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भारतीय मीडिया सत्ता की भजन मंडली बन गई है

‘भारत से ज्यादा काॅरपोरेटाइज मीडिया अमेरिका का है। वहां के अंतर्विरोधों,नाकामियों को जिस तरह की चुनौती वह दे रही है, वैसी चुनौती भारत की मीडिया नहीं पेश कर रही। भारत की काॅरपोरेट मीडिया सत्तारूढ़ दल की भजनमंडली बन गई है। डोनाल्ड ट्रंप के इंटरनल पाॅलिसी की अमेरिकी मीडिया में जितनी आलोचना है उसकी हम अपने भारत के संदर्भ में कल्पना भी नहीं कर सकते। इसका मतलब है कि आपके देश का काॅरपोरेट ही सता का घुटनाटेकू बन गया है।

अमेरिका के काॅरपोरेट के साथ ऐसी बात नहीं है। वहां के काॅरपोरेट में डावर्सिटी है। फिलिस्तीन और साउथ एशिया को लेकर उन सब की अपनी अलग-अलग राय है। भारत की मीडिया को संचालित कर रहे काॅरपोरेट की संरचना, उनकी सोच और उनके पर्सपेक्टिव इकतरफा है। यह जम्हूरित के लिए भी खतरा है और मीडिया के लिए तो खतरा है ही।’

ये बातें वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश ने बिहार कलेक्टिव द्वारा आयोजित अपने एकल व्याख्यान ‘भारतीय मीडिया किसकाः किसके लिए और किसके द्वारा’ में कही।

पटना के बिहार इंडस्ट्रीज एसोसिएशन हाॅल के सभागार में आयोजित इस सेमिनार में तकरीबन 200 से ज्यादा लेखक संस्कृतिकर्मी एवं एक्टिविस्टों ने शिरकत की। उन्होंने उर्मिलेश से कई तरह के सवाल भी किए जिसका उन्होंने उत्तर दिया।

उर्मिलेश ने कहा कि जिस तरह का घटनाक्रम इस देश में हो रहा है उससे मीडिया का कनेक्शन बहुत महत्वपूर्ण हो गया है। उन्होंने संक्षेप में भारत में प्रेस के आगमन, उसके विस्तार और चाल-चरित्र पर रौषनी डाली। कहा कि भारत में अंग्रेजी, हिंदी उर्दू के अखबार तकरीबन आसपास निकले। उतंड मार्तंड 1826 में युगुल किशोर शुक्ल के संपादन में कलकता से निकला। वहीं से 1856 में दैनिक समाचार सुधा का प्रकाशन हुआ। जिसे हरिहर दता ने निकाला। 1822 में उर्दू गाइडलाइन का प्रकाशन हुआ। सदासुखलाल ने इसे निकाला। बाद में इसका प्रकाशन दिल्ली से होने लगा। दिल्ली से बाद के दिनों में छोटे-छोटे कई सारे अखबार निकलेे। उस दौर के इन अखबारों को आजादी की लड़ाई को कन्ट्रीब्यूट करना था। हिन्दुस्तान को एक मुल्क के रूप में देखेने और अंग्रेजी दास्तां से मुक्त इन अखबारों के मुख्य लक्ष्य थे।

यह अकारण नहीं कि उस दौर की पत्रकारिता बहुत आजाद ख्याल थी। उन्होंने माना कि आज आकार-प्रकार में मीडिया बहुत बढ़ा है। उस समय अखबार प्रेस इवाॅल्व हो रहा था तो आम आदमी की आवाज था। सबके परिप्रेक्ष्य में अजीब किस्म की समानता दिखती थी। आज भी इन अखबारों में एकरूपता है। लेकिन उसके कंटेट वही नहीं है जो तब की पत्रकारिता के रहे। उस समय की पत्रकारिता में साहित्य और विचार, संस्कृति और समाज सबका का समुच्चय बनाने की कोशिश की गई थी।

