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रेत की लहरों पर दास्तानें सुनाकर अभी गुज़रा बंजारा~संदर्भ: जाबिर हुसेन की कविताएँ

संसद में
पाँच साल की सोना ने
सभासदों से कहा —
कहना
अगर कह सको
धरती प्रेम के लिए
बनी है
शांति और मैत्री
न्याय और समता
के लिए बनी है
नफ़रत और प्रतिशोध
के लिए नहीं
दहशत और हिंसा
के लिए तो क़तई नहीं
सभासदो !
अपने राजा से कहना
अगर कह सको
हमें वफ़ादार ही रहने दें
दास नहीं बनाएँ।

– जाबिर हुसेन

रेत का समय से संगत करना आपने नहीं देखा होगा। इसी तरह रेत का आपकी आत्मा के साथ संगत करना भी आपने नहीं देखा होगा। मैं रोज़ देखता हूँ : रेत को जीवन में बदलते हुए। रेत को देह में बदलते हुए। रेत को आदमी की तरह चलते-फिरते हुए। रेत को धुन बजाते हुए। रेत को पानी बनते हुए। रेत को हवा में तैरते हुए। रेत को अपनी मुट्ठी बनते हुए। रेत को मृत्यु में तब्दील हुए भी मैंने देखा है। रेत आपके जीवन का हो ना हो, मेरे जीवन का एक दुष्कर सत्य है। आपकी नज़र में तो रेत कोई हीन चीज़ भर ठहरी।

मैंने रेत को कविता बनते देखा है। कहानी बनते देखा है। किताब बनते देखा है। आंदोलन का हिस्सा बनते देखा है। रेत को दोस्त बनते हुए देखा है। रेत को शब्द बनते हुए देखा है। रेत को ध्वनि बनते हुए देखा है। रेत को जादू बनते हुए देखा है। रेत को रहस्य बनते हुए देखा है। रेत को चाँद बनते देखा है और सूरज भी। रेत को रथ का चक्का बनते हुए देखा है और घोड़े का पाँव भी। रेत को घाव भी बनते हुए देखा है और दवा भी। रेत को चाक बनते हुए देखा है और चाक को रेत बनते हुए।

यह रेत आपसे क्या चाहती है, बस यही ना कि आप अपने जीवन की सच्ची ध्वनि को सुनें। रेत आपकी मनुष्यता की तरह ही तो है, मुलायम एकदम। बस इस रेत के साथ दिक़्क़्त इतनी-सी है कि आप जब कोई झूठ बोलना चाहते हैं तो यह रेत उड़ती हुई किसी सच की तरह आपके मुँह में आ घुसती है। आप ग़लत देखना चाहते हैं तो आपकी आँखों में आ टपकती है। ऐसा करते हुए रेत किसी अदृश्य शक्ति की तरह अदृश्य ज़रूर रहती है।

आपको मेरे कहे पर भरोसा नहीं हो तो आप जाबिर हुसेन की कविताएँ पढ़ते हुए एक गहरी साँस लीजिए और फिर देखिए कि यह रेत आपके मुँह को किच-किच कर देती है कि नहीं। आपके मुँह से लिए गए कई ग़लत फ़ैसले ने कितनों को आत्मा के भीतर तक से रुला रखा है जो :

काफ़ी देर से
पाँच साल का डब्बू
रो रहा था
रोए जा रहा था
किसी के रोके
नहीं रुक रहा था
मना-मना कर, सब
के सब, थक गए
आख़िर में, पिता आए
बच्चे के रोने की रफ़्तार
कुछ और तेज़ हो गई
पिता ने बच्चे से
रोने की वजह पूछी
आँसुओं के बीच
सिसकते, सुबकते डब्बू ने
टी वी पर चल रही
ख़बर का हवाला देते हुए
रुआँसी आवाज़ में कहा –
बापू, ख़ुदरा बाजा़र
बंद करने जा रही है, सरकार
तुम अब कहाँ
लगाओगे अपना
खोमचा!

सवाल यह भी है कि क्या कविता अपने जिस समय को लाँघ-फलाँग-छलाँग कर आप तक पहुँचती रही है, वह समय कोई रेत से भरा समय रहता है? हाँ, कविता अपने जिस समय से आप तक पहुँची, वह समय रेत से भरा भूत और वर्तमान था, तभी जाबिर हुसेन अपने घर के अंदर बैठकर नहीं, घर से बाहर खुले में निकलकर समय का भूत और वर्तमान देखते हैं, जो सचमुच रेत से भरा है। यानी जाबिर हुसेन को रेत ही है, जो भूत से वर्तमान और वर्तमान से भविष्य की असलियत दिखाती है।

