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ब्रितानी कलकत्ता और डैलरिंपल के पूर्वज

 

bbc-hindiऔपनिवेशिक काल में ब्रिटिश जनरल क्लाइव ने लिखा था, “कोलकाता दुनिया की सबसे शैतान जगहों में से एक है. यह अवधारणा से ज़्यादा लालसापूर्ण और भव्य है”.

अठारहवीं सदी के आख़िर में बंगाल में ब्रिटिश मोर्चा इसी शहर में था. जो महलों का शहर था. जहां ब्रिटिश वास्तुकला की शानदार हवेलियां मौजूद थीं और यह शहर ब्रिटेन के विदेशी व्यापार केंद्रों में एक आभूषण की तरह था. यह एक ऐसा शहर था जहां महीनों में अपार धन कमाया जा सकता था और उसे ताश की बाज़ी में मिनटों में गंवाया जा सकता था.

यहां बीमारियों या बहुत ज़्यादा शराब पीने से किसी की मौत होना बहुत ही आम बात थी. लगातार किसी न किसी की मौत होते रहने से यहां के लोग बेदर्द हो चुके थे. वो किसी क़रीबी की मौत पर थोड़ी देर के लिए शोक मनाते थे, फिर शराब के लिए बोली लगाने निकल पड़ते थे. पिछली दो सदियों में कई स्कॉटिश की तरह मेरे परिवार की भी कई पीढ़ियां यहां पैदा हुईं, ज़िंदगी गुज़ारी और यहीं उनकी मौत भी हुई.

कलकत्ता (अब कोलकाता) में उनके मकान और क़ब्र आज भी पूरे शहर में बिखरे पड़े हैं. उनमें से पहला नाम था स्टेयर डैलरेंपो का जो 1756 के काल कोठरी के हादसे में मारे गए थे और उनका नाम आज भी सेंट जॉन्स चर्च के स्मारक में मौजूद है.

मेरे परदादा वॉल्टेयर का जन्म वहां क़रीब एक सौ साल पहले हुआ था. इसलिए अब मैं ख़ुद को थोड़ा बहुत बंगाली मानने लगा हूं. मेरे परिवार में शायद यह बात किसी को मालूम नहीं हो हालांकि यह उनके लिए कोई हैरत की बात नहीं होनी चाहिए.

हम सबने यह सुन रखा है कि कोलकाता में जन्मी नीली आंखों वाली हमारी परदादी कितनी खूबसूरत थी. सोफिया पैटल जिनसे पेंटर एडवर्ड बुर्न को प्यार हो गया था, वो अपनी बहनों से बंगाली में बात करती थीं. उनकी एक पेंटिंग फ़्रेडरिक वॉट्स ने बनाई थी जिसमें एक राखी भी दिख रही है.

यह हिन्दुओं का एक पवित्र धागा होता है जो उनकी हथेली पर बंधा हुआ था. यह सब मुझे तब मिला जब मैंने कुछ पुराने अभिलेखों को खंगाला. मुझे पता चला कि उनको और वॉल्टेयर को चंदननगर की एक महिला ने जन्म दिया था जो कैथोलिक बन गई थीं और उन्हें मैरी मोनिका नाम मिला था. मैरी मोनिका ने एक फ़्रांसिसी अधिकारी से शादी की थी.

मैं हाल ही में दुर्गा पूजा देखने के लिए कोलकाता गया था. यह कोलकाता का एक बड़ा सालाना त्योहार होता है. मैंने वहां मिट्टी और पुआल से उस्ताद कारीगरों के हाथों बनाई देवी की मूर्ति देखी. इस मूर्ति की दस दिनों तक पूजा की जाती है और अंत में गंगा में विसर्जित कर दी जाती है.

इसी तरह की एक पूजा का आयोजन करने वाले अभय भट्टाचार्य ने कहा, “इतनी खूबसूरत मूर्ति को नदी में विसर्जित करने से मेरा दिल दुखता है. यह आंसुओं से भी बड़ा दुख है. दुर्गा हमारी मां हैं. जिस दिन हम मूर्ति का विसर्जन करते हैं उसी दिन से अगली दुर्गा पूजा के दिन गिनने लगते हैं”.

दुर्गा पूजा के बाद मैं अपने खो चुके कुछ बंगाली जड़ों को तलाशने के लिए चल पड़ा. मैंने उन क़ब्रों, स्मारकों, मकानों और हवेलियों की सैर की जिनका हमारे पूर्वजों से रिश्ता रहा है.

