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रूक़ैया सेख़ावत हुसैन-बिहार की सावित्री बाई

जब औरतें पढ़ती हैं, सोचती हैं, लिखती हैं और बोलती हैं तो वे उन बातों पर भी सवाल उठाने से परहेज नहीं करतीं, जिन बातों की बुनियाद पर सदियों से गैर बराबरी की जमीन पर खड़ा यह समाज अपने होने का दंभ भरता है।

एक ऐसे ही पढ़ने, सोचने, लिखने और सवाल उठाने वाली हस्ताक्षर का नाम है रूक़ैया। इस रूक़ैया ने आज नहीं बल्कि आज से लगभग 115 साल पहले कुछ ऐसे सवाल समाज से पूछे जिसका जबाव शायद आज तक रूक़ैया की आत्मा को नहीं ही मिला होगा। शायद आज के सभ्य समाज के अनेकों सिद्धांतकारों, व्यख्याताओं और साथ ही धर्म के ठेकेदारों को भी पता नहीं होगा कि 115 साल पहले रूक़ैया नाम की जिस औरत ने अपने पढ़ने, सोचने, लिखने और सवाल करने का अहसास उस समय के समाज के सामने रखा वह सवाल क्या थे?

क्या हम आप आज के दौर में रूक़ैया के उन सवालों से रूबरू होना चाहेंगे? तो आईये थोड़ा आप भी उस रूक़ैया जो केवल एक औरत नहीं थी बल्कि उसके दिल में समाज की एक कल्पना थी, अपने स्त्री समाज का एक सपना था, एक दर्द था, एक आक्रोश था, तभी तो रूक़ैया ने पूछा।‘‘हम सुनते हैं कि धरती से ग़ुलामी का निज़ाम ख़त्म हो गया है, लेकिन क्या हमारी ग़ुलामी ख़त्म हो गई हैं? नहीं न, तो हम दासी क्यों हैं? हम समाज का आधा हिस्सा हैं, हमारे गिरे-पड़े रहने से समाज तरक़्क़ी कैसे करेगा? हमारी अवनति के लिए कौन दोषी है?’’

तकरीबन 115 साल पहले रूकै़या द्वारा पूछे गये सवाल आज 21वीं सदी में भी प्रासंगिक है। मतलब बहुत साफ है कि 20 वीं सदी के मुकाबले 21वीं सदी में भी औरतों की हालत में बहुत बड़ा बुनियादी बदलाव नहीं ही आया है।

रूकै़या समाज के ताने-बाने से नाखुश एक ऐसी रूह का नाम है जिसका जन्म 1880 में उत्तरी बंगाल में रंगपुर जिला के (अब बंगलादेश) के पैराबंद इलाके में एक जमींदार परिवार जहुरूद्दीन मो0 अबु अली के घर में हुआ था। भले ही आज यह इलाका भगौलिक दृष्टि से बंगलादेश में है लेकिन सच तो यह है कि रूक़ैया हम सबों की ‘‘पुरखिन’’ है- इससे तो इन्कार नहीं किया जा सकता।

रूकैया ने अपने समय और काल में न सिर्फ लड़कियों एवं औरतों की प्रेरणा स्रोत बनी बल्कि साहित्य की दुनिया में भी अपनी एक पहचान बनायी, औरतों के हक में आवाजें उठायीं और साथ-साथ गरीब-व-नादार मुस्लिम बच्चियों की तालीम के लिये अपना-तन-मन धन न्योछावर कर दिया। रूकै़या ने अपने इस सपने को हासिल करने के लिये औरतों को एक जुट किया और उनकी एक तन्जीम (संगठन) भी बनायी। गोया कि- रूकै़या एक बहु आयामी प्रतिभा की हस्ताक्षर थी जिनके सोचने एवं सामाजिक हस्तक्षेप का कन्वास बड़ा ही व्यापक था।रूकैया ने अपने समय और काल में न सिर्फ लड़कियों एवं औरतों की प्रेरणा स्रोत बनी बल्कि साहित्य की दुनिया में भी अपनी एक पहचान बनायी, औरतों के हक में आवाजें उठायीं और साथ-साथ गरीब-व-नादार मुस्लिम बच्चियों की तालीम के लिये अपना-तन-मन धन न्योछावर कर दिया। रूकै़या ने अपने इस सपने को हासिल करने के लिये औरतों को एक जुट किया और उनकी एक तन्जीम (संगठन) भी बनायी। गोया कि- रूकै़या एक बहु आयामी प्रतिभा की हस्ताक्षर थी जिनके सोचने एवं सामाजिक हस्तक्षेप का कन्वास बड़ा ही व्यापक था।