जाबिर हुसेन की ख़ासियत यही है कि वे रेत का गान सुनते हैं, रेत की भाषा सुनते हैं, रेत का संगीत सुनते हैं और रेत से भरे हुए समय की नब्ज़ पकड़कर समय की सेहत के बारे में मालूम कर लेते हैं। समय की नब्ज़ पकड़कर जाबिर हुसेन यह जान लेते हैं कि समय की रक्तवाहिनी नली की चाल ऐसी नहीं है जिससे यह सिद्ध हो कि इनके बीते-अनबीते में में सारा कुछ बढ़िया नहीं चल रहा है।

रेत की रक्तवाहिनी नली की चाल भी अकेले जाबिर हुसेन हैं जो परख सकते हैं। जाबिर हुसेन ख़ूब जानते-बूझते-समझते हैं कि रेत से भरे उनके घर के बाहर कुछ भी ठीक नहीं है। सबकुछ ठीक रहता तो ना महाराष्ट्र का कोई किसान आत्महत्या करता और ना उत्तरप्रदेश में दंगा होता। अब कहीं से ऐसी किसी मौत ख़बर आती है तो मुझे यही लगता है कि देश का संविधान मरा है कोई आदमी नहीं। अपने देश का माहौल कैसा बिगाड़ा जा रहा है जिसमें बस मौतें ही मौतें हैं। जीवन नहीं है।

क्या ज़िंदा क़ौमें अब दूसरों को मारकर ही ख़ुद को ज़िंदा रखना जानती हैं? अगर ऐसा नहीं है तो खाने-पीने, पहनावे-ओढ़ावे से शुरू हुई मारकाट अब फ़िल्म तक आ पहुँची है। एक ख़ास क़ौम अपने मुल्क में इस तरह की तैयार की जा रही है बड़ी चालाकी से, जो ना क़ानून को माने, ना अदालत को माने और ना संविधान को माने। यही सब वजहें हैं जिनसे जाबिर हुसेन आहत रहते हैं और इस समय को रेत से भरा समय घोषित करते हैं :

ये कैसी मौत है
कि जिसने गुम्बदों पर बैठे
कबूतरों के पर
एकबारगी कतर दिए हैं
और आवारा हथेलियों
की मुंडेर पर बैठी
अबाबीलों के पंखों में
ज़ंजीरें बांध दी हैं
जिसने हवाओं को बहने
और लहरों को
थिरकने से रोक दिया है
क्या तुम पहचानते हो
इस निर्दयी मौत को।

जाबिर हुसेन की कविता अपने पाठ के वक़्त कभी यह एहसास नहीं दिलाती कि यह आदमी की उदासी की कविता है। बल्कि जाबिर हुसेन की कविता एक निहत्थे आदमी की कविता है। जाबिर हुसेन की कविता वाले आदमी का हाथ ख़ाली है। इस आदमी का सबकुछ झपट लिया गया है। हाथ में कुछ है भी तो रेत है। आदमी के हाथ की यह रेत सबको दिखाई देती भी नहीं। इस रेत के बारे में बस कवि जान रहा होता है कि यही रेत शत्रुओं के साथ लड़ाई में काम आएगी। आदमी के शत्रु बेहद घिनौने हैं। बेरहम और बेहद ताक़तवर भी।

जाबिर हुसेन की कविता ऐसे ही घिनौने, बेरहम, घातक और ताक़तवर शत्रुओं को हराने की कविता है। आदमी के ख़िलाफ़ बेहद सुनियोजित तरीक़े से जो साज़िश रची जा रही है आदमी के शत्रुओं के द्वारा, इसका पर्दाफ़ाश जाबिर हुसेन की कविता बिलकुल सुव्यवस्थित होकर करती आई है। सत्ता के नुमाइंदे इन दिनों जिस ख़तरनाक हद तक गिरकर आदमी को आदमी से लड़ा रहे हैं और यह स्थिति बेहद शर्मनाक है।

जाबिर हुसेन की कविता सत्ता के नुमाइंदों को यह बताती आई है। मगर सत्ता के नुमाइंदों की गरिमा अब शायद ऐसे ही बढ़ती है, तभी ये लोग एक ख़ास तरह की ज़हरीली हवा मुल्क भर में चलवा रहे हैं ताकि सत्ता का यह नया ज़हर सबको मार डाले। आदमी को मारने की जो नई कला विकसित की जा रही है, यह बात वे भी ख़ूब समझ रहे हैं, जो लोग एक ख़ास रंग का झंडा लेकर, एक ख़ास रंग का विचार लेकर, एक ख़ास रंग का नारा लगाते दनदनाते फिर रहे हैं। इस घातक भीड़ का इस तरह हरेक जगह दनदनाते फिरने में सत्ता का मौन नहीं, खुला समर्थन प्राप्त है।

