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बनारस घराने की अंतिम प्रतीक

शास्त्रीय संगीत की बड़ी परंपरा में गिरिजा देवी बनारस घराने की अंतिम प्रतीक थीं. एक ऐसी प्रतीक कि उनके जाने के बाद शायद ही कोई उनकी कमी को पूरा कर पाये. उस बड़ी परंपरा में रसूलनबाई, सिद्धेश्वरी देवी, बड़े रामदास, महादेव मिश्र, अप्पा जी जैसे मूर्धन्य गायकों का नाम लिया जाता है, जिसकी गिरिजा जी आखिरी कड़ी थीं. शास्त्रीय गायन में उनका कोई सानी नहीं था. चारों प्रकार की गायकी- ख्याल-टप ख्याल, ध्रुपद-धमार, छंद-प्रबंध, ठुमरी-कजरी, की वे एक सिद्धहस्त गायिका थीं. इसीलिए माना जाता है कि इस मामले में बनारस का मतलब गिरिजा देवी था और गिरिजा देवी का मतलब बनारस था.

गिरिजा जी का जन्म काशी में हुआ था. वे वहीं रहीं और काशी की गायन परंपरा से वे अच्छी तरह वाकिफ हुईं. वे शिव की भक्त थीं और राग भैरव उन्हें बहुत प्रिय था. उनकी शानदार उपलब्धि यह भी है कि शास्त्रीय संगीत के लोकपक्ष को उन्होंने जनसामान्य के लिए सुलभ बनाया. अगर कोई बेेहतरीन चैती या दादरा सुनना चाहे, तो गिरिजा जी के शास्त्रीय ख्याल में रचे-बसे चैती और दादरा को सुन सकता है और मगन हो सकता है.

गिरिजा जी ने शास्त्रीय गायन की शिक्षा सरजू प्रसाद मिश्र और श्रीचंद मिश्र से ली थी और इन दोनों गुरुओं से उन्होंने बहुत ही दुर्लभ जानकारियां हासिल की थीं. हालांकि, गिरिजा जी को सबसे पहले उनके पिता ने ही संगीत सिखाया था, जो बहुत अच्छा हारमोनियम बजाते थे. संगीत की शास्त्रीयता को आत्मसात करके उन्होंने कुछ ऐसी दुर्लभ प्रकार की गायिकी को तराश लिया था, जो बनारस घराने में कहीं और नहीं दिखता है. यही वजह है कि गायकी की विभिन्न विधाएं- गुल, नक्श, बैत, रुबाई, धरू, कौल और कलवाना आदि गायकी में उन्हें महारत हासिल है.

अप्पा जी के समय में यह कहा जाता था कि आपकी डोलिया कौन उठा पायेगा अप्पा जी? चारों कहांर मिलकर उठायेंगे, तो भी ठुमरी, दादरा, कजरी और चैती को कौन उठा पायेगा? तब अपनी लीक पर ज्योति की मानिंद ठुमरी के सनातन प्रवाह को तेज करने के लिए गिरिजा जी का ही नाम आगे आया. सावन और कजरी गाने में उन्हें महानता हासिल है. ‘नहीं आये घनश्याम घिर आयी बदरी’ या ‘भीगी जाऊं मैं पिया बचाय लइहों’ जैसे सावनी गीतों को उन्होंने अमर बनाया है.

झूला गाने में, बारामासा गाने में, होली गाने में, भजन गानेमें भी उन्हें महारत हासिल था और ठुमरियों में नये अर्थ भरने में भी वे बड़ी गायिका थीं. नवाब वाजिद अली शाह द्वारा रचित ‘बाबुल मोरा नइहर छूटो जाये…’ गीत को राग भैरवी में गाकर गिरिजा जी ने अमर बना दिया. पूरी दुनिया में इस गीत को गाया जाता है, लेकिन माना जाता है कि गिरिजा देवी की आवाज में यह सबसे ज्यादा कर्णप्रिय लगता है. ठुमरी के रागदारी को अगर बनारस घराने में देखा जाये, तो चार बड़े राग हैं- पीलू, झिंझोटी, खमाज और कौशिक ध्वनि. इन चाराें रागों को लोकप्रिय किया और एक बड़े स्तर पर पहुंचाया.

इस लोकप्रियता का आलम यह हुआ कि इस तरह के रागों पे आधारित बहुत सारे फिल्मी गीत बनाये जाने लगे. बहुत सारी फिल्मों में जो मुजरा गीत बनते थे, वे राग खमाज पर ही आधारित होते थे. ये सारी बातें ही गिरिजा देवी का बड़ा बनाती हैं. एक कलाकार के रूप में उनकी महानता या लोकप्रियता का आलम इस बात से लगाया जा सकता है कि 88-89 साल की उम्र में उनका अवसान हुआ, जिसमें 70 साल उनकी गायिका का लंबा कालखंड रहा है.

एक प्रसंग याद आता है. आज से लगभग आधी सदी पहले नैना देवी के द्वारा दूरदर्शन के लिए बनाये जा रहे एक कार्यक्रम में बनारस की पूरब-अंग गायिकी पर रसूलनबाई और सिद्धेश्वरी देवी आपस में बात कर रही थीं. तभी अचानक रसूलनबाई ने पूछा- ‘हम दोनों के बाद आगे की पीढ़ी में क्या बचेगा?’ इस सवाल पर आश्वस्त सिद्धेश्वरी देवी ने उत्तर दिया- ‘अपनी गिरिजा है ना!’ इस मामले में गिरिजा जी को महान कहा जायेगा, क्योंकि सभी बड़ी गायिकाओं के जाने के बाद उनकी परंपरा को इन्होंने न सिर्फ बरकरार रखा, बल्कि आगे भी बढ़ाया.

दुनियाभर के सम्मान, फेलोशिप, पद्म श्री, पद्म भूषण, पद्म विभूषण, गान सरस्वती, संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, के साथ ही उन्हें बहुत से सम्मानों-पुरस्कारों से नवाजा गया. लेकिन, शास्त्रीय गायन के लिए ये सम्मान-पुरस्कार नहीं, बल्कि गिरिजा देवी का सिर्फ नाम ही काफी है. यह बहुत दुखद है और दुर्भाग्यपूर्ण भी कि उनके जाने से शास्त्रीय गायिकी की एक समृद्ध परंपरा समाप्त हो गयी. क्योंकि, जो बात गिरिजा देवी की गायिकी में थी, अब वैसी बात अब कब और किसकी आवाज में देखने को मिलेगी, यह कहना असंभव सा जान पड़ता है.

यतींद्र मिश्र
लेखक
साभार: प्रभात खबर

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