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पद्मश्री गजेन्द्र नारायण सिंह

स्वातंत्र्येतर बिहार में संगीतकला की दशा और दिशा

आजादी से पूर्व की स्थिति क्या थी, इस का जायजा लिए बगैर आजादी के पैंसठ वर्षों में बिहार में कला विशेषकर संगीत की क्या हालत रही उसे हम नहीं समझ सकते। 20वीं सदी के पूर्वार्द्ध तक समाज में कलापोषकों और आश्रयदाताओं का एक वर्ग विशेष हुआ करता था जिसकी बदौलत संगीत और संगीतकारों की स्थिति संतोषजनक ही नहीं अनुकरणीय थी। तब बिहार में अनेक रियासतें और जमींदारी थी जिनके सामंत न केवल संगीतकारों के संरक्षक-संवर्धक थे अपितु उनमें अधिकांश स्वयं उच्च कोटि के संगीतकार और कला पारखी थे। ऐसी रियासतों में पंचगछिया (जिला सुपौल-पहले सहरसा), चम्पानगर, बनैली, पूर्णिया, दरभंगा, हथुआ, टेकारी (गया), बेतिया (पश्चिम चम्पारण), जमीरा (आरा जिला) जमींदारियों में संगीतकला जैसी फूली-फली वह काबिलेतारीफ है।

ग्यारहवीं सदी ईस्वी से लेकर 20वीं सदी के पूर्वार्द्ध तक बिहार में संगीत का सर्वतोमुखी विकास हुआ। धु्रपद, ख्याल, टप्पा-ठुमरी-छोटी चीजें, मृदंग-पखावज, हारमोनियम, तबला, सारंगी, इसराज .और सितार-इन गेय विधाओं और साजों के ऐसे प्रस्तोता हुए जिन्होंने हिन्दुस्तानी संगीत का इतिहास रचा।

इस समयावधि में इन रियासतों के आश्रय और प्रोत्साहन से जिस कोटि के गाने-बजाने वाले हुए कि चरित्र, तालीम, सीखने की उत्कट अभिलाषा, गुरुभक्ति, गुरुओं का शागिर्दों के प्रति लगाव और ईमानदार प्रशिक्षण तथा कलाकारों का अटूट रियाज ऐसी कि गायन-वादन के हर क्षेत्र में जैसे कलावंत हुए कि क्या कहने। यहां तक कि बिहार की माटी में ऐसी-ऐसी कलावंत तवायफें हुईं की उनकी साधना, गान कौशल, खुद्दारी, रहन-सहन, शाइस्तगी, तहजीब, सारी चीजें लासानी थी।

वह जमाना था – गुणवंत कलावंतों, पारखी-सहृदय-उदार और कद्रदां आश्रयदाताओं का।

धु्रपद की तीन विशिष्ट परम्पराएं बिहार की रही – बेतिया, दरभंगा और डुमरांव। वर्तमान देश में प्रचलित धु्रपद के घरानों में बेतिया घराना सबसे पुराना कोई 400 वर्षों से भी अधिक पुराना (मुगल शहंशाह शाहजहांकालीन) है। इन घरानों में धु्रपद संगीत की सेनिया परम्परा की धु्रपद की टकसानी वंदिशें गायकों के कण्ठ में सुरक्षित रही है। इन तीनों परम्पराओं में ऐसे-ऐसे दिग्गज धु्रपद गायक हो गये जैसे गोपाल मल्लिक, श्यामा मल्लिक, उमाचरण मल्लिक, कुंजबिहारी मल्लिक (सभी बेतिया घराना), छितिपाल मल्लिक, महावीर मल्लिक, यदुवीर मल्लिक, एजितराम मल्लिक तथा रामचतुर मल्लिक प्रभृति धु्रपदिए दरभंगा घराना में तथा डुमरांव घराना के अंतर्गत घनारंग दूबे, बच्चू प्रकाश दूबे, सहदेव दूबे, रामप्रसाद पाण्डेय सरीखे गायक हुए जिनकी टक्कर के धु्रपदिए पूरे देश में नहीं हुए।

ख्याल में यद्यपि यहां केवल एक ही घराना हुआ (भागलपुर के मिश्र गायकों का घराना) जिसमें बद्री मिश्र, शारदा मिश्र, प्रह्लाद प्रसाद मिश्र, संगीत कुमार नाहर सरीखे गायक हुए – वनैली स्टेट के महाराज कुमार श्यामानन्द सिंह अनूठे ख्याल गायक हो गये – बंदिश गाने में इनका लोहा देश के लब्धप्रतिष्ठि गायकों ने माना, दरभंगा राजदरबार को किराना घराना के गायक बंधु मौला बक्श और अजीम बक्श तथा उनके फरजद अब्दुलगनी खां सुशोभित करते रहे।

अब्दुल गनी खां के यशस्वी शागिर्द हुए सोल्हनी गांव, सुपौल के मुंगेरवासी चन्द्रशेखर खां।

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