उर्मिलेश ने कहा कि आर.एन.आई और पहला प्रेस आयोग का गठन, नेहरूजी के दौर में किया गया। प्रेस काउंसिल आॅफ इंडिया अस्तित्व में आई। उन्होंने कहा कि शुरुआती दौर में मीडिया के पीछे तीन तरह के लोगों की ताकते थीं पहला ट्रस्ट काॅपरेटिव के मातहत संचालित मीडिया थी दूसरा इंडिविजुअल फैमिली के तहत संचालित होती थी मीडिया। तीसरे अंग्रेजी मीडिया को जूट इंडस्ट्री चलानेवाले लोगांे ने टेकआॅवर किया। इधर के दिनों में इसमें दो नई कैटोगरी जुड़ी है।

अब राजनीतिज्ञ भी अखबार निकालने लगे हैं। एक जमाने में बिहार में ‘पाटलिपुत्र टाइम्स’ अखबार आया। दक्षिण भारत में भी राजनीतिज्ञ दलों के अखबार और टेलिविजन मिलेंगे। रियल स्टेट में काम करनेवाले लोग भी आज अखबार निकाल रहे हैं। कई अखबारों का आॅनरशप अरबपति बाबाओं के पास भी है। आजकल माफिया और गुंडे भी अखबार निकाल रहे हैं। पहले मिशनरीज जील से प्रेरित प्रेस संचालित हुआ करते थे। आज इन क्षेत्रों के लोग इसमें जुटे हुए हैं।

प्रेस फ्रीडम को लेकर वैश्विक स्तर हुए सर्वे की चर्चा करते हुए उर्मिलेश ने कहा कि 180 देशों को लेकर किए गए इस सर्वे में भारत का स्थान 136वें स्थान पर है। उन्होंने वर्तमान सत्ता संरचना को टारगेट करते हुए कहा कि हम सुपर पावर बनने के लिए अमेरिका की गलबहियां कर रहे हैं और प्रेस फ्रीडम को लेकर हमारी स्थिति इतनी विकट है। असमानता का ग्लोबल इंडेक्स देखें। 180 देशों में भारत 135वें स्थान पर है। हयूमन डेवलपमेंट इंडेक्स में भारत 131वें स्थान पर है।

उन्होंने कहा कि विकास का मतलब जीडीपी नहीं होता। हमारे लोग कितने स्वस्थ हैं, षिक्षित कितने हैं। हमसेे बेहतर भूटान, नेपाल और बांग्लादेश हैं। अगर आप ये जश्न मनाना चाहते हैं कि हम पाकिस्तान से बेहतर हैं तो मनाइए। उन्होंने कहा कि जिन देशों में जनतंत्र मजबूत है, जीवन स्थितियां बेहतर हैं, वहां-वहां प्रेस भी आजाद है। नार्वे प्रेस फ्रीडम में 1 नंबर पर है। डेनमार्क, स्वीडन, हाॅलैंड आदि मुल्क इस मायने में अन्य मुल्कों से बेहतर हैं। अमेरिका दुनिया का सबसे ताकतवर देश है और प्रेस फ्रीडम में उनका स्थान 49वां है।

उन्होंने माना कि बुनियाद तौर पर मीडिया की समस्या जनतंत्र का नहीं होना है। क्राॅस मीडिया, आॅनरशिप, क्राॅस मीडिया होल्टिंग को एक ही उद्योग का घराना चैनल, अखबार और ढेर सारे बिजनेस कर रहे हैं। हमारे पास इसका कोई प्रावधान नहीं है कि हम क्राॅस होल्टिंग को कंट्रोल कर सकें।

उर्मिलेश ने कहा कि जो विकृतियां हमें अपने समाज और सियासत में दिखती है वह मीडिया में भी है। अंग्रेजी मीडिया में थोड़ी.बहुत परिपक्वता दिखती है। भाषाई पत्रकारिता के कुछेक अपवादों को छोड़कर हालत यह है कि क्या छापना हैए क्या नहीं छापना है इसका कोई हिसाब नहीं है। उन्होंने एक साध्वी को टारगेट करते हुए बतलाया कि वे समाज में घृणा फैलाती हैं। कहती हैं कि जो मांस खाए उसका सर कलम कर दें। अंग्रेजी के अखबार उन्हें नहीं छापते। लेकिन हिंदी के अखबार गोवा जाने की भी उनकी खबर 7.8 काॅलमों में छापते हैं।