जाबिर हुसेन को और जाबिर हुसेन की कविता वाली रेत को सत्ता की तरफ़ से फैलाए जा रहे इस ज़हर के बारे में मालूम है – ‘कितने अकेले थे वो / जिन्होंने गँवाई अपनी जान / किसी सड़क, किसी पुल, या / अपने ही घर की दहलीज़ पर / जानते थे वो / मौत उनके रास्ते खड़ी है / अनजान दुश्मनों की तरह नहीं / पहचाने चेहरे की तरह।’ यह मौत का खेल अब मेरे या आपके आसपास या कविता के आसपास या यहाँ से वहाँ फैली हुई रेत के भी आसपास किसी आयोजन, किसी मेले, किसी रंगारंग कार्यक्रम की तरह होता जा रहा है। हत्या के रसिकों को ऐसा वाला खेल ख़ूब-ख़ूब भा रहा है। तभी ये रसिक किसी की खुलेआम कर दी गई हत्या को भीड़ द्वारा की गई हत्या का रंग देने हर वारदात के वक़्त मौजूद रहते हैं। किसी हत्यारे को बचाने का सबसे कारगर तरीक़ा यही है, लिहाज़ा ये हत्या के रसिक लोग हर जगह तैयार दिखाई देते हैं। बस ऐसे रसिकों को आप आमंत्रित कीजिए, ये हाज़िर होंगे पूरे अदब के साथ। मगर वे बेचारे, जिनको तय है कि मारा ही जाना है, वे बेचारे भी तो अपने क़ातिल के हर पैंतरे के बारे में जान रहे होते हैं, रेत पर मरकर गिरने से पहले तक :

मछुआरों को पता है
समुद्र में कब आएगा तूफ़ान
कब आएगी लहरों में उछाल
कितनी ऊँची उठेंगी लहरें
कितनी दूर भीगेगी रेत
तहस-नहस होंगे किनारे

मछुआरों को पता है, सब
जाल में फंसी मछलियों ने
बता दिया है उन्हें, सबकुछ
ख़तरे से आगाह कर दिया है, उन्हें
मछुआरे नहीं बेचते हैं
अपना नमक
हमेशा ख़्याल रखते हैं ‘अपने शुभ चिंतकों का’
तभी तो
समुद्री तूफ़ान से पहले
मछुआरे
ढीले कर देते हैं, अपने जाल
और मछलियों को
दे देते हैं
समुद्र में लौटने की छूट।

जिस सामूहिकता से आदमी को मारने में माहिर हत्यारे रोज़ एक-दूसरे से मिलते हैं और तय करते हैं कि अब किस आदमी की हत्या का पर्चा पढ़ा जाना है, हत्यारे के चंगुल से बचाने वाले लोगों में ऐसी सामूहिकता कहीं दिखाई नहीं देती। तभी मारने वाला जिसको चाहता है, जब चाहता है और जहाँ चाहता है मार ही देता है। और यह सब होना मनुष्य-जाति के लिए अपमानजनक है।

जाबिर हुसेन की कविता आदमी के इस अपमान का बदला अकसर आदमी के हत्यारे से लेती रही है, आदमी के हत्यारे की पुरज़ोर मुख़ालफ़त कर-करके। जाबिर हुसेन रेत की दुनिया में घुसकर अकसर हर हत्यारों के सामने पूरी ढिठाई से यह सवाल दाग़ते आए हैं कि तुम जो मुझे मारते हो और मेरी लाश इसी रेत की दुनिया में छुपाते आए हो, तो देखो ग़ौर से इस रेत वाली दुनिया को, यहाँ तुम्हारी लाश दिखाई देती है कि मेरी?

जाबिर हुसेन को किसी हत्यारे की परवाह कभी नहीं रही। इनको हर हत्यारे की पहचान जो है। यही वजह है कि जाबिर हुसेन हर हत्यारे को ललकारते दिखाई देते रहे हैं। जाबिर हुसेन को हत्यारे से लड़ने की ताक़त रेत से ही मिलती रही है। जिस तरह किसी हत्यारे के हाथ में रेत नहीं ठहरती, वैसे ही जाबिर हुसेन रेत की मानिंद हत्यारे के चंगुल से फ़िसलकर निकल जाने का हुनर जानते हैं – ‘ठीक ही है / उचक्कों का क्या भरोसा / कब अंदर घुस आएँ / और आपके सीने पर संगीनें तानकर / अपनी ‘जय’ बोलने को कहें।’ और ऐसी वजहों की वजह से जाबिर हुसेन हत्यारे को एक्शन में आने से पहले पहल कोई ऐसा सवाल दाग़ देते हैं कि हत्यारा ख़ुद ही घबराकर निकल लेने का रास्ता ढूँढ़ता दिखाई देता है।