रूकै़या ने जब इस खुबसूरत सरजमीं पर आखें खोली और जिन्दगी की 8-10 बसंतों को पार की तो उस वक्त तक बंगाल के मुस्लमान मर्दों के बीच स्कूल की पढ़ाई का तो चलन शुरू हो गया था मगर मुस्लिम समाज की औरतें और बच्चियों को तालीम की  खुषबु से दूर ही रखा जाता था। बहुत हुआ तो घरों के अंदर इन औरतों को केवल मजहबी तालीम देने का इन्तज़ाम कर दिया जाता था, यानी थोड़ा अरबी और थोड़ा उर्दू पढ़ना-लिखना सीखा दिया जाता था, और उसे ही इन औरतों का तालिम-ओ-तरबीयत मान लिया जाता था। रूक़ैया इस मामले में थोड़ी क़िस्मत वाली थी क्योंकि इनके दो बड़े भाई कोलकाता में पढ़ा करते थे। रूकै़या को इन्हीं भाईयों ने घर के बड़े-बुजुर्गों से छुप-छुपाकर अंगे्रजी, बांगला और उर्दू सीखा दिया।

रूकै़या लिखती हैं ‘‘बालिका विद्यालय या स्कूल-काॅलेज के अंदर मैंने कभी दाख़िला नहीं किया, केवल बड़े भाईजान के सफक़त और मेहरबानी की वजह से मैं लिखना-पढ़ना सीख गई’’। रूक़ैया के इस पढ़ने-लिखने के शौक़ पर उस समय के समाज ने ताना-कसे, फब्बतीयां दी, मगर रूकै़या का पोख़ता अज़म (इच्छाषक्ति) इन व्यंगों और हास्यों के आड़े नहीं आया।

संभवतः रूकैया के इसी बाग़ी तेवर को भांपकर उनके बड़े भाई ने रूक़ैया के लिये एक ऐसा जीवन साथी की तलाष की जो रूकै़या की सोच के परिन्दे का पर नहीं कतरे, ना ही उसकी सोच पर अवरोध खड़ा करें। इसी समझ के साथ इनके बड़े भाई ने रूक़ैया की शादी अंगे्रजी सरकार में कार्यरत एक अफ़सर सखावत हुसैन से करवाई। जो बिहार के भागलपुर के रहनेवाले थे। इनके बड़े भाई को यक़ीन था कि सख़ावत हुसैन जे़हनी तौर पर तरक़्कीपंसद ज़हन के इंसान थे। इसलिये ये रूकै़या के लिये एक बेहतर जीवन साथी (शौहर) साबित होंगे और हुआ भी यही।
1898 में रूक़ैया और सख़ावत हुसैन की शादी हो गयी। दोनों का यह दाम्पंत जीवन लगभग 14 साल रहा। मगर कुदरत को इन दोनों का एक लम्बा साथ गवारा नहीं था और इसे नियति माना जाए कि 1909 में सख़ावत हुसैन भी इस दुनिया से रूकै़या का साथ छोड़कर रूख़्सत हो जाते हैं। सख़ावत हुसैन की मौत तक रूक़ैया भागलपुर में रहीं। इसी दौर में रूकै़या ने अपने ज़हनी श्वुर (बौद्धिक क्षमता) का इस्तेमाल करती हैं और लेखन कार्य भी करती हैं।

रूकै़या अपने 22-23 साल के लेखन यात्रा में समाज से बड़े ही शालीनता एवं शिद्दत के साथ सवाल-जवाब करने लगती हैं। इनकी लेखनी और सवालों ने लोगों का ध्यान आकृष्ट किया, लोग उन्हें पढ़ने लगे और देखते-देखते रूक़ैया बांगला अदब की दुनिया में एक जाना-माना हस्ताक्षर बन गयीं। अब रूकै़या, रूकै़या सखावत हुसैन या आर0एस0 हुसैन थीं। इनके रचनाकाल के शुरूआत दौर की एक मशहूर रचना ‘‘स्त्रीजातिर अबोनीति’ जो काफी चर्चित हुआ। इस रचना में आर0एस0 हुसैन औरतों से मुखातिब हैं, वे औरतों की खराब और गिरी हुई सामाजिक हालत की वजह तलाशने की कोशिश करती हैं। साथ ही उन्हें यानी आम औरतों को अपनी हालत पर सोचने के लिये उकसाती हैं।