एक ऐसी ही साध्वी हैं जो साहबजादे से रामजादे जैसी भड़काउ भाषण के लिए कुख्यात हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे ही लोग रातों.रात आज इस देश में नेता बन रहे हैं। हम उस देश के लोग हैं जहां लोग जेल जाते थे लाठियां खाते थे तब नेता बनते थे। अब गाली देकर नेता बन जाते हैं। यह सेहरा मीडिया को है। उन्होंने कहा कि आज लगभग हर राजनीतिक दलों में मीडिया मैनेजमेंट कमिटी है। बकायदा उसका बजट है। ऐसे में सहज ही सवाल उठता है कि जिसका प्रबंधन ही राजनीतिक दलों के दफ्तर से हो रहा है वह मीडिया आम आवाम की आवाज कहां से उठाएगा। जैसा समाज रहेगा वैसा मीडिया रहेगा। समाज में चीजें बिगड़ी हैं। दिमाग में जो बातें हैं वह मीडिया में तो आएगी ही। उन्हें लोकतांत्रिक भारत नहीं चाहिए। उन्हें हिंदू भारत चाहिए।

उन्होंने कहा कि राष्ट्र लोकतंत्र और सेकुलरिजम एक आधुनिक धारणा है। वे तो मानते हैं कि हम विश्वगुरु शुरू से रहे हैं। फ्रांसीसी क्रांति ने पूरे राष्ट्रों को किरदार के पूरे चरित्र को बदलकर रख दिया। संस्थागत प्रयासए गर्वेनेंस के द्वारा डिजर्वेषन के द्वारा इन शक्तियों को ताकत मिली।

उर्मिलेश ने कुछ दृष्टांतों के माध्यम से भारतीय मीडिया के स्याह पक्ष को रहस्योद्घाटित किया। उन्होंने कश्मीर के 1953 की परिघटना की चर्चा करते हुए कहा कि जम्मू कश्मीर में शेख अब्दुला की सरकार ने पहली बार भूमि सुधार लागू किया। इस कारण उन्हें अपनी सता गंवानी पड़ी। इस घटना को लेकर कश्मीर में एक सघन आंदोलन चलाए लेकिन उसकी कोई खबर वहां के अखबारों में नहीं आई। उनकी गिरफ्तारी की खबर भी महज एक काॅलम में छपी।

हिंदी के किसी अखबार ने यह बतलाने की कोशिश नहीं की कि उनकी गिरफ्तारी भूमि सुधार के कारण की गई। 1959 में कम्युनिस्ट पार्टी के पहले निर्वाचित मुख्यमंत्री नम्बूदरीपाद बने। वहां के राज्यपाल ने केंद्रीय नेताओं के बहकावे पर उस सरकार को बर्खास्त कर दिया। भूमि सुधार और शिक्षा बिल.इन दोनों के कारण ही उनकी सरकार को डिसमिस किया गया। उनकी अपनी पार्टी मैगजीन को छोड़कर लगभग सभी अखबारों ने केंद्र का समर्थन किया।

इंदिरा गांधी की सरकार में बैंकों और खादानों का राष्ट्रीयकरण एक युगांतकारी कदम था। उन्होंने प्रीवी पर्स खत्म किया। इंदिरा जी कुलीन ब्राहण की बेटी थीं बावजूद इसके भारतीय प्रेस का रूख उनके प्रति बहुत सकारात्मक नहीं रहा। आपातकाल के समय एक दो अपवादों को छोड़कर हालत यह हो गई कि सारा भारतीय प्रेस केंचुआ बन गया। सता के सामने रेंगने लगा। पंजाब में इतना बड़ा घटनाक्रम घटित हुआ। भिंडरावाले आतंकवाद इन तमाम मामले में दिल्ली का प्रेस और हिंदी प्रेस हिंदू प्रेस बन गया।

