+91 943 029 3163 info@biharkhojkhabar.com
BREAKING NEWS

मैं दाना मांझी बोल रहा हूँ…

dana-manjhiहाँ, मैं ही हूं दाना मांझी। क्या आप मुझे जानते हैं ? क्या देश का सर्व समाज मुझे जानता है? क्या आप सबों को पता है कि मैं कहाँ रहता हूँ, क्या करता हूं ? मैं जल, जंगल, जमीन पर कहाँ रहता हूं ?

क्या आप जानते हैं कि मेरी आजीविका कैसे चलती है? क्या आपको पता है, मेरे आवासन के बारे में ? खैर, नहीं पता है तो थोड़ा आईये मेरे बारे में कुछ मोटी-मोटी जानकारी से आप अवगत हो जायें।

याद रखें, मैं कोई अकेला दाना मांझी नहीं हूँ बल्कि इस देश में मेरे तरह के असंख्य दाना मांझी हैं। हाल में दशरथ मांझी से दाना मांझी तक के कई किस्से सामने आये हैं। हमारे संघर्ष और अस्तित्व की एक पीड़ा दायक गाथा की कहानियां आपलोगों ने पढ़ी है।

क्या कुछ पढ़ा है मेरे बारे में आप सबों ने ? सरकारी आंकड़ों में बात करें तो देश की आबादी का लगभग 8-9 प्रतिशत आबादी हमारी है। असंख्य दाना मांझी इस देश में काश्मीर से कन्याकुमारी और काठियावाढ से कामरूप तक की विशाल भारतीय भू-भाग की परिधि में वास करते हैं।

इतिहास के कालक्रम में कभी किसी ने मुझे असुर कहा, किसी ने असभ्य, किसी ने शुद्र, किसी ने हम लोगों को वेदवाणी सुन लेने पर कानों में शीशा डाल देने की बात की। न जाने कितनी गालियां और उपमाओं से हम दाना मांझियों को संबोधित किया गया।

इन सामाजिक उपहासों, वेदनाओं और तिरस्कार के बावजूद भी दाना मांझी एवं दशरथ मांझी और उसकी संतानें इस देश के इतिहास एवं सामाजिक ताना-बाना के एक अहम चित्रकार हैं। दाना मांझी केवल एक नाम नहीं है जो काश्मीर से कन्याकुमारी या काठियावाढ से कामरूप जैसे विशाल भारतीय भू-भाग में बसता है। बल्कि सच तो यह है कि दाना मांझी और उसकी संताने एवं उसकी कतारें एक जीवन पद्धति का नाम है, एक जन संस्कृति का नाम है, एक संघर्ष का नाम है, एक विद्रोह का नाम है, एक अस्मिता का नाम है, एक पहचान का नाम है, और भारत के एक प्रमाणिक इतिहास का नाम है।

इस संस्कृति, विद्रोह, अस्मिता, जीवन पद्धति, इतिहास के अनेकों जीवन्त हस्ताक्षर हैं जिनकी एक लम्बी सूची बनायी जा सकती है जिन्होंने अपने संघर्षों और विद्रोहों और नवाचार के जरिये दाना मांझी और उसके संतानों को न केेवल जीवित रखा है बल्कि मानव मुक्ति के इतिहास का शानदार अध्याय भी लिखा।

बिरसा मुण्डा, तिलका मांझी, झानो-फूलो, बिइसोई कोण्ड (उड़ीसा), तम्मनडोरा (मलकान गिरी उड़ीसा), लक्ष्मण नायक (कोरापूट्ट, उड़ीसा), अलूरी सीतारम्मा राजु (आंध्र प्रदेश), विरपनडिया कट्टालूम्न्न (तमिलनाडु), हऔसा (मणीपुर-1917-1919, कुकी बिद्रोह), हल्बा विद्रोह (बस्तर छतीसगढ़-1774-79), काली विद्रोह (महाराष्ट्र-1784-1785), नागा विद्रोह (उत्तर पूर्व भारत -1879) जैसे हमारे नायकों, उनके विद्रोह, उनके संघर्ष की गाथा को आप कुछ जानते हैं? उनके बारे में आपने पढ़ा है? इन जन इतिहासों-संस्कृतियों के बारे में आपकों कोई जानकारी है?

