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मगही ही नहीं समकालीन साहित्य में अपने किस्म का दुर्लभ उपन्यास

‘मगही रचनात्मकता की दुनिया विमर्श प्रधान वृहत उपन्यास लेखन के मामले में बहुत ही कमजोर रही है। एक दौर में पूरे भारत को एक राह दिखलाने वाले मगध को शास्त्रों में किकट की संज्ञा दी गई। अश्विनी कुमार पंकज का उपन्यास ‘खांटी किकटिया’ मगही साहित्य के उपन्यास लेखन में अपने तरह का विरल प्रयास है। मगही का यह पहला उपन्यास है जो व्यापक फलक पर मगध क में विकसित हुई आजीवक दर्शन की परंपरा को उसके मूल सरोकार के साथ उसकी समग्रता में व्याख्यायित करता है।’

ये बातें अश्विनी कुमार पंकज के पहले मगही उपन्यास ‘खांटी किकटिया के लोकार्पण समारोह में शामिल वक्ताओं ने एक स्वर से स्वीकार की। टेक्नोहेराल्ड सभागार में बागडोर द्वारा आयोजित इस पुस्तक के लोकार्पण समारोह में लेखक अश्विनी के साथ प्रेमकुमार मणि, हरीन्द्र विद्यार्थी, घमंडी राम, धनंजय श्रोत्रिय, नरेन, नारायण प्रसाद और ओमप्रकाश जमुआर शामिल हुए। इस मौके पर लेखक ध्रुव गुप्त ने कार्यक्रम में धन्यवाद ज्ञापन किया और अरुण नारायण ने इसका संचालन किया। इस मौके पर महेन्द्र सुमन, विनय कुमार सिंह, जगनारायण सिंह यादव, नरेन्द्र कुमार, अस्मुरारी नंदन मिश्र, लता पराशर, संतोश यादव , प्रभात, नीतीश राय, अनंत सिन्हा, अरविंद कुमार आदि बड़ी संख्या में आये लेखकों ने हिस्सा लिया।

उपन्यास की चर्चा करते हुए प्रेमकुमार मणि ने कहा कि मगध के इतिहास की सबाल्टर्न व्याख्या करने वाली यह कृति बहुत ही बहसतलब है और रचनात्मक से भरी-पड़ी है। उन्होंने कहा कि अपने दौर में मक्खलि जनजातीय समाज के विघटन की पीड़ा को गहरे भोग रहे थे। अश्विनी ने बहुत ही गहनता के साथ लिखा है। उन्होंने माना कि अपने समय के दार्शनिक विमर्श, वैचारिक टकराव कभी इसी मगही भाषा में संभव हुए होंगे जिसे अश्विनी ने आज संभव किया है।

मगही लेखक घमंडी राम ने कहा कि वर्णव्यवस्था अपने देश में सदियों से अपने बर्बर रूप में विद्यमान रही है। लेखक ने ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में बौद्धकालीन समाज की सामाजिक राजनीतिक और आर्थिक जीवन की जो तस्वीर इस कृति में खींची है वह मगही साहित्य में अपनी वैचारिकता के लिए सदैव याद की जाएगी।

मगही लेखक धनंजय श्रोत्रिय ने कहा कि मगही के इतिहास लेखन में अश्विनी ने ‘खांटी किकटिया’ लिखकर एक ऐतिहासिक धरोहर मगध के समाज को सौंपा है। उन्हांेंने कहा कि मगध का समाज जिस विद्रूपता में गर्क रहा है उसकी तहकीकात लेखक ने बहुत ही बारीकी के साथ की है।

कवि हरीन्द्र विद्यार्थी ने कहा कि मगही में यह जर्बस्त क्वालिटी का उपन्यास है। इसकी जड़ों की पहचान करने वाला। अश्विनी ने गंभीर रिसर्च और शोध के फलस्वरूप से रचा है । इस तरह की किताबें समकालीन लेखन परंपरा में किसी भी भाषा में नहीं।

ओमप्रकाश जमुआर, लता पराशर और नूतन सिनहा ने भी ‘खांटी किकटिया’ के बारे में अपने विचार साझा किए।

कवि ध्रुव गुप्त ने कहा कि अश्विनी ने इतिहास और साहित्य की प्रचलित परिपार्टी से इतर गहरे रिसर्च और इतिहास बोध के साथ इस कृति की रचना की है। उन्होंने कहा कि अश्विनी बहुआयामी प्रतिभा से संपन्न लेखक हैं। इन्होंने आदिवासी भाषा में लंबे आंदोलन चलाये, पत्रकारिता की और अब मगही में भी लिक से अलग हटकर मक्खिली के जीवन को केंद्र कर उन्यास रचा।

लेखक अश्विनी कुमार पंकज ने मगध की ऐतिहासिक परंपरा पर विस्तार से अपनी बातें कहीं। उन्होंने मक्खिली की चर्चा करते हुए बतलाया कि उनके आजीवनक दर्शन के बारे में आज कोई भी प्राथमिक स्रोत नहीं हैं, ब्राहणवादी ग्रंथ, जैन ग्र्रंथ और बौद्ध साहित्य इन तीनों में मक्खिली के खिलाफ गजब की शत्रुता है इसका मतलब है कि कहीं न कहीं कुछ न कुछ ऐसा है जो उन्हें खास बनाता है। मेरी कल्पना ही इस उपन्यास का मूलाधार है। मातृभाषा की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि यह बैंक एकाउंट या डब्लू.टी.ओ नहीं है जिसका ऋण चुकता किया जाए।

अरुण नारायण,
बागडोर पटना
मोबाइल: 8292253306

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