अब तक 23.24 नृशंस हत्याएं लव जिहाद गोमांस टोपी और जुबान देखकर की गई लेकिन हिंदी के अखबारों ने इस आपराधिक घटना को शायद ही कभी गंभीरता से लिया हो। यह तो पेशेवर ईमानदारी के भी खिलाफ है। यह बिडम्बनापूर्ण बात है कि आज एक भी दलित आदिवासी और मुसलमान संपादक नहीं हैं।

उन्होंने कहा कि मंडल आयोग की अनुशंसाए जब लागू की गईं तो उस समय भारतीय प्रेस का रवैया देखने लायक था। 370 पेज की उस रिपोर्ट को पढ़े बगैर लोग आग लगाने लगे। मंडल को महज आरक्षण का पर्याय बना दिया गया। कृषि रोजगार स्किल्ड डेवलपमेंट के बारे में उसमें क्या है वह अपने समय के चर्चित सचिव एस गिल के हाथों लिखी गई। उसमें टाटा इंस्टीच्यूट और अन्य कई स्रोतों से रिसर्च स्काॅलर की मदद ली गई। ऐतिहासिक दस्तावेज के तौर पर जारी इस रिपोर्ट को नेताओं ने तो नहीं ही पढ़ा अखबारों ने उसे पढ़े बगैर उस पर संपादकीय लिखे।

एक मस्जिद को विवादित ढांचा में तब्दिल कर दिया गया। आपने इतिहास को नहीं पढ़ा। फिर किस हैसियत से यह घृणा फैलाई। उन्होंने कहा कि पत्रकार का काम जाति का काम नहीं है। उसका काम सूचना और ज्ञान का काम है। इसका मतलब है कि कुछ.न.कुछ समाज में पका रहे हैं। मैन्यूफैक्चरिंग। इंडियन प्रेस भी वही कर रहा है। संस्थागत संरचनाएं व्यक्तिगत अस्मिताएं हैं। इन दिनों सच बोलना भी दुस्साहस करना है। इकोनौमिक्स रिफार्म का मामला आया। अंग्रेजी अखबार उसके आर्थिक सुधारों का सबसे बड़ा पैरोकार बन गया। आर्थिक सुधारों का जो मानवीय चेहरा एकतरफा ही नहीं एक पक्षीय रहा। यह कहीं.न.कहीं दबाब में काम कर रहा था।

1989.91 के चुनाव में मेनीफेस्टो में किसी वायदे के बावजूद आर्थिक सुधार लागू कर देते हो। आधार नंदन नीलकेणी के माध्यम से मनमोहन सिंह ने कोई विधाई इनीसिएटिव नहीं इसपर मीडिया ने कोई सवाल नहीं उठाया। जिनको नाॅर्थ इस्ट के राज्यों के बारे में नहीं मालूम वे जीएसटी के बारे में प्रचारित कर रहे हैं कि अगली सुबह ये बदल जाएगा वो बदल जाएगा।

मजदूरों बुनकरों छोटे चायवालों का क्या होगा कोई प्रक्रिया तो अपनाई जानी चाहिए। प्राइम टाइम में इन सवालों को उठाने की कोशिश की गई। इतनी निराशापूर्ण घड़ी के बावजूद बेहद सुंदर साहसी अपवाद भी हमारे समाज में रहे हैं।

भारत सरकार ने दो ऐसे कदम उठाए आर्थिक सुधार की बाबत। एसीजेड कानून दो मिनट में बन गया था। बिना किसी चर्चा के इसके तहत महाराष्ट्र के रायगढ़ में सैकड़ों एकड़ जमीन एक्वायर की गई। इसे एक बड़ी कंपनी ने एक्वायर कर लिया। ये इस देश के सबसे ताकतवर लोगां के करीब थे। वहां संयोग से एक सिरफिरे कलक्टर थेए जो रेवेन्यू के भी इंचार्ज होते हैं। उन्होंने जनविद्रोह की भावना को समझा और इसपर जनमत संग्रह का आॅर्डर कर दिया।