मैं यानि दाना मांझी 70 वर्षीय भारतीय युवा लोकतंत्र का एक विरोधाभाषी चरित्र भी हूँ। 70 वर्षों से इस भारतीय लोकतंत्र में न जाने हम दाना मांझी के विकास, पुर्नवास, शिक्षा, स्वास्थ्य स्वरोजगार के लिये कितनी योजनायें बनीं मगर इन सभी विकासात्मक योजनाओं का फलाफल तो यही है कि दाना मांझी और उसकी संताने अपने जल, जंगल, जमीन से विस्थापित होते रहें। इनकी जमीनें कौड़ियों की भाव में काॅरपोरेट घराने को दिये जाते रहे।

इन जमीनों पर बड़े-बड़े औद्योगिक अधिसंरचना तो जरूर खड़ा किये गये मगर ये और बात है कि इन औद्योगिक संरचनाओं में दाना मांझी और उसकी संतानों को कोई सम्मान जनक और स्थायी रोजगार नहीं मिला। आज 70 वर्षों के लोकतंत्र के बावजूद दाना मांझी के समुदाय को विस्थापन की पीड़ा का दंश झेलने के अलावे उसके पास कोई विकल्प नहीं है।

दाना मांझी के जंगलों को काटकर बड़े-बड़े इन्डस्ट्रीयल काॅरिडोर, 6 लेन, 8 लेन सरपट दौड़ते राष्ट्रीय मार्ग तो बन गये या बनाये जा रहे हैं मगर जंगलों के कटने से जो पर्यावरण एवं जलवायु संकट तथा रोजी-रोटी का संकट आया। इसका दंश तो दाना मांझी को ही झेलना पड़ रहा है?

दाना मांझी और उसके समुदाय के स्वामित के जंगल जमीन और जल का सद्पुयोग करते हुये स्मार्ट सिटी तो बनाये जा रहे हैं और इन स्मार्ट सिटियों को प्रचुर मात्रा में दाना मांझी की जमीनों के अंदर उपलब्ध पानी का इन स्मार्ट सिटी के अंदर धड़ल्ले से उपयोग हो रहा है या होगा किन्तु दाना मांझी और उनके लोगों को पीने का साफ पानी मय्यसर नहीं? वाह रे लोकतंत्र? वाह रे कल्याणकारी राज्य? वाह रे समावेशी विकास? वाह रे जल-जंगल नीति?

तो आइये, इसी क्रम में आधुनिक भारतीय लोकतंत्र में बसने वाले, असंख्य दाना मांझियों में से एक दाना मांझी की एक सच्ची और कड़वी कहानी सुनाता हूँ। यह पिछले दिनों उड़ीसा के कालाहांडी की घटना है जो एक दो दिनों तक देश के खबरिया चैनलों एवं सोशल मीडिया पर एक ज्वलंत विमर्श का विषय बना। 70 वर्षीय भारतीय युवा लोक तंत्र के इस विरोधाभाषी चरित्र पर कुछ कथित समाचार पत्रों ने भी दो-चार काॅलम की खबरें देकर अपने पत्रकारिता धर्म का भी निर्वहन किया।

शायद ये खबरिया चैनल और अखबार वाले इससे ज्यादा कुछ कर भी नहीं सकते थे क्योंकि इस खबर की निरंतरता बनाये रखने पर न ही बाजार बनता नही इनका टी0आर0पी0 बढ़ता और न ही इनके संपादक एवं स्वामी इनसे (अखबारों के मालिक) खुश होते।

घटना उड़ीसा के कालाहांडी की है। उड़ीसा का कालाहांडी संभवतः तीन दशक पहले देश और दुनिया में अखबारों की सुर्खियां बनीं थी। जब पेट की भूख मिटाने के लिये आदिवासी परिवारों ने (दाना मांझी के वंशज ) अपने बच्चों को बेचना शुरू किया था।

पिछले दिनों इसी कालाहांडी के दाना मांझी को इस 70 वर्षीय लोकतंत्र ने मजबूर कर दिया कि वह अपनी 42 वर्षीय पत्नी अमंग देई की लाश को गठरी बनाकर कालाहांडी जिला अस्पताल से 60 किलोमीटर दूर अपने गांव अपने कंधे पर लादकर ले जाए।

दाना मांझी के इस मैराथन दौड़ को कुछ क्षण के लिये खबरिया चैनलों, सोशल मिडिया और पत्रकारिता धर्म के दिग्गजों ने थोड़े देर के लिये टेलीकास्ट कर और एक-दो संपादकीय लिखकर अपने पत्रकारिता धर्म की औपचारिकता का निवर्हन मात्र कर डाला।

