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ब्रिटेन की औद्योगिक क्रांति और पटना

मध्यकाल में पटना की शोहरत देश की सरहदों को लाँघ कर विदेशों तक पहुँच गई थी। यह पटना का स्वर्णिम काल  था। पटना उत्पादन और व्यापार के  केंद्र के रूप में देश ही नहीं विदेशों में भी मशहूर हो गया था।

17 वीं सदी में पटना  की शोहरत और उसका महत्व हिंदुस्तान के एक ऐसे शहर के रूप में हो गई थी, जिसके व्यापारिक सम्बन्ध यूरोप, एशिया और अफ्रीका जैसे महादेशों के साथ थे।

पटना की शोहरत सिल्क और सूती कपड़ों के व्यापारिक केंद्र के रूप में भी थी। पटना के आसपास के पचास मील का इलाका रुई के उत्पादन में लगा हुआ था। सूती कपड़ों के दो खास किस्म एम्मरटीज़ और कैलिको(सफ़ेद कपड़ा) के लिए पटना विशेष रूप से प्रसिद्ध था।  1683 में मनूची ने पटना में कई व्यापारियों को उम्दा किस्म से सफ़ेद सूती कपड़ों का कारोबार करते पाया था।

पटना अपने उत्कर्ष पर था। मुग़ल साम्राज्य के बिखराव का फायदा भी पटना को मिल रहा था। यह और भी समृद्ध होता चला जा रहा था। रईसों, सूफी, संतों,शायरों, कलाकारों सिपाहियों और विभिन्न पेशों से जुड़े लोगों का दिल्ली से पटना जारी था। फलस्वरूप 18 वीं सदी में पटना मुग़ल संस्कृति का महत्वपूर्ण केंद्र भी बन गया था।

उन्हीं दिनों ईरानी यात्री बाहाहानी पटना आया था। पटना को देख उसने लिखा था, ‘यह रोचक और सस्ता शहर है। यहां का मौसम बहुत ही सुहाना है। यहां के बाज़ार में विभिन्न प्रकार की खाद्य वस्तुएं और उम्दा किस्म के कपड़े मिलते हैं। ये सभी चीजें यहां से दूसरी जगहों पर ले जाये जाते हैं। बंगाल ही नहीं पूरे हिंदुस्तान में इतनी क्षमता वाला कम ही शहर होंगे।  पटना को अगर  ‘जन्नतु’ ल हिन्द’, हिंदुस्तान का जन्नत कहा जाय तो गलत नहीं होगा।’

फिर ईस्ट इंडिया कंपनी का आगमन हुआ। वे यहां व्यापार करने आये थे। एक चतुर व्यापारी की तरह उन्होंने यहां के बाजार का भरपूर दोहन किया। फिर जब उनके हाथों में हुकूमत आई तो उन्होंने अपने फायदे के लिए यहां के उद्योग धंधों को नष्ट ही कर दिया।

बदलते हुए समय ने यहां के बाशिंदों पर भी प्रभाव डाला। कोई भी अछूता नहीं रह गया था। पटना के एक शायर ग़ुलाम अली रसिक(1749-1823) ने अपनी मसनवी (विवरणात्मक कविता) में उस वक्त की पीड़ा को व्यक्त किया है। उसने लिखा है, ‘अज़ीमाबाद, जो कभी गुलाबों की सेज थी अब काँटों का बगीचा बन गया है। एक बगीचा जहां का बसंत अब पतझड़ बन गया है।’

उसने आगे लिखा है, ‘अब यह बगीचा बिना पत्तों का रह गया है, भयावह हो गया है यह। कोई भी अवशेष नहीं बचा उन अद्भुत दिनों का। कोई भी दौलतमंद नहीं बचा इस बगीचे में, कोई भी धनी व्यक्ति नहीं जो इसे फूलों की तरह गमका सके।’

रसिक ने पटना के बाशिंदों की दुर्गति पर लिखा है, ‘सभी मुफलिसी के हो गए शिकार, गरीबी ने बख्शा नहीं किसी को। कहां गए वे सुख के दिन,बगीचे की घुमक्कड़ी गयी कहां। अब उन सुखों को कौन याद करे, अब किसी को फुरसत कहां। सोने चांदी की उम्मीदें खत्म हुई, पीले चेहरे और सफ़ेद आंसू ही हैं यहां।’

उसने लिखा है,’ जो रईस थे अब शाम की रोटी के लिए भटक रहे हैं, अमीर भिखारी बन गए। सम्राट, मंत्री सब हो गए कंगाल, एक वक्त के रईसों को अब खैरात भी नहीं। अब सड़क की धूल ही उन पेशानियों पर दिखती है, जिन पर थे कभी हीरे जवाहरात। गद्दे कालीनों पर सोने वालों को अब ताड़ की चटाई भी मयस्सर नहीं। सैकड़ों गुलाम लड़के लड़कियों को रखने वाले रईस, अब जिंदगी बचाने खुद को लगे बेचने। महलों हवेलियों में रहने वाले अब मकड़ी के जालों के बीच कर रहे गुजर।’

ग़ुलाम अली रसिक ही अकेले नहीं थे जो बर्बाद हो रहे पटना की पीड़ा से व्यथित थे। शाह  अयातुल्लाह जौहरी ने भी 1750 या 1760 में शहर-ए-आशोब में इसे व्यक्त किया है।

ब्रिटेन में जो औद्योगिक क्रांति हुई, उसे जो समृद्धि मिली, वह पटना जैसे शहरों की कीमत पर ही थी।

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