रूकै़या लिखती हैं ‘‘सुविधा-सहूलियत, न मिलने की वजह से, स्त्री जाति दुनिया में सभी तरह के काम से दूर होने लगीं और इन लोगों को इस तरह ऩाक़ाबिल और बेकार देखकर, पुरूष जाति ने धीरे-धीरे इनकी मदद करनी शुरू कर दी’’।

‘जैसे-जैसे मर्दों की तऱफ से, जितनी ज्यादा मदद मिलने लगी वैसे-वैसे स्त्री जाति, ज्यादातर बेकार होने लगी। हमारी ख़ुद्दारी भी ख़त्म हो गई। हमें भी दान ग्रहण करने में किसी तरक की लाज-शर्म का अहसास नहीं होता। इस तरह हम अपने आलसीपन के ग़़ुलाम हो गए। ‘मगर असलियत में हम मर्दो के ग़़ुलाम हो गए और हम ज़माने से मर्दो की ग़ुलामी और फरमाबरदारी करते-करते अब गुलामी के आदी हो चुके हैं. रूकै़या स्त्रियों की गिरी हुई हालत और उनकी ग़ुलाम स्थिति की वजह तलाषती हैं। आज भले ही यह सब हमें नया न लगता हो पर सौ साल पहले ऐसा सोचना वाकई अनूठी चीज़ थी। ध्यान रहे गैरबराबरी बताने के लिए उस वक्त जेण्डर जैसा लफ़्ज या विचार वजूद में नहीं आया था।

रूक़ैया एक आला दर्जा की लेखिका थीं जो चीज़ों को अपने समय से बहुत आगे जाकर देखा करती थीं। इनकी एक मशहूर कहानी है सुल्तानाज़ ड्रीम यानी सुल्ताना का ख्वाब। मूलतः यह कहानी रूकै़या ने अंग्रेजी में लिखी थी। इस कहानी की चर्चा बांगलापट्टी से बाहर काफी हुयी और रूकै़या ने इस कहानी के ज़रिये साहित्य की दुनिया में अपनी एक पहचान बनाई। आगे चलकर रूकै़या ने ख़ुद ही इस कहानी का बांगला भाषा में थोड़े बहुत संशोधन के साथ अनुवाद भी किया।

यह कहानी एक ऐसे लोक की कथा कहती है, जो हमारे जैसा नहीं है। यहां ज़नाना नहीं, बल्कि मर्दाना है। यानी मर्द घर के घेरे में पर्दे के अंदर रहते हैं। इस देष की कमान सूत्री के हाथ में है। यहां लड़कियों की अलग यूनिवर्सिटी हैं। स्त्रियों ने सूरज की ताक़त का इस्तेमाल करना सीख लिया है। वे बादलों से अपने हिसाब से पानी लेती हैं। वे हथियार जमा नहीं करती हैं। पर्यावरण का ख़्याल रखती हैं। आने-जाने के लिए हवाई साधन का इस्तेमाल करती हैं और यहां मौत की सज़ा भी नहीं दी जाती है।

यह कहानी कई चीज़ों का अद्भुत संगम है। यह विज्ञान कथा है, स्त्री विमर्श की दस्तावेज़ है, नारीवादी कल्पनालोक की कथा है, सबसे बढ़कर यह एक अहिंसक, क़ुदरत से जीवंत रिषता बनाकर रखनेवाले समाज का अक्स है।

ध्यान रहे यह कहानी 1905 में मद्रास (चेन्नई) से निकलने वाली इंडियन लेडीज़ मैगज़ीन में छपी थी। हलांकि यह कथा महिलाओं की जिंदगी की जिस ह़कीकत से निकली है वह अब भी बदस्तूर दिखती है।

रूकै़या ने एक उपन्यास भी लिखा था- पद्नराग, इसमें अलग-अलग मज़हब और इलाके की समाज और परिवार से परेशानहाल बेहसहारा महिलाएं, एक साथ, एक नई दुनिया बसाने की कोषिष करती हैं, वे अपने पांव पर खड़ी हैं, ख्याल से भी आज़ाद हैं, एक कल्पनालोक से अपने लोक में ही हक़ीकत में स्त्रियों के नज़रिए से यह एक दुनिया बसाने की कोशिश है।