जिलाधिकारी ने सरकारी दबाव के बावजूद अपने आदेश को विड्रा नहीं किया। हिंदू और कुछ मराठी अखबारों ने उनको सपोर्ट किया। फलतः सरकार को पीछे हटना पड़ा। इसी तरह की अंतरराष्ट्रीय स्तर की एक बड़ी कंपनी मेदांता और कुछ और कंपनियों ने उड़िसा के नियमगिरी और उसके 12 गांवों को एक्वायर कर लिया। उड़िसा के नियमगिरी और 12 गांवों के लोगों ने इसका प्रबल विरोध किया। इसपर सुप्रीम कोर्ट ने संज्ञान लिया और आदेश दिया कि रिफरंडम किया जाए।

इसपर राज्य सरकार को अपने फैसले से हटना पड़ा। नियमगिरी के 12 गांवों के इस महान कदम का कवरेज क्या आपने भारतीय मीडिया में पाया। आप किसकी कहानी कह रहे हैं। काॅरपोरेट पर आपकी घिग्घी बंध जाती है। दलित मुस्लिम का मामला आता है तो आप राणा प्रताप के चेतक बन जाते हैं। कश्मीर के पूरे घटनाक्रम को जितना वहां के अलगवादी नेताओं ने विकृत किया उतना ही मीडिया ने भी किया। वहां के लोगों ने गलतियां कीं लेकिन यह क्या कि जो कश्मीर के साथ है वह राष्ट्रद्रोही है। आज कश्मीर के खिलाफ पूरे देश को लगाया जा रहा है।

जो कश्मीर के साथ है वह ऐंटी इंडिया है। एक भी ऐसा ग्रुप नहीं प्रिेट में जहां आपको लोगां को लगाया हो। पायलेट गण लगाये गए। कई दिन बीत गए तब कई सौ का विज्ञापन छोड़कर कवरेज किया अन्न आंदोलन का आज वही आप पार्टी अब समस्या बन गई है। यह इन्वेंटेड मीडिया है। एक बड़े हिस्से को यह रोग जरूर लग गया है। मीडिया में सामाजिक तौर पर वर्चस्व इंडियन हिंदू अपर कास्ट का है। इसको लेकर 3 समाजषास्त्रीय आंकड़े हमारे सामने हैं।

एक बी एन उनियाल के हैं। वाशिंगगटन पोस्ट पर 197.98 7 सौ पत्रकार मान्यता प्राप्त थे दिल्ली में। लेकिन उसमें से एक भी दलित नहीं थे। सीडीसीएस ने 2006 में एक सर्वे किया। उसमें पाया गया कि 7 प्रतिशत दिल्ली स्थित एक ही कम्युनिटी का वर्चस्व है। मुस्लिम 2 कुछ प्रतिशत बहुत ही नौमिनल हैं। एजाज असरफ ने एक काम किया। आपको 10 निर्णकारी पोस्ट पर एक भी दलित नहीं है।

2013 में दक्षिण में केरलए आंध्रप्रदेश इन जगहों पर मीडिया में दलित आने लगे हैं। हमने उनका लेख पढ़ा। जम्हूरियत को अपने रक्त.मज्जा में समाहित नहीं किया। कांग्रेस का पूरा आधार भाजपा में चली गई। जब तक न्यूज रूम में विविधता नहीं आएगी जनतंत्र को बचाकर रखना भाारत जैसे मुल्क में बहुत कठिन काम है। 85 प्रतिशत लोगों का 10 प्रतिशत भी योगदान नहीं है। 1978 में अज्ञानता के एवरेस्ट खड़े कर दिए गए हैं। 57 प्रतिशत अमेरिकन प्रेस में अष्वेत आये हैं। जनतंत्र की समस्या मीडिया की भी समस्या है। हमारी राजनीति और अर्थनीति में भी विविधता नहीं है। हमें इन मसलों का हल ढूंढ़ना ही होगाए वरना हम स्वस्थ लोकतंत्र की दिशा में आगे नहीं बढ़ सकते।

अरुण नारायण
संपर्कः आश्वासन शाखा, उपभवन, बिहार विधान परिषद पटना-800015
मोबाइल 829225330

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