आदमी से प्रेम करना जाबिर हुसेन ख़ूब जानते हैं। जाबिर हुसेन की कविता इसीलिए धुँध की कविता नहीं है। आदमी से प्रेम की कविता है। आदमी से प्रेम की कविताएँ आप विश्व-कविता में से चुनना चाहें तो जाबिर हुसेन की कविता आपको पहली पंक्ति में खड़ी दिखाई देगी। अँधेरा जहाँ कहीं पर पसरता है, जाबिर हुसेन की कविता वाली मशाल भक देके जलती हुई मुझे इसीलिए दिखाई देती रही है :

पानी जब तक
तुम्हारी आँखों में है
तुम्हारा शुमार
हमारी साँसों में है

एक दिन ये पानी
उतर जाएगा तुम्हारी आँखों से
और तुम हमारी साँसों से
बाहर होकर
शून्य में बिखर जाओगे
उन पत्तों की तरह
जो उदास मौसमों में
हर दिन
मेरे आंगन की
बलुआही ज़मीन पर
गिरते रहते हैं, और
हवा का कोई कमज़ोर झोंका भी
जिन्हें उड़ा ले जाता है

पानी की बूँदें
जो चमकती हैं आज
तुम्हारी आँखों में
खोकर अपनी पहचान
एक दिन
उतर जाएँगी तुम्हारी आँखों से।

● शहंशाह आलम
● जन्म : 15 जुलाई, 1966, मुंगेर, बिहार
● शिक्षा : एम. ए. (हिन्दी) 
● प्रकाशन : ‘गर दादी की कोई ख़बर आए’, ‘अभी शेष है पृथ्वी-राग’, ‘अच्छे दिनों में ऊंटनियों का कोरस’, ‘वितान’, ‘इस समय की पटकथा’, ‘थिरक रहा देह का पानी’ छह कविता-संग्रह तथा आलोचना की पहली किताब ‘कवि का आलोचक’ प्रकाशित। ‘गर दादी की कोई ख़बर आए’ कविता-संग्रह बिहार सरकार के राजभाषा विभाग द्वारा पुरस्कृत। ‘आग मुझमें कहाँ नहीं पाई जाती है’ कविता-संग्रह शीघ्र प्रकाश्य। ‘बारिश मेरी खिड़की है’ बारिश विषयक कविताओं का चयन-संपादन। ‘स्वर-एकादश’ कविता-संकलन में कविताएं संकलित। ‘वितान’ (कविता-संग्रह) पर पंजाबी विश्वविद्यालय की छात्रा जसलीन कौर द्वारा शोध-कार्य। दूरदर्शन और आकाशवाणी से कविताओं का नियमित प्रसारण। हिन्दी की सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं प्रकाशित। बातचीत, आलेख, अनुवाद, लघुकथा, चित्रांकन, समीक्षा भी प्रकाशित। वेब पत्रिकाओं में भी रचनाएं प्रमुखता से आती रही हैं।
● पुरस्कार/सम्मान : बिहार सरकार का राजभाषा विभाग, राष्ट्रभाषा परिषद पुरस्कार तथा बिहार प्रगतिशील लेखक संघ का प्रतिष्ठित पुरस्कार ‘कवि कन्हैया स्मृति सम्मान’ के अलावा दर्जन भर से अधिक महत्वपूर्ण पुरस्कार/सम्मान मिले हैं।
● संप्रति, बिहार विधान परिषद् के प्रकाशन विभाग में सहायक हिन्दी प्रकाशन।
● संपर्क : हुसैन कॉलोनी, नोहसा बाग़ीचा, नोहसा रोड, पेट्रोल पाइप लेन के नज़दीक, फुलवारीशरीफ़, पटना-801505, बिहार।
मोबाइल : 09835417537
ई-मेल : shahanshahalam01@gmail.com

 

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  1. शहंशाह आलम

    बिहार खोज ख़बर का स्वागत।

  2. आलेख जाबिर हुसेन की कोमल अनुभूतियों का एक ख़ूबसूरत एलबम सदृश्य है. उनकी कविताओं से गुज़र कर सुकून के साथ ही बेचैनी भी मिलाती है. यह बेचैनी लेखक/ कवि और पाठक के अंतर्संबंध की है. आत्मीयता,प्रेम व मानवीय सरोकार के कवि हैं जाबिर हुसेन उन्हें सलाम करता हूँ.. शानदार समीक्षा/ लेखन के लिए कवि शहंशाह आलम का शुक्रियादा करता हूँ.

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