रूक़ैया की जिन्दगी का एक बड़ा हिस्सा मुस्लिम बच्चियों के वास्ते स्कूल खोलने में गुजरा। सन् 1909 में सख़ावत हुसैन के मौत के बाद उनके ख्वाहिश के मुताबिक रूकै़या ने भागलपुर में लड़कियों के एक स्कूल की बुनियाद डाली। रूकै़या को अपने इस रचनात्मक सपना को परवान चढ़ाने में अनेकों मुश्किलों का सामना करना पड़ा।

संभवतः यह भी एक कारण रहा होगा कि 1910-11 के आस-पास रूकै़या भागलपुर छोड़कर कलकत्ता चली गयीं। यहां इन्होंने 1911 में फिर से एक स्कूल सख़ावत मेमोरियल गर्ल्स स्कूल के नाम से शुरू किया। 100 साल बाद आज भी यह स्कूल कलकत्ता में मुस्लिम बच्चियों के लिये शिक्षा का प्रचार-प्रसार कर रहा है। मगर यह विडम्बना है कि आज की तारीख़ में कलकत्ता में भी रूक़ैया से जुड़ी कोई भी चीज नहीं बची है। हालांकि स्कूल के शताब्दी के बहाने स्थानीय लोगों को रूक़ैया की याद आई और उनपर चर्चा और विमर्श भी हुये।

रूक़ैया अपने संघर्ष और अपने प्रयोग के संस्मरण में लिखती हैं कि ‘‘मैं जब कर्सियांग और मधुपुर घूमने गई तो वहाँ से खूबसूरत पत्थर जमा कर लाई, जब उड़ीसा और मद्रास के सागर तट पर घूमने गई तो अलग-अलग रंग और आकार के शंख-सीप जमा कर ले आई। अब ज़िन्दगी के 25 साल समाजी खि़दमत में लगाते हुए कठमुल्लाओं की गालियाँ और लानत-मलामत इक्टठा (जमा) कर रही हूँ।’’

रूकै़या ने 52 साल की उम्र में 9 दिसम्बर 1932 को अपने तालीमी विरासत को छोड़कर इस दुनिया से रूकसत ले लिया। मरते-मरत दम तक रूकै़या ने अपनी ज़िन्दगी को औरतों के बेहतरी के लिये समर्पित रखा। भारत में ना सही बंगलादेश ने रूक़ैया को काफी सम्मान दिया। 09 दिसम्बर को प्रत्येक वर्ष बंगलादेश में रूक़ैया दिवस मनाया जाता है।

यह विडम्बना ही है कि भारत या कहा जाए तो बिहार में रूकै़या को वो स्थान नहीं प्राप्त हुआ जो उसे मिलना चाहिए था। वैसे विगत कुछ वर्षों से कुछ रंगकर्मियों, पत्रकारों एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं ने रूक़ैया के कर्म और संघर्ष पर आधारित सांस्कृति प्रस्तुतियां एवं विमर्श शुरू किया है। यह भारतीय समाज या यूं कहें कि हिन्दी एवं बांगला भाषी समाज की विडम्बना है कि यह समाज बांगला या उर्दू या किसी दूसरी आंचलिक भारतीय भाषा में लिखनेवाली लेखिकाओं को नहीं जानते या उनकी विद्वता को उस रूप में रेखांकित नहीं करते हैं जैसा किसी अंगे्रजी में लिखनेवाली लेखिकाओं को।

यह कहना अनुचित नहीं होगा कि भाषाविद् एवं साहित्यीक समीक्षक मुस्लमान स्त्री आवाज़ को कम ही पहचान पायें हैं। यह अभिजात वर्ग स्त्री विरासत को बौद्धिक विरासत कम ही मानते हैं लेकिन यह भी सच है कि रूकै़या अपने आप में एक विरासत का नाम है, एक आधी आबादी की आवाज़ का नाम है, एक विद्रोह के स्वर की आवाज़ है, एक वैकल्पिक स्त्री विमर्श की आवाज है।

उल्लेखनीय है कि इस आवाज ने एक ऐसे दौड़ में आकार लिया (1880 -1930 के बीच) जब देश में अंग्रेजों का बोलबाला था यानि जुल्मतों का दौड़। रूकै़या ने ऐसे ही ज़ुल्मतों के दौड़ में आधी आबादी की आवाज का परचम लहराया। सुदूर महाराष्ट्र में भी सावित्री बाई ने इसी आधी आबादी की आवाज की झण्डे को बुलन्द किया था।

ग़ालिब जनसरोकार से जुड़े सुप्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता है।

 

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