कल की खबर है कि घटना के करीब 15-16 दिनों के बाद स्वप्न द्रष्टा, कथित राष्ट्रवादी, 21वीं सदी के भारत के शिल्पकार, डिजिटल इण्डिया, मेक इन इण्डिया, स्टार्टअप इण्डिया, स्वच्छ भारत, सबका साथ-सबका विकास के प्रणेता, जुम्लाबाज सूत्राधार माननीय प्रधानमंत्री के पी0एम0ओ0 ने दाना मांझी की घटना पर उड़ीसा राज्य सरकार से एक विस्तृत रिपोर्ट मांगी है।

हम आप भी अब कुछ दिन इंतजार करें 70 साल का युवा लोकतंत्र एवं तथाकथित कल्याणकारी राज्य शायद दाना मांझी को कुछ राहत देने वाला है? मैं (दाना मांझी) जानना चाहता हूँ कि भारत का संविधान, भारत का लोक कल्याणकारी राज्य मूल्क के हर शहरी को ‘‘दो जून की रोटी और इज्जत की जिन्दगी की गारंटी’’ देने की बात करता है। दाना मांझी को कौन सी इज्जत की जिन्दगी मिली?

दाना मांझी को क्यों नहीं दो जून की रोटी की गारंटी मिली? दाना मांझी की पत्नी अमंगदेई यकिनन रोटी और दवाई की अभाव में हीं टी0बी0 की बिमारी से कालाहांडी के जिला अस्पताल में मौत के आगोश में चली गयी। दाना मांझी के पास इज्जत के साथ अपनी पत्नी का दाह-संस्कार करने का भी सामथ्र्य नहीं था।

शायद यही कारण था कि दाना मांझी ने अपने कंधों पर पत्नी की लाश लेकर जिला अस्पताल से दूर 60 किलोमीटर दूर अपने गांव को चल पड़ा? क्या दाना मांझी अपने कंधों पर अपनी पत्नी का लाश ढ़ो रहा था या भारत के 70 वर्षीय असफल लोकतंत्र की असफलता की लाष ढ़ो रहा था? दाना मांझी को कौन बताएगा कि उसे अपनी पत्नी की लाष ढोना उसकी नियति थी या यह भारतीय लोकतंत्र की नियति थी ?

आज हमें अपने इस 70 वर्षीय लोकतंत्र (जो पिछले 15 अगस्त, 2016 को हमने मनाया) एवं भारत में आर्थिक उदारीकरण के इस 25वें साल के इस पावन वर्ष के मौके पर यह कौन बतायेगा कि (दाना मांझी को) संविधान का वादा ‘‘हर आँख से आँसू पोछनें के करार का क्या हुआ’’? क्या देश का बढ़ता जी0डी0पी0, शेयर बाजार की नयी छलांगें, स्मृद्धि और विकास का चकाचौंध सरपट दौड़ता अश्वमेघ, स्मार्ट सिटी, डिजिटल इण्डिया, स्टार्ट-अप इण्डिया के बीच सिसकता मैं (दाना मांझी) आखिर कब तक जीता रहूँगा, मरता रहूँगा, पिसता रहूँगा ?

क्या हमारे बच्चे, युवा-युवती, किसान, मजदूर इसी तरह जिंदा लाश बनकर लोकतंत्र की बह रही ब्यार में मरते रहेंगे? हमारे जल, जंगल, जमीन इसी तरह काॅरपोरेट घरानों, स्मार्ट सिटियों के लिये बिना हमारी सहमति लिये धन्ना सेठों और स्मार्ट सिटी में रहने वाले सम्म्रांतो को दिये जाते रहेंगें?

दुनियां के काॅरपोरेट घरानों के विष्व व्यापी सूची में भारतीय काॅरपोरेट घरानों का स्थान आठवें पायदान पर तो पहुँचता है मगर मानव विकास सूचकांक के विश्वव्यापी रैकिंग में भारत 130 स्थान पर है? यानी हम दाना मांझी कहां हैं? हम दाना मांझियों को इसका जवाब कब और कौन देगा?

