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बिहार के अखौरी सिन्हा के नाम पर अमेरिका में पहाड़

वो कहते हैं न, पहाड़ ढाहने जैसा कठिन काम. इन्होंने तो पहाड़ बना दिया है. जी हां, उपलब्धियों का पहाड़. बक्सर के चुरामनपुर गांव निवासी अखौरी सिन्हा ने ऐसा कर दिखाया, जिस पर बिहार गुमान करे. यह देश के लिए गर्व की बात है कि इस इंडो-अमेरिकन साइंटिस्ट के नाम पर अमेरिका सरकार ने अंटार्कटिका के एक पहाड़ का नाम माउंट सिन्हा रखा है.

यह शायद पहला मौका है, जब किसी भारतीय को इस तरह का सम्मान मिला हो. अमेरिका में माउंटेन मैन के ताज से नवाजे गये प्रो सिन्हा वहां की मिनेसोटा यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर हैं. वह इन दिनों अपने पैतृक गांव आये हुए हैं.

ऐसे हुआ पर्वत का नामकरण
माउंट सिन्हा की हाइट 990 मीटर है. कडोनाल्ड पर्वत शृंखला के दक्षिणी हिस्से एरिकसन ब्लफ्स के दक्षिण पूर्वी छोर पर स्थित है. प्रो सिन्हा ने बताया कि कोई भी गूगल या बिंग डॉट कॉम पर माउंट सिन्हा देख सकता है.

सिन्हा उस दल के सदस्य थे, जिसने 1972 व 1974 में बेलिंगशॉसेन और आमंडसेन समुद्री क्षेत्र और ग्लेशियरों में सील, व्हेल और पक्षियों की गणना की थी. सिन्हा ने बताया कि वर्ष 1972 और 1974 में वह 22 सप्ताह के लिए यूएस कोस्ट गार्ड कटर्स, साउथविंड और ग्लेशियर पर दो अभियानों के लिए गये थे, जिसके बाद अमेरिका ने इस पहाड़ का नामकरण उनके नाम पर किया.

मिट्टी से प्यार, खिंच लाता है बिहार  
अखौरी सिन्हा कहते हैं कि वर्षों तक विदेश में रहने के बाद भी अपने गांव की मिट्टी से जुड़े रहने में आत्मीयता है. यह किसी पेड़ की शाखा से टहनियों और पत्तों के लगे रहने के जैसा है. पत्ता टूटा, तो अस्तित्व खत्म. उन्होंने बताया कि वर्ष 1739 में नादिर शाह द्वारा दिल्ली पर आक्रमण के बाद उनके पूर्वज दिल्ली से बक्सर आकर बस गये थे. संबंधियों, दोस्तों और अन्य लोगों से मिलने के लिए वह लगभग हर साल अपने गांव चुरामनपुर आते हैं.

पटना विवि से भी की है पढ़ाई
आरा के जिला स्कूल से मैट्रिक व इलाहाबाद विवि से विज्ञान में स्नातक करने के बाद वर्ष 1956 में पटना विश्वविद्यालय से प्राणी विज्ञान में स्नातकोत्तर किया है. वह रांची कॉलेज में नवंबर, 1956 से जुलाई, 1961 तक अध्यापक रहे. इसके बाद नेशनल साइंस फाउंडेशन अंटार्कटिक प्रोग्राम के तहत सीलों के प्रजनन पर शोध के लिए अमेरिका गये.

यह रहा अफसोस
प्रो सिन्हा बताते हैं कि दो वर्ष पूर्व उनके सम्मान में साइंस कॉलेज पटना में कार्यक्रम आयोजित किया गया था, लेकिन उनकी इच्छा के बावजूद उन्हें एक अदद पीएचडी की उपाधि नहीं दी गयी. इसका उन्हें अफसोस है. हालांकि, साइंस कॉलेज की इस वर्ष 100 वीं वर्षगांठ पर उन्हें पीएचडी की उपाधि मिलने की उम्मीद है.
साभार: प्रभात खबर  

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