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महामारी में होती थी काली की पूजा

हिंदुस्तान पर हुकूमत कर रहे अंग्रेज तत्कालीन समाज में फैले अंधविश्वास को विस्मय के साथ देखते थे। उन्हें यह देख आश्चर्य होता था कि बीमार होने पर लोग चिकित्सक की बजाय झाड़ फूंक के लिए ओझाओं और देवी देवताओं की शरण में जाते हैं।

ओ’ मैली हिन्दुओं के बीच सबसे लोकप्रिय देवी काली का जिक्र करता है। मंगल तालाब के नजदीक के कालीस्थान का उल्लेख करते हुए उसने लिखा है कि अपने विभिन्न रूपों में काली पूरे वर्ष भर हिन्दुओं द्वारा पूजी जाती हैं। दुर्गा के रूप में उन्हें शहर के रक्षक रूप में देखा जाता है। पटन देवी के नाम से पटना केआलमगंज मोहल्ले और चौक में उनकी दो प्राचीन मंदिरें हैं।

जब कभी शहर में चेचक का प्रकोप होता है तो वे शीतला माता के रूप में हिन्दुओं की ऊंची जातियों के साथ साथ निचली जातियों द्वारा पूजी जाती हैं। जब किसी को चेचक होता है तो मरीज के बिछावन के नजदीक की जमीन के छोटे टुकड़े को गोबर से लीपा जाता है। वहां आग प्रज्वलित कर उसपर घी डाला जाता है और हवन सामग्री जलाई जाती है। एक माली को बुलाया जाता है जो शीतला माता की गाना गा कर उनकी आराधना करता है। रोगी को मिठाई दी जाती है और उसे शीतला माता के प्रिय पेड़ नीम की टहनियों से पंखा झला जाता है।

ओ’ मैली को यह देख आश्चर्य होता है कि जब शहर में चेचक का प्रकोप होता है तो निम्न वर्ग के हिन्दू और मुसलमान शीतला माता के प्रकोप से बचने के लिए चेचक से बचाव वाला टीका अपने बच्चों को नहीं लगवाते हैं। वे डरते हैं कि शीतला माता इससे नाराज हो जाएंगी।

शीतला माता को लोग हैजा की भी देवी मानते हैं। शहर में जब हैजा फैलता है तो लोग लौंग और इलाइची मिले जल से जिसे ‘छाक’ कहा जाता है, अपने घर के मुख्य द्वार पर शीतला माता को संतुष्ट करने के छिड़काव करते हैं। लोग ब्राह्मणों को बुलवाकर शीतला माता की पूजा भजन गवाकर करवाते हैं।

इसी तरह लोग ‘बिघिन्न माई’ की भी पूजा करते हैं। इन्हें काली का अनुचर माना जाता है। जब हैजा महामारी के रूप में फैलता है तो शहर के चौराहे पर एक गड्ढा खोद कर उसमें अग्नि प्रज्वलित कर हवन किया जाता है। ‘बिघिन्न माई’ को मिठाई का चढ़ावा चढ़ा कर उनकी पूजा आराधना भजन के साथ की जाती है।

महामारी के वक्त निकाला जाने वाला ‘खप्पर जुलूस’ को भी ओ’ मैली कौतुहल के साथ देखता है। जब भी किसी महामारी का प्रकोप होता है तो ओझा या जादू टोना करने वाला मिटटी के खप्पर में धूपबत्ती जलाकर सड़क पर निकल जाता है। उसके पीछे पीछे लोग जुलूस की शक्ल में निकलते हैं। ओझा कलकत्ता (कोलकाता) जाने की दिशा में आगे बढ़ता है। लोग ‘काली माई की जय’ का कान फोड़ू नारा लगाते चलते हैं। अगले मोहल्ले या गांव के मुहाने पर उस खप्पर को छोड़ दिया जाता है। वहां के निवासी उसे आगे बढ़ाते जाते हैं।

शीतला माई का मंदिर गुलजारबाग स्टेशन के नजदीक अगमकुआं में है और एक दूसरा मंदिर बिहारशरीफ के निकट के मघरा गांव में है।

साभार: प्रभात खबर

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