ओड़ीसा के कालाहांडी का दाना मांझी अपनी पत्नी की लाश को कंधे पर लादे हुए साथ में उसकी रोती-बिलखती 12 साल के अबोध बेटी को लाश के अंतिम संस्कार के लिये किस व्यक्ति, किस प्रशासन, किस व्यवस्था ने अस्पताल से एम्बुलेंस देने से इनकार किया? दाना मांझी आखिर क्यों मजबूर हो गया, अपनी पत्नी की लाश चादर में लपेट कर अस्पताल से 60 कि0मी0 दूर अपने घर ले जाने को? आधी रात को गहरी नींद की आगोश में सोया अस्पताल प्रशासन और जिला पशासन की नींद क्यों नहीं टूटी और जब टूटी तब तक दाना मांझी अपनी पत्नी की लाश अपने कंधों पे लादे अस्पताल से 10-15 कि0मी0 दूर जा चुका था।

क्या दाना मांझी अपने कंधो पर सिर्फ अपनी दिवंगत पत्नी ‘‘अमंगदेई’’ की ही लाश ढ़ो रहा था या दाना मांझी हमारे शासन, तंत्र की संवेदनहीनता की लाश ढ़ो रहा था ? क्या इस 10-15 कि0मी0 की दूरी के बीच इस मंजर को देखने वाला स्थानीय समाज, सैंकड़ों-हजारों आंखें क्यों संवेदहीन बनी रहीं? अगर हम इस कड़वी सच्चाई (संवेदनहीनता) को मानें तो हम सर्व सभ्य समाज को कम से कम इतना तो कबूल करना ही चाहिए कि ‘‘आज भारत में दाना मांझी महज एक प्राणी ही संवेदनहीनता का षिकार नहीं है बल्कि सामाजिक संवेदनहीनता के कारण दाना मांझी जैसे व्यक्तियों की संख्या का भारत में हर रोज इजाफा हो रहा है।

वास्तव में यह संवेदनहीनता पूंजीगति की के साथ ही समझा जा सकता है? यह महज एक एक घटना नहीं है जो देश में घटित हो रहा है। मानवीय मूल्यों की अब यहाँ कोई जगह नहीं, कोई रसाई नहीं होती है। खरीदार और बेचने वाले की आर्थिक सामाजिकता में दाना मांझी का भला क्या करना।’’

जिन्दगी और मौत के बीच का यह सफर, इस अपमान (दौड़) और इस मानवीय पीड़ा की गंगोत्री कहाँ है? वर्तमान के ढाई साल का सबका साथ-सबका विकास, साठ साल का गरीबी हटाओ का क्या हुआ? क्यों साल दर साल दाना मांझी, उसकी पत्नी और उनके बच्चों की थालियों से दाल-रोटी की मात्रा घटती जा रही है?

क्या इन पीड़ाओं, इन अपमानों का कोई हल हमारे 70 वर्षीय भारतीय लोकतंत्र के पास नहीं है? क्या कोई राष्ट्र द्रष्टा आगामी 15 अगस्त को इस संबंध में कोई कार्य योजना घोषित करेगा कि हम डिजिटल इण्डिया भी बनायेंगे, साथ ही दाना मांझियों की संतानों को दो जून की रोटी और इज्जत की जिन्दगी भी देंगे यानी सबको आंटा और सबको डाटा (डिजिटल सुविधा) भी देंगे?

हे माननीयों ! आपके कशमीर से कन्याकुमारी और कामरूप से कठियावाड़ के परिधि में बसे दाना मांझियों को आटा दीजिये आटा। डाटा से जिन्दा रहने के लिए 2400 कैलोरी शरीर में नहीं बनेगा वरन् संवेदनशीलता की कवयित्री और पूर्व सांसद सरला माहेश्वरी को लिखना ही पड़ेगा:-

यहां मुर्दों के राज में जिंदगी को क्या,
मौत को भी मिलती नहीं
चार कंधो का साथ।
चार पहियों का साथ।
एक कंधे पर उठाकर
ले जाओ अपनी लाश।
सरकारी अस्पताल में टी0बी0 से मरी
अपनी पत्नी की लाश।
वे देखेंगे तुम्हारी मैराथन दौड़।
कैमरों से देखेंगे,
दस किलोमीटर की ये रोमांचक,
कभी न देखी-सूनी गयी दौड़।
लाश के साथ दौड़
एक खबर की तरह दौड़ेगे तुम।
जाओं दाना मांझी
कर दो अंतिम संस्कार।
राम नाम सत है।
रोटी नाम सत है।
दाना मांझी सत है।

md galib

ग़ालिब जनसरोकार से जुड़े सुप्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता है।

Bihar Khoj Khabar About Bihar Khoj Khabar
Bihar Khoj Khabar is a premier News Portal Website. It contains news of National, International, State Label and lots More..

Bihar Khoj Khabar
About the Author
Bihar Khoj Khabar is a premier News Portal Website. It contains news of National, International, State Label and lots More..

Leave a Reply

*