मैं उत्तरी कोलकाता में मौजूद मलिक ख़ानदान के विशाल मार्बल पैलेस से लेकर नेशनल लाइब्रेरी, जो वॉरेन हेस्टिंग्स के वक़्त शासन का केंद्र था, साउथ पार्क स्ट्रीट के क़ब्रिस्तान और सेंट जॉन्स चर्च तक गया. सेंट जॉन्स चर्च में ही मेरी परदादी को ईसाई बनाया गया था. मैं जर्जर हो चुकी उस हवेली में भी गया जहां, उनकी परवरिश हुई थी.

जब मैंने देवी की मूर्ति को प्रिंसेप घाट पर विसर्जित होते हुए देखा तो मानो दोनों ही दुनिया एक साथ आ गई. इस घाट का नाम मेरे ही एक पूर्वज जेम्स प्रिंसेप के नाम पर रखा गया है.

उन्होंने ही सबसे पहले अशोक के स्तंभों पर लिखी खरोष्ठी और ब्राह्मी लिपि को पढ़ने में सफलता पाई थी और उसके बाद ही भारत के इतिहास को नए सिरे से जानने का मौक़ा मिल पाया. उस लिपि को समझने की कोशिश में जेम्स को अपनी जान तक गंवानी पड़ी. उनके दिमाग़ में बीमारी हो गई थी और दिमाग़ ने बनावटी व्यवहार करना शुरू कर दिया था. उसके बाद उन्हें उनके घर हरफ़र्डशर भेज दिया गया.

सेंट जॉन्स चर्च की एक दीवार पर मैंने अपने सबसे पसंदीदा पूर्वजों में से एक जेम्स पैटल का स्मारक देखा जो मेरे परदादा थे.

पैटल ‘भारत में सबसे बड़े झूठे’ के रूप में मशहूर हो गए थे जब उन्होंने कथित तौर पर यह दावा किया था कि उन्होंने मुर्गियों को ढकने वाले टोकरे में बैठकर अटलांटिक महासागर को पार किया है. उनके ही ख़ानदान के एक और सदस्य वर्जीनिया वुल्फ़ ने ख़ुद भी मेरी ही तरह अपने बंगाली ख़ून का ज़िक्र किया है.

उनके यात्रा विवरणों के मुताबिक़ पैटल ने शराब पीते-पीते अपनी जान दे दी थी और समुद्री रास्ते से इंग्लैंड वापस ले जाते हुए उनके शरीर को रम के डब्बे में भरकर रखा गया था.

वर्जीनिया ने लिखा है, “पैटल की पत्नी ने इस डब्बे को अपने कमरे के बाहर ही दरवाज़े के पास रखा था. आधी रात को एक ज़ोरदार धमाका होने के बाद उनकी विधवा भागते हुए बाहर आईं तो देखा कि वह कंटेनर फटा हुआ था और उनके पति का आधा शरीर अंदर और आधा बाहर निकला हुआ था. ठीक उसी वक़्त उनका भी मानसिक संतुलन बिगड़ गया और वो पागल होकर मर गईं”.

वर्जीनिया वुल्फ़ के मुताबिक, “लेकिन सबसे बुरी घटना अभी होनी बाक़ी थी, पैटल की लाश वाले कंटेनर को जहाज़ पर लादा गया और जहाज़ के चलने के कुछ देर बाद ही नाविकों को लगा कि यह शराब के भरा हुआ है. उन लोगों ने इसमें एक सुराख़ कर दिया और शराब पीने लगे. इससे रम (शराब) लगातार बाहर निकल रहा था जिसमें आग लग गई और जहाज़ भी आग की लपटों से घिर गया”.

उन्होंने आगे लिखा है, “शराब के नशे में जब नाविक आग पर काबू पाने की कोशिश कर रहे थे तभी वह जहाज़ एक चट्टान से टकरा गया और आग में पूरी तरह जल गया. इस तरह से पैटल का दाह संस्कार हो गया, जैसी कि उनकी इच्छा थी, न कि उन्हें दफ़नाया गया”.

(विलियम डैलरिंपल मशहूर लेखक और इतिहासकार हैं. उनकी हाल ही में लिखी हुई किताब का नाम है ‘ रिटर्न ऑफ़ ए किंग: द बैटल ऑफ़ अफ़ग़ानिस्तान’.)

साभार: बीबीसी हिंदी 

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