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मोरों का एक अनोखा गांव

pranayपटना में अभी तक मोर नहीं दिखा सकी सरकार. राजधानी वाटिका को जिस दिन शुरू किया जा रहा था उसी दिन सीएम नीतीश कुमार ने इसकी चर्चा की थी कि पटना में मोर छोड़े जाएंगे.

उसके लिए वाटिका के आसपास के इलाके में बिजली तारों को अंडर ग्राउंड भी किया गया. लेकिन मोर अब तक नहीं दिखे. पटना में आपको मोर देखना हो तो संजय गांधी चिडिय़ाघर ही जाना पड़ेगा. लेकिन बिहार में ऐसे भी गांव हैं जहां आप खूब सारे मोर देख सकते हैं.

माधोपुर गोविंद के बाद आरण गांव की खोज

पंश्चिम चंपारण के मोरगांव माधोपुर गोविंद के बारे में आई नेक्स्ट ने अपने पाठकों को बताया था कि आप मोर देखने के इच्छुक हैं तो इस गांव में छत की मुंडेर से लेकर खेतों-खलिहानों तक में मोर देख सकते हैं. ऐसे ही एक दूसरे मोर गांव की कहानी पाठकों के सामने है. यह मोर गांव है बिहार के सहरसा में. गांव है आरण .

माधोपुर गोविंद गांव पर तो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 2012 में मंदार नेचर क्लब के पक्षी पे्रमी अरविंद मिश्रा से शोध कराया था पर सहरसा का आरण गांव अभी भी शोध से दूर है. इस गांव में आप मोर को बिंदास अंदाज में देख सकते हैं. गांव के लोगों से बिल्कुल हिले-मिले. आप-हम सामने आएं तो ये फुर्र हो जाएंगे, लेकिन गांव वालों से इन मोरों की ऐसी दोस्ती है मोर उनको देखकर नहीं भागते. उनके संग जीते हैं.

मोर खूब रिझाते हैं यहां

मोरों के संरक्षण को लेकर सरकार चिंतित हैं. लेकिन आरण गांव में गांव के ही लोगों ने इन्हें संरक्षण दे रखा है. कुछ दिनों पहले पक्षी प्रेमी अरविंद मिश्रा इस गांव में गए थे. समस्तीपुर के डीएफओ सुनील कुमार सिन्हा के आग्रह पर वे गांव आए थे.

आरण गांव सहरसा से चार किलोमीटर दूर है. गांव की खूबसूरती का अंदाजा लगाएं कि इस अगस्त के मौसम में जब मोर अपने पंख गिराने लगते हैं और प्रजनन में लग जाते हैं तब गांव की सड़कों पर, छतों पर ,यहां-वहां, जहां-तहां मोरों के पंख पड़े दिखने लगे हैं. सोचिए कैसे अद्भुत नजारा होगा गांव का.

डीएफओ सुनील सिन्हा बताते हैं कि मोरों की संख्या यहां कितनी है इसकी काउंटिंग नहीं हुई है. लेकिन यह संख्या बड़ी है. दिन में ढ़ाई-तीन बजे मोर झुंडों में भी दिखते हैं.

गांव की यह है बड़ी खासियत

इन मोरों की खासियत यह है कि ये आरण गांव को छोड़ कर कहीं आस पास के गांव में नहीं जाते. चले भी गए तो शाम होते-होते आरण जरूर लौट आते हैं. रेंज ऑफिसर विद्यापति सिन्हा ने आई नेक्स्ट को बताया कि इन मोरों को कोई गांव में बांध कर या पिंजड़े में बांध कर नहीं रखता. मोर यहां स्वच्छंद विचरण करते हैं.

गांव का कोई भी व्यक्ति मोरों को परेशान नहीं करता. मोर लोगों के अनाज आदि खा जाते हैं. जानवरों का चारा खा जाते हैं फिर भी लोग मोरों को मारते नहीं, प्यार करते हैं.

मोर रिझाने लगे हैं अपनी मोरनियों को

peacockस्थानीय निवासी रविकांत बताते हैं कि इस गांव में पेड़-पौधे ज्यादा हैं. मोर लोगों के सूख रहे अनाज आदि खाकर नुकसान पहुंचाते हैं लेकिन स्थानीय लोग इन्हें छेड़ते नहीं हैं. 84-85 में एक व्यक्ति मोरों का जोड़ा लाया और इसके बाद मोरों की संख्या लगातार बढ़ती गई.

अभी स्थिति यह है कि मोर हर जगह दिख जाते हैं. हाल में एक मोर तिलावै नदी के पार चला गया लेकिन वहां बच्चे देकर वह बच्चों के साथ वह वापस अरण्य गांव आ गया. वे बताते हैं कि 20-22 दिनों में मोर के अंडे से बच्चे निकल आते हैं. अभी अगस्त के महीने में ही मोर अंडे देते हैं. मोर के पंख अब गांव में जहां-तहां गिरे दिख रहे हैं. बच्चे इन्हें उठा रहे हैं. शायद ही किसी घर में मोर पंख नहीं होगा यहां.

मोरनियों को पंख नहीं होते. मोर को ही पंख होते हैं. बसंत पंचमी से ही यहां मोरों में नए पंख आने लगे थे. इसके बाद मोरों के नृत्य बादलों के साथ होने लगे मोरनियों को रिझाने के लिए. अगस्त के बाद सितंबर-अक्टूबर तक एक बार फिर मोरों की संख्या बढ़ेगी. वे कहते हैं कि गांव में मोरों की संख्या 400-500 से कम नहीं होगी.

सुनील कुमार सिन्हा, डीएफओ, सहरसा
हम चाहते हैं कि आरण गांव पर रिसर्च हो. अरविंद मिश्रा से आग्रह किया गया है कि इस पर काम करें ताकि उस रिपोर्ट को आगे सरकार को भेजा जा सके. यह जानना बेहद जरूरी है कि मोर इसी गांव में क्यों रहते हैं. हरियाली तो यहां जरूरी ज्यादा है लेकिन बाकी परिस्थितियों के बारे में भी जानना जरूरी है.

अरविंद मिश्रा, स्टेट कॉर्डिनेटर, इंडियन बर्ड कंजरवेशन नेटवर्क
मोर गांव माधोपुर गोविंद पर तो मैंने अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी. लेकिन यह मुझे भी नहीं पता था कि बिहार में मोरों का और भी कोई गांव है. समस्तीपुर के अरण्य में मोरों को स्वच्छंद विचरण करते हुए देख मैं आश्चर्यचकित रह गया. पश्चिम चंपारण का माधोपर गोविंद गांव हो या सहरसा का अरण्य गांव यह बड़ा पयर्टन स्थल हो सकता है. इको टूरिज्म से जोड़कर इसका और विकास होना चाहिए.

प्रणय प्रियंवद की रिपोर्ट

प्रणय प्रियंवद I Next पटना के ब्यूरो हेड हैं. 

साभार: I Next पटना 

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