों के माध्यम से टोलों, बसावटों, चट्टियों, कसबों एवं पंचायतो तक पहुँचकर कर अपने पूर्व होमवर्क के साथ विस्तार किया है। यहां पर आज की तारीख में भाजपा ने सबों को पीछे छोड़ते हुए अपने अनुवांशिक संगठनों, कार्यकत्ताओं और अपने प्रादेषिक षीर्ष नेताओं केे द्वारा इसमें धर्म, जाति और विकास के हसीन सपने की चाशनी भर कर शहरी और सुदूर ग्रामीण पोलिंग बूथ पर बूथ प्रबन्धन के कौशल, भावनात्मक धार्मिक प्रतीक के इस्तेमाल से कभी मुम्बई, कभी चण्डीगढ़ (हरियाणा), कभी गोवाहाटी, कभी रांची, कभी भोपाल, कभी रायगढ़ और अब लखनऊ, देहरादून, पण्जी, इम्फाल के राजभवनों में पहुँचकर शपथ ग्रहण ले लिया।

 क्या 2017 में सम्पन्न इन पांच राज्यों के विधान सभा के परिणाम के इस रणनीति, इस प्रबन्धन, इस भावनात्मक धार्मिक प्रतिकों, नायकों के इस्तेमाल के इबारत को नेहरु के वारिस समझेंगे? आचार्य नरेन्द्र देव, जय प्रकाश , लोहिया, जे0पी0, कर्पूरी, जनेश्वर मिश्र, वी0पी0 मंडल के राजनैतिक षिष्य समझने को चिंतन-मनन करेंगे? क्या हसरत मोहानी सुभाष, भगत सिंह, पी0सी0 जोषी, वासूपुन्नैया, नम्बूदरीपद, विनोद मिश्र, राम नरेष राय के विचारों के योद्धा अब भी समझेंगे, सोचेंगे, चिंतन करेंगे? क्या अन्नादुरई, फूले, कांशी  राम, अम्बेदकर के वंसज इन संकेतों को समझने की अब भी कोशिश करेंगे?

क्या ये दिग्गज क्षत्रप, नेताजी, चाचा जी, दीदी जी, युवराज जी, नागपुर और दिल्ली के झंडेवाला रोड पर स्थित ‘‘केशव कुंज’’ के इस आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीति के व्याकरण को समझ-बुझकर एक नूतन सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक धरा पर खड़ा होकर अपने सत्ता की राजनीत की कोई वैकल्पिक व्याकरण गढ़ेगें?

यक़ीनन गढ़ना तो पड़ेगा ही। मगर गढ़े जाने वाले इस नये व्याकरण की इबारत अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग होनी चाहिए क्योंकि सभी राज्यों की भौगोलिक, सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक पृष्ठभूमियाँ अलग-अलग हैं। सबों (राज्यों) के लिए एक काॅमन माॅडल या सोशल इन्जीनिरिंग से तो काम चलेगा नहीं। कहीं सात निश्चय   से आगे जाकर भूमि सुधार और काॅमन स्कूल सिस्टम से जोड़ना होगा। कहीं जल, जंगल जमीन के स्वामित्व एवं पोजिशन की गांरटी से जोड़ होगा, कहीं नदी, पर्यावरण सरंक्षरण एवं उससे जनित परंपरागत रोजी-रोटी के साधन से जोड़ना होगा।

कहीं सुदूर अल्पविकसित क्षेत्रों में त्वरित गति से इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास से जोड़ना होगा। कही समावेशी कृषि, रोड मैप से जोड़ना होगा। सभी सोलखन, अभिवंचित वर्ग को सत्ता नेतृत्व में समुचित प्रतिनिधित्व देकर जोड़ना होगा, समग्रता में आधी अबादी को विषेष अवसर की गारंटी और ठोस परिणाम देकर जोड़ना होगा। कहीं खेतिहर मजदूर, बटाईदारों के उन्नयन एवं न्यूनतम मजदूरी भुगतान गारंटी वाली योजनाओं से जोड़ना होगा, कहीं मलिन बस्तियों एवं स्लम ऐरिया में संकटों में जी रहे लोगों के बीच जाकर उनकी भागीदारी से सरकारों को खुद को जोड़ना होगा।

