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रामकुमार: अमूर्तन से अनंत में विलीन

भारतीय आधुनिक कला के आधार स्तंभ और अमूर्त कला के वरिष्ठम कलाकारों में शुमार राम कुमार  का निधन संपूर्ण भारतीय कला जगत के लिए दुखद खबर है। हालांकि कुछ दिनों से वे अस्वस्थ थे। उनका अस्पताल में इलाज चल रहा था। राम कुमार कला एवं साहित्य, दोनों विधाओं में समान दखल रखने वाले विलक्षण प्रतिभा थे। अपने छोटे भाई चर्चित हिन्दी साहित्यकार निर्मल वर्मा की तरह इनकी भी कई रचनाएं छपी हैं, जिनमें दो उपन्यास और कहानियां भी शामिल हैं। लेकिन शुरूआती दौर में साहित्य लेखन के बाद सात दशकों से वे लगातार कला सृजन को अपना जीवन समर्पित कर चुके थे।

उनका जन्म 1924 में शिमला के एक बड़े परिवार में हुआ था। पिता ब्रिटिश सरकार के कर्मचारी थे। अपने कला प्रेम के कारण इन्होंने सेंट स्टीफेंस कॉलेज से अर्थशास्त्र की पढाई के बाद भी 1945 में कला गुरू शैलोज मुखर्जी के संरक्षण में शारदा उकील स्कूल ऑफ आर्ट, दिल्ली में सायंकालीन कक्षा में नामांकन करवाया। कला के प्रति उनकी दीवानगी बढ़ती गई और 1948 में उन्होंने बैंक की नौकरी भी छोड़ दी और कला की पढ़ाई के लिए पेरिस चले गए जहां उनकी मुलाकात रजा से हुई।

शुरु आत में कुछ आकृतिमूलक कलाकृतियां बनाई। मगर अपने अमूर्त दृश्य चितण्रके लिए ही दुनिया भर में चर्चित हुए। 1960 में बनारस प्रवास के बाद उन्होंने फिर कभी आकृतिमूलक चित्र नहीं बनाए। मगर अपने दृश्य चितण्रमें मूर्त से अमूर्त और फिर अमूर्त से मूर्त की ओर इनकी कलाकृतियां कई बार वापस लौटीं। राम कुमार के अमूर्त चित्रों को देखे गए दृश्यों में नवीनता लाने का एक प्रयास कहा जा सकता है । इसीलिए बिना किसी स्पष्ट आकृति के भी उन्हें पहचाना जा सकता था। उनके चित्रों में आकृतियां जरूर विलीन हो गई थीं। मगर रंग वास्तविक दृश्यों सरीखे ही हुआ करते थे। सफेद और ग्रे रंगों की प्रमुखता की वजह से चटकीले रंगों की हलकी-सी आभा उनके चित्रों में दिखती है। नाइफ से चित्र बनाते थे पर उनकी कलाकृतियों में आकृतियों के अमूर्तन के वावजूद रंगों में प्राकृतिक रु झान हर कलाप्रेमी को अपनी ओर आकर्षित करता है। उनके अमूर्त दृश्य चित्रों में भी बनारस और पहाड़ के दृश्य स्पष्ट दृष्टिगोचर होते थे। अन्य कलाकारों की अपेक्षा उन्होंने बनारस को अलग ढंग से चित्रित किया।

उनका बनारस धर्मभीरु नहीं है, और न ही परंपराओं को दर्शाता है। अधिकतर तैल माध्यम में काम करने वाले राम कुमार ने हर कलाकृति को मास्टर पीस मानकर पूरी तन्मयता से काम किया। उन्होंने कभी भी छोटा-सा भी कमजोर काम नहीं किया। यही वजह है की उनकी कलाकृतियां करोड़ों में बिकीं। कला बाजार के लिए वह बड़ा नाम हैं, क्योंकि उनकी एक कलाकृति वेगा बॉन्ड क्रिस्टी की नीलामी में सात करोड़ में बिकी थी। देश के चर्चित कलाकारों में मकबूल फिदा हुसैन, सैयद हैदर रजा, फ्रांसिस न्यूटन सूजा, गायतोंडे और तैयब मेहता सभी इनके अंतरंग मित्रों में शामिल थे।

कई चर्चित पुरस्कार और सम्मानों से उन्हें नवाजा जा चुका था, जिनमें 1970 में न्यूयार्क की जॉन डी रॉकफेलर फेलोशिप, 1986 में मध्य प्रदेश सरकार द्वारा दिया गया कालिदास सम्मान, 1972 में भारत सरकार द्वारा पद्मश्री, 2010 में पद्मभूषण और 2011 में ललित कला अकादमी द्वारा फेलोशिप प्रमुख हैं। वह दिल्ली शिल्पी चक्र और प्रोग्रेसिव आर्ट ग्रुप के प्रमुख सदस्य थे। उनकी अधिकतर कलाकृतियों में उनके प्रिय शहर बनारस और शिमला की झलक मिलती है। बहुत कम बोलने वाले और शांत स्वभाव के राम कुमार का व्यक्तित्व और जीवन सरल था, जबकि उनके मित्र फैशनेबल और शोमैन के रूप में चर्चित थे।

पेरिस और इंग्लैंड प्रवास के बाद वह दिल्ली स्थित अपने घर के बेसमेंट में बने स्टूडियो में ही अपने अंतिम समय तक लगातार सक्रिय रहे। उनके एक बेटे हैं, उत्पल वर्मा जो ऑस्ट्रेलिया में रहते हैं। दिल्ली की भारती आर्टिस्ट कालोनी स्थित निवास में मुझे भी उनसे मिलने का सौभाग्य मिला था। अपनी बातचीत में एक महत्वपूर्ण बात उन्होंन कही कि भारत में अब कला बाजार का विकेंद्रीकरण होना चाहिए। महानगरों में स्थित आर्ट गैलरी को छोटे शहरों में भी कला प्रदशर्नी आयोजित करनी चाहिए और काम खरीदना चाहिए। शांत स्वभाव और अंतर्मुखी व्यक्तित्व का प्रभाव उनकी कलाकृतियों में भी दिखता था। ऐसे मूर्धन्य कलाकार के निधन पर हम अपनी भावपूर्ण श्रद्धांजलि अपिर्त करते हैं।

वरिष्ठ कलाकार रवींद्र कुमार दास दिल्ली में रहते हैं।

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