केवल लखनऊ, चढ़ीगढ़ के बुलेट ट्रेन, लखनऊ-आगरा एक्सप्रेसवे की बात न कर सभी जिलों एवं राजधानियों को मोनो रेल जैसे सुविधाओं से जोड़ने की बात करनी होगी। महानगर एवं राजधानियों तक सीमित स्मार्ट सिटी की बात न कर गाँव, पंचायतों, प्रखण्डों, जिलों को स्मार्ट सिटी से जोड़ने की बात करनी होगी। किसानों, बटाईदारों के लिए एम0एस0पी0 की गारंटी करनी होगी।

क्यांकि ऐसे ही कुछ वादे, सुनहरे सपने को, धार्मिक भावनाओं को बेचकर 1925 से 2017 तक नागपुर और केशवकुंज (खण्डेवाल रोड, नई दिल्ली) ने अपने अनुवांशिक  संगठनों एवं नेटवर्कों के द्वारा भाजपा को सत्ता के षिखर तक पहुंचाया है। यदि अब भाजपा और उनके वैचारिक सत्ता केेन्द्र भी इसे अंजाम तक नहीं पहुचाते हैं तो इनका भी अंजाम वही होने वाला है जो इन राज्यों में नेता जी, चाचा जी, भइया जी, भाभी जी, दीदी जी एवं युवराज जी का हुआ है।

अब तो समय बतायेगा कि भाजपा लोगों के इस उम्मीद को पूरा करेगी? वरन् असंतोष बढ़ेगा, अन्तर्विरोध बढ़ेगा, जिसके परिणाम इस 70 वर्षीय भारतीय युवा लोकतंत्र के लियं सुखद नहीं होगा विगत 70 सालों में इस युवा लोकतन्त्र का जो ताना-बाना बना है, जिस युवा लोकतन्त्र ने कश्मीर से कन्याकुमारी, कठियावाड़ से कामरुप, बम्बई से भुवनेश्वर, गोवा से गोहाटी तक फैले भू-भाग में अपने ताना-बाना अपनी जड़े फैलाई हैं, उसमें दिमक लगने के आसार (लक्षण) अंकुरित हो सकते है।

हो सकता है यह दीमक, इस आकार ले चुके भारतीय युवा लोकतंत्र के लिए सुखद नही हो? खतरा है गहरा खतरा है। खतरा और अधिक गहराने वाला है। इन खतरों से कौल लड़ेगा? इस लड़ाई का अगुआ कौन बनेगा? इस लड़ाई के सामाजिक व्याकरण का विषय-वस्तु कौन गढ़ेगी? इस समरस सामाजिक व्याकरण (लोकतंत्र) में सबके लिए स्पेस हो, सबके लिए दो जून की रोटी हो, सबके लिए इज्जत की जिन्दगी हो, सबके लिए सर छुपाने को एक अदद घर हो, सबके हाथों को काम की गारंटी हो, सबके लिए डाॅक्टर-दवा उपलब्ध हो, सबों के लिए पीने का साफ पानी हो, किसानों के खेतों में पटवन की व्यवस्था हो, बच्चों के लिए अर्थपूर्ण षिक्षा की गारन्टी हो, आधी आबादी की हिस्सेदारी हो, दावेदारी हो। सम्पन्न इन पाँच राज्यों के चुनाव परिणाम यह 70 वर्षीय लोकतंत्र के खम्भे कमजोर होंगे। कहीं ऐसा न हो कि लोकतंत्र के ये सारे खम्भे कहीं धराशायी हो गये तो 70 वर्षीय यह भारतीय युवा लोकतंत्र ही स्थायी विचार हो जाए? शायद कुछ ऐसे ही भावी संकटो को माप कर किसी कवि ने कहा होगा:
न समझोगे तो मिट जाओगे ऐ हिन्दुस्तान वालों।
तुम्हारी दास्तां तक न होगी दास्तानों में।।

ग़ालिब जनसरोकार से जुड़े सुप्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता है।

 

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  1. anubhava sinha

    गालिब ने जितने लोगों का नाम बतौर उद्धरण लिया उनका क्या हश्र हुआ ? यह सवाल यदि महत्वपूर्ण है तो उससे बड़ा महत्वपूर्ण सवाल यह है कि उसके लिए जिम्मेदार कौन था ? गालिब को इसका जवाब मालूम है। इसलिए उसका जिक्र नहीं किया। लेकिन डूबते को तिनके का सहारा की तर्ज पर फिर से उनका नाम लेने के पीछे छिपा मकसद सिर्फ और सिर्फ डर पैदा करना है और पुरानी स्थिति को बहाल रखने के लिए हंगामा ही खड